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कहानियाँ  

समकालीन हिन्दी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है यू.के. से तेजेंद्र शर्मा की कहानी पासपोर्ट के रंग


"मैं भगवान को हाज़िर नाज़िर जान कर कसम खाता हूँ कि ब्रिटेन की महारानी के प्रति निष्ठा रखूँगा।" अंग्रेज़ी में बोले गए ये शब्द एवं इनके बाद के सभी वाक्य पंडित गोपाल दास त्रिखा को जैसे किसी गहरे कुएँ में से आते प्रतीत हो रहे थे। वे हैरो के सिविक सेंटर में बीस पच्चीस गोरे, काले, भूरे रंग के अलग-अलग देश के और पीले रंग के चीनी लोगों के साथ ब्रिटेन की महारानी के प्रति वफ़ादारी की कसमें खा कर ब्रिटेन की नागरिकता ग्रहण कर रहे थे। अपने आपको धिक्कार भी रहे थे।

"पापा, आप भी कमाल करते हैं। अब भला इस वक्त आप पार्टीशन की बात ले कर बैठ जाएँगे तो लाइफ़ आगे कैसे बढ़ेगी? किया होगा अंग्रेज़ों ने जुल्म कभी हमारे देशवासियों पर। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम जीवन को रोक कर बस, उसी पल को बार-बार जिए जाएँ।"
"बेटा तू नहीं समझ सकता। मेरे लिए ब्रिटेन की नागरिकता लेने से मर जाना कहीं बेहतर है। मैंने अपनी सारी जवानी इन गोरे साहबों से लड़ने में बिता दी। जेलों में रहा। मुझे तो फाँसी की सज़ा तक हो गई थी। लेकिन. . ."
"अब आप दोबारा अपनी रामायण लेकर शुरू मत हो जाइएगा।"
"बेटा तू मुझे वापस भारत भेज दे। मैं किसी तरह अपनी जिंद़गी बिता लूँगा वहाँ।

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