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जैसे उन्माद का एक दौरा ही
पड़ गया था गुरमीत पर। इराक द्वारा कुवैत पर कब्ज़ा जैसे
गुरमीत के जीवन की सबसे सुखद घटना बन गई थी। कहीं उसके दु:खी
और अशांत मन को लगने लगा था जैसे उसने स्वयं ही कुवैत पर
कब्ज़ा कर लिया हो। वह कमरे से बाहर आया। बत्ती जलाई और सहन
में पड़े दो-तीन खाली डिब्बों को ठोकरें मारने लगा। 'यह साला
अमीर गया, यह गया क्राउन प्रिंस स्साला कहता था - सोने की चादर
की कार बनवाऊँगा। भाग गया उल्लू का पट्ठा। सब स्साले भाग लिए,
ओये दारजी खुशियाँ मनाओ ओये, आज तो जी भर के शराब पियो। ओये
ओन्हां दी तां माँ मर गई ओए, लै गया सौरयाँ नू, करती सालयाँ दी
ढिबरी टाइट!'
हँसी का जो बाँध उसने अपनी
आँसओं के सामने खड़ा किया था उसमें दरारें उभरने लगीं और थोड़ी
ही देर में वह बाँध पूर्ण रूप से ध्वस्त हो गया, गुरमीत जितनी
ज़ोर से हँसा था उतने ही ज़ोर से रोने लगा।
दारजी ने बेटे को सँभाला। माँ तो एक साल पहले ही पुत्तर को
छोड़कर स्वर्गों में ठिकाना कर चुकी थी। गुरमीत अभी भी उन्माद
में बड़बड़ाए जा रहा था, 'हुण नहीं छोड़ेगा जी, हुण कुछ नहीं
बचेगा। सारे दा सारा गल्फ़ तबाह हो जाएगा। दारजी हुण ओथे कुछ
नहीं बचना जे।'
दारजी को तो यह समझ नहीं आ रहा था कि वे दु:खी हों या प्रसन्न!
एक ओर तो उनका पुत्र रो रहा था और दूसरी ओर प्रसन्नता इस बात
की कि बेटा दो साल के बाद बोला तो! दो वर्ष से चुप्पी का एक
ऐसा आवरण गुरमीत के चेहरे पर चढ़ा हुआ था कि उसके नीचे का दर्द
किसी को दिखाई ही नहीं दे पाता था। गुरमात कुछ बोले, तभी तो
दर्द दिखाई दे।
दर्द भी तो उसने स्वयं ही मोल
लिया था। अच्छा ख़ासा घर था, खेती-बाड़ी थी, यह सब छोड़कर गया
ही क्यों वह? अधिक पाने की चाह में जो कुछ था वह भी लुट गया।
मनुष्य संतुष्ट क्यों नहीं रह पाता? क्यों अधिक से अधिक पा
लेना चाहता है!
गुरमीत के भी कई मित्र विदेश
हो आए थे। हर एक के पास विदेश की अलग-अलग रसीली कहानियाँ थी।
वहाँ की कारों की दास्तां, डिपार्टमेंट स्टोर, सोने की
दुकानें, न जाने क्या-क्या, सब के सब गुरमीत को अपनी ओर
आकर्षित कर रहे थे। नहीं तो गुरमीत को क्या कमी थी। कुछ अर्सा
पहले ही उसने कुलवंत कौर से विवाह किया था। खेतों की मुंडेरों
पर पला प्यार विवाह के बंधन में बँध गया था और फिर गर्भवती
पत्नी और सभी परिवारजनों को छोड़कर गुरमीत कुवैत चला गया।
उसे तो केवल तरसेमलाल को
दिखाना था कि वह भी विदेश जाने की कुव्वत रखता है। तरसेमलाल तो
केवल आठवीं पास है, फिर भी देखो कैसे दुबई में नौकरी का जुगाड़
बना लिया और आज उसका घर देशी-विदेशी चीज़ों से भरा हुआ है। कौन
कहेगा कि तरसेमलाल का पिता मूंगफली और गजक बेचकर गुज़ारा करता
था। फिर गुरमीत के यहाँ तो वैसे ही खुशहाली है और वह तो
ग्यारहवीं पास भी है! ट्रैक्टर चलाता हुआ क्या बांका जवान लगता
था।
बस कर लिया निर्णय - मैं भी
विदेश जाऊँगा। दारजी या बड़े भाई के समझाने का कोई असर नहीं।
बस एक ही जी । हठीला तो बचपन से ही था। पहुँच गया एक ट्रैवल
एजेंट के पास।
ट्रैवल एजेंट भी तो सपनों के सौदागर होते हैं। विदेश के ऐसे
रंगीन सपने बेचते हैं कि सपने ख़रीदने के लिए इंसान घर-बार भी
बेचने को तैयार हो जाए। इन्हीं सपनों ने गुरमीत के दिल में भी
विदेश जाने की इच्छा को दीवानेपन की हद तक भर दी थी।
गाँव में गुरमीत का घर हमारे
घर से कोई अधिक दूर नहीं है। अब तो उसे एक गाँव कहना भी ठीक
नहीं होगा। अनाज की बड़ी-सी मंडी है और एक छोटे से शहर की लगभग
सभी सुविधाएँ वहाँ मौजूद हैं। हम दोनों के पिता अच्छे मित्र
हैं। मेरे पिताजी की एक डिस्पेंसरी है वहाँ। अच्छी खासी
प्रेक्टिस है। गुरमीत के पिता सरदार वरयाम सिंह का नाम बड़े
किसानों में लिया जाता है।
गुरमीत जब कुवैत गया था तो
पहले मेरे ही पास बंबई आया था, "वीर जी, कमाल है! इतना बड़ा
जहाज़ और कहते हैं एयर बस! ओए भला ऐ क्या बात होई जी? भाई
जहाज़ जहाज़ है और बस बस! हमें वेवकूफ़ क्यों बनाते हैं,
भराजी, मेरे तो पेट में खलबली मची रही जब तक जहाज़ बंबई में
आकर उतर नहीं गया। पर वीरजी पिंड वाले (गाँव वाले) आपकी भी
बहुत तरीफ़ें करते हैं जी। हर आदमी इको ही गल (बात) करता है कि
डॉक्टर जेतली दा पुत्तर बिल्कुल नहीं बदलया। देखो हवाई जहाज़
चलाता है पर अकड़ बिल्कुल नहीं।"
गुरमीत धारा प्रवाह बोले जा रहा था। मेरी पत्नी तो शहर की है -
ख़ास बंबई शहर की। मैं कभी गुरमीत की ओर देखता और फिर अपराधी
नज़रों से पत्नी की ओर भी देख लेता। परंतु पत्नी भी गुरमीत की
बातों में आनंद ले रही थी। गुरमीत की निश्चल बातें उसे अच्छी
लग रही थीं।
मैं स्वयं ही गुरमीत को कुवैत
छोड़ने गया था। एअरलाईन की नौकरी के कुछ तो लाभ भी होते हैं
ना।
वहाँ अपने दोस्त दिनेश बतरा से मिलवा भी आया। दिनेश तो लगभग दस
वर्षों से कुवैत में चार्टड आकाउंटेंट है। गाँव के गुरमीत को
परदेस में भी एक जानकार तो मिल ही गया था। गुरमीत ने अपने सरल
स्वभाव और व्यवहार से शीघ्र ही अपने आपको वहाँ सुव्यवस्थित भी
कर लिया था। उसे रहने के लिए हिल्टन होटल के पीछे ही एक जगह
मिल गई थी। उसने स्वयं ही यह स्थान पसंद किया था। कुछ गाँव के
घरों जैसा घर था। आँगन के मुख्य द्वार से घर तक पहुँचने तक ही
तीन मिनट तो चलना ही पड़ता था। चारों ओर ऊँची दीवार और बीच
मध्य में उसका तीन कमरे का वातानुकूलित घर! जी जान से मेहनत कर
रहा था गुरमीत और वहाँ जगरांव में कुलवंत ने एक फूल-सी बेटी को
जन्म दिया।
लाख चाहने पर भी गुरमीत अपनी
पुत्री के जन्म पर जगरांव नहीं जा पाया। विदेश में छुट्टी अपनी
मर्ज़ी से तो मिलती नहीं है। इस बीच मैं भी गाँव हो आया था।
कुलवंत और गुड्डी को देख आया था अब मैं ही तो एक सूत्र था -
गुरमीत और उसके परिवार के बीच।
मेरा एक चक्कर कुवैत का फिर लगा। अब गुरमीत में कई बदलाव आ
चुके थे। अपनी कार में मुझे लेने आया और दोपहर का खाना सीज़र्स
रेस्टॉरेंट में खिलाने ले गया। उसके भीतर का बालक अभी भी
ज़िंदा था, 'भराजी, इस परदेस में तो घर से कोई चिट्ठी आ जाए
उसी का तो एक सहारा होता है। यह अजब देश है जी जहाँ डाकिया ही
नहीं होता। बस पोस्ट बॉक्स से आपे ही चिट्ठियाँ निकाल लाओ।'
गुरमीत की आँखों में एक दर्द की टीस-सी उभरी। कुलवंत की याद और
बिन-देखी गुड्डी की प्यारी-सी शक्ल ज़हन में उभरी। 'आपने तो
गुड्डी को देखा है ना जी? किस पर गई है? फ़ोटो से तो कुछ पता
ही नहीं चलता।'
मुझे लगा जैसे गुरमीत मेरी आँखों में कुलवंत और गुड्डी की छवि
देखने की चेष्टा कर रहा है।
'भराजी, मैं दिनेश जी को कम ही मिलता हूँ। बहुत पढ़े-लिखे लोग
हैं, कई बार तो अपने पर ही शर्म आ जाती है। उनकी मम्मी तो बहुत
ही बढ़िया औरत हैं जी। खाना खिलाए बिना आने ही नहीं देती और
भाभी जी ने तो कुवैत में तहलका मचा दिया जी। कितना चंगा गातीं
हैं जी। 'कुवैत टाइम्स' और 'अरब टाइम्स' दोनों में उनकी फ़ोटो
छपी थी जी।'
मैं बेसाख्ता उस इंसान को देखे जा रहा था। कितना सरल, कितना
प्यारा।
मेरा जब भी कुवैत जाना होता,
गुरमीत के पास हर बार कोई-न-कोई नयी कहानी, नया किस्सा रहता -
मुझे सुनाने के लिए। उनमें से आधी से अधिक घटनाओं में तो केवल
उसके अंदर का बच्चा ही बोलता रहता था। विदेशी चमकीली वस्तुओं
के प्रति एक बालक का आकर्षण स्वाभाविक ही था।
किंतु एक दिन बहुत उदास बैठा
था, 'भराजी, यहाँ की पुलिस तो बहुत ही ख़राब है। इक तां निरी
अनपढ़ पुलिस है जी। अंग्रेज़ी का तो इक अक्षर भी नहीं बोलणा
आंदा जी। स़ो जी पकड़ लिया एक दिन हमारे एक मलयाली भाई को ओजी
वोही नायर को जी। पहले चौक पर उसकी वैन की तलाशी ली जी और
'ठुल्ला' (पुलिसवाला) अपनी ही बंदूक उसकी वैन में भूल गया। और
जी अगले चौराहे पर दूसरे ठुल्ले चेकिंग कर रहे थे। बस जी वैन
में बंदूक मिली। क़र दी अगले की पिटाई। वोह बिचारा दुबला-पतला
घास-फूस खाणेवाला आदमी जी, शरीर में कोई ज़्यादा दम भी नहीं -
फंस गया इन डंगरो के बीच जी। थाणे ले गए जी। बहुत मारा जी। वो
अपणी अरबी में पूछे जा रहे थे और यह अपणा बंदा अंग्रेज़ी और
मलयाली में रोए जा रहा था। रब ने बचा लिता जी ओस बंदे नूं। पता
लग गया जी कि बंदूक उनके अपने ठुल्ले की है जी। पर अपणा बंदां
तां अधमोया कर ता न जी। ऐथे अरबी बोली तां, भराजी, ज़रूर आणी
चाही दी।'
विदेश में अकेले पड़ जाने का
ख़ौफ गुरमीत की आँखों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। सात
समुद्र पार करके विदेश जाने वाली ललक थी गुरमीत में। पर एक ही
समुद्र के उस पार पहुँच कर उसका दिल दहल गया था। फिर कुछ ऐसा
भी हुआ कि कुछ महीनों के लिए कंप्यूटर ने कुवैत और मेरे नाम के
बीच भी एक समुद्र भर दिया। और मेरा नाम कुवैत की फ्लाइटों पर
दिखाई नहीं दिया। इस बीच पत्रों से ही सूचना मिली कि गुरमीत
गाँव का चक्कर लगा आया है और कुलवंत और गुड्डी भी कुवैत पहुँच
गए हैं।
कुलवंत और गुरमीत, साथ ही कुछ महीनों की गुड्डी- एक प्यारा-सा
परिवार। मैं भी यह सोच कर प्रसन्न था कि चलो दोनों का अकेलापन
समाप्त हुआ। आख़िर कुलवंत भी तो इतने परिवारजनों के बीच अकेली
ही थी। गुरमीत के बिना उसे किसी और से कितना सरोकार होगा। और
अब वही गुरमीत उसके पास था, उसके पास-उसका अपना गुरमीत। अब कोई
गोरी मेम उसके गुरमीत को उड़ा कर नहीं ले जाएगी। अरब की हूरें
भी तो जादू जानती हैं - बेचारी कुलवंत!
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