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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
यू.के. से शैल अग्रवाल की कहानी— 'बसेरा'


सोचा भी नहीं था कि यों मिलेगा. . .अचानक ही साथ हो लिया था आंचल से लिभड़ा-लिभड़ा! पलटकर हाथ में लेकर, खुशी से बल्लियों उलझते मन के साथ रिधू देखे जा रही थी। विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कुछ उसे. . .कैसे आया, कहाँ से आया यह?

फिर तो ढूँढ़ती आँखें बयार की बेचैनी से चारों तरफ़ घूम गईं और तुरंत ही ठीक आँख के सामने, वहीं दरवाज़े के पास मिल भी गया वह उसे. . .वही सुनहरा चमकता रंग, मानो आकाश का सारा सोना नाज़ुक पंखुड़ियों मे सिमट आया हो। वही रंग-रूप, आकार, सब कुछ तो वही था। झुककर नाम पढ़े, इसके पहले ही सेल्स काउंटर पर खड़ी लड़की समझाने आ पहुँची। ''कितना सुंदर है. . .है ना. . .जब पूरी रवानी में खिलेगा तो और भी सुंदर लगेगा! लबर्नम की नई किस्म है, पहली बार यहाँ इंग्लैंड में। हमारे नारंगी फूल जो आग की लपटों से चमकते हैं, उनसे थोड़ी फरक। इंडियन लबर्नम। हर साल इन्हीं दिनों खूबसूरत समां बाँध दिया करेगा।

''क्या तुम भारत से हो?''  अचानक ही वृद्ध से दिखते उस व्यक्ति ने काउंटर के पीछे से ही पूछा।
''हाँ।'' रिधू ने घूमकर देखा।

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