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यह बात दूसरी है कि माली अब भी उसे सूखी लकड़ी ही कहता था जो उसकी आँखों में दिन रात खटकती रहती थी। मई जून सब निकल गए। घूरते-घूरते अब तो आँखे जलने लग जातीं रिधू की पर एक नया पत्ता न निकला उस पेड़ में और तब बजाय निराश होने के एक केटल और गुनगुना पानी डाल जाती रिधू उस पेड़ की जड़ों में।
कुछ दिन बाद की ही बात है, उस दिन जब कार रिवर्स कर रही थी रिधू अचानक ही स्टीयरिंग फिसली और पेड़ से जा टकराई और तब उसकी सारी आशाओं पर पानी फेरता वह अनर्थ हो गया जिसकी रिधू कल्पना तक नहीं कर सकती थी। वह सपनों का पेड़. . .वह आधी सूखी, आधी हरी टहनी, कुचली और टुकड़े-टुकड़े होकर उसकी भय-विस्मित आँखों के आगे ही गिर पड़ी, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी अचानक ही देश-प्रेमियों के आगे इन अंग्रेज़ों ने भारत की राजगद्दी सँभाल ली होगी!

''अच्छा हुआ जो यह तुमसे हुआ, अगर कहीं मुझसे हुआ होता तो तुम तो. . .'' उसके चेहरे की असह्य पीड़ा देखकर पति आधी बात कहते-कहते ही चुप और चिंतित हो गए। रिधू कार से उतरी और धम से आकर सोफ़े पर पड़ रही। उसके बाद उसने पलटकर बगीचे के उस कोने की तरफ़ देखा तक नहीं. . .ना ही चौबीसों घंटे बगीचे में रहने वाली रिधू वापस बगीचे में ही जा पाई कभी। गुलाब तक नहीं काटे इस बार तो उसने। पड़ोसन और सहेली ली जब भी दिखती, पूछती आजकल बहुत व्यस्त हो गई हो क्या. . .बगीचे में भी नहीं दिखती। रिधू एक फीकी मुस्कान के साथ ''हाँ'' कहकर बात पलट देती।
पर ली समझ चुकी थी कि कहीं कुछ ऐसा है जो कि खाए जा रहा है उसकी सहेली को. . .पर कैसे जाने वह, क्या करे, कुछ उसकी समझ में नहीं आ रहा था। कभी वह रिधू के लिए फ़ेयरी केक बनाकर लाती तो कभी उसे अपने घर कॉफी पर बुलाती पर रिधू को तो मानो गुमसुम रहने की आदत ही पड़ती जा रही थी। ''सब ठीक तो है घर पर या तुम्हारे साथ?'' कई-कई बार पूछा उसकी चिंतित सहेली ने और हर बार ही वही हल्की-सी और छोटी-सी ''हां'' कहकर वह चुप हो जाती।

कई-कई गार्डन सेंटर गई रिधू पर अमलतास कहीं नहीं मिला। ''अगली बार भारत से ले आना।'' पति ने समझाने की कोशिश की। ''पर ज़रूरी तो नहीं कि वह भी पनपे ही!'' दबाते-दबाते मन की बात होठों पर आ ही गई उसके।
उसकी आवाज़ की गहराई और थर्राहट से दुःख का तो पता चल रहा था पर असली भेद शायद ही कोई कभी जान पाए. . .फिर ऐसी बातें किसी से कही भी तो नहीं जा सकतीं. . .एक नहीं कई पीढ़ियों का दुःख था यह तो उसका बेहद अपना।
तीन साल निकल गए उस बात को भी। गदर के 150 साल का फ़ंक्शन था इंडियन एंबेसी में, साथ में उसी विषय पर एक नुमाइश भी थी। तैयार रिधू जाने को निकली ही थी कि फूलों का एक गुच्छा एक बार फिर आँचल से लिपटा उसके संग-संग ही गाड़ी में चला आया और गोदी में आन बैठा।

गुच्छे को पागल की तरह सीने से लगाए रिधू भावातिरेक से काँप रही थी। बरसाती नदी-सा भावनाओं का एक ज़लज़ला था अब उसके चारों तरफ़। मन में उमड़ा सारा वह पानी आँखों से बह निकला। नदी के रिसते दो किनारों-सी खुद को सँभालती रिधू अपने ही आवेग में बही जा रही थी. . .राह के रोड़े, यादों की गीली मिट्टी, अच्छा बुरा सब साथ-साथ लिए और समेटे-समेटे।

यह लड़ाई उसके अस्तित्व की थी, जड़ें जमाने की ही नहीं, फलने-फूलने की थी. . .खुली हवा में साँस लेने की थी।
रिधू ने एक-एक करके सारे आँसू पोंछ डाले। अब हज़ारों यादें शंख सीपी-सी इतिहास की रेत में पड़ी भी रह जाएँ, तो भी उसे कोई फरक नही पड़ता, उसका विश्वास फल फूल चुका था, जीत चुका था। नन्हा ही सही, अमलताश का नन्हा-सा पेड़ एक नहीं कई-कई गुच्छों के साथ पीले पंखुड़ियों के कालीन पर उसके स्वागत में उसके अपने दरवाज़े पर खड़ा था, वह भी यहाँ इंग्लैंड में, हर तपन से उसकी रखवाली कर रहा था, छाँव दे रहा था उसे, जैसे कभी चाणक्य पुरी के अम्मा बाबा के घर में दिया करता था।

रिधू का मन किया जी खोलकर हँसे। हर उस अविश्वासी को प्यार की ताकत बताए, जो इस पर विश्वास नहीं करते। उसके विश्वास ने जाने कौन-सा बीज इस धरती में बो दिया था कि अब छाँव ही छाँव थी चारों-तरफ़, आँखों को भी और मन को भी।
हर्षातिरेक से काँपती रिधू को ली ने आकर सँभाला। ''अरे यह तो वही अमलतास का पेड़ है ना जो दिल्ली या भारत के कई और शहरों में दिखता है? हाइडरेंजर्स की तरह इसे भी तो लोग सड़कों के किनारों पर ही लगाते हैं, ना?'' इमीग्रेशन डिपार्टमेंट में सरकारी वकील की तरह नियुक्त ली को अक्सर ही भारत जाने के मौके मिलते रहते है और साधारण जन-जीवन के क़रीब आने के भी।
''हाँ, हाँ, वही है यह. . . अब देखना हर बगीचे में यहाँ पर तुम्हें यही दिखाई देगा।'' पता नहीं किस अंदाज़ और भाव से कहीं थी रिधू ने यह बात कि ली को बहुत ही गंभीर कर गई और तब खुद को और माहौल को हलका करने के लिए मज़ाक किए बगैर न रह सकी वह।
''हाँ, हाँ, क्यों नहीं। तुम एशियन की तरह ही इसे भी यहाँ बसने में बिल्कुल ही टाइम नही लगेगा। हम ब्रिटिश लोग हमेशा से ही बहुत सहनशील कौम रहे हैं।''
यह क्या कह गई यह. . .कितनी गलत-फहमी है इन्हें खुद को लेकर, बेशर्म या अवसरवादी कहती तो ज़्यादा सही था. . .रिधू के सर से पैर तक आग लग गई। ली उसकी सहेली थी पर थी तो ब्रिटिश ही, आखिर अपना रंग दिखा ही दिया, रिधू सोचे बगैर न रह सकी।
पर ली उसके मन में उठते तूफ़ान को देख पा रही थी और उसे दुःखी करने का तो उसका कतई इरादा ही नही था। गले लगाकर बोली, ''40 साल से यहाँ रह रही हो, इतनी स्ट्रौंग इंडियन आइडेंटिटी रखोगी, तो जी नहीं पाओगी यहाँ पर खुशी–खुशी से। किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ने देगी तुम्हें तुम्हारी यह अलग-थलग पहचान!''

रिधू का मन नहीं किया कि अब वह उसके साथ कहीं पर भी जाए, पर इतनी नरम दिल थी कि ग़ुस्से में भी किसी का मन दुखाना उसे आता ही नही था, बस।
''क्या आदमी को अपने ही घर में भी मन-माफ़िक नहीं रहना चाहिए, खुश हो पाने का अधिकार नहीं, क्या आगे बढ़ते जाना, इतना ज़्यादा ज़रूरी है ली?'' पूछती चुपचाप कार में जा बैठी रिधू।
अब स्तब्ध होने की अंग्रेज़ सहेली की बारी थी। क्या सब वे हिंदुस्तानी उसकी इसी सहेली की तरह स्वाभिमानी और दृढ़ थे, जिन पर उसके पूर्वजों ने इतने साल राज किया. . .शायद नहीं. . .या फिर उन्होंने कभी एक दूसरे के बारे में कुछ जानना ही नहीं चाहा! दोनों ही सहेलियाँ आज बहुत कुछ नया जान चुकी थीं एक दूसरे के बारे में. . .कुछ ऐसा जो सच होकर भी उद्वेलित कर रहा था दोनों को और उनकी सोच से होड़ लगाती कार भी तो उन घुमावदार सड़कों पर उसी रफ्तार से आगे बढ़ी चली जा रही थी। उतरते ही दोनों ने ही एक दूसरे के उदास चेहरे को देखा और जबर्दस्ती ही मुसकुराने की कोशिश की। जब नहीं रहा गया तो रिधू ने ही पहल की,
''मुसकुराओ ली, तुम मुसकुराती और चहकती ही अच्छी लगती हो।'' ली उसका हाथ अपने हाथ में लेकर खिल-खिलाकर हँस पड़ी, ''तुम बहुत अच्छी, बहुत सरल हो रिधू। अब तुम्हें उदास देखकर मैं कैसे खुश हो सकती हूँ?''  उसकी गहरी रुँधी हुई आवाज़ से रिधू जान गई थी कि सहेली झूठ तो नहीं ही बोल रही और अगर उसने अभी, इसी वक्त इसे माफ़ नही किया तो रो भी पड़ेगी यह।
''आज भी तुम अपनों के ही बीच हो और अपने घर में ही हो रिधू।'' रिधू ने आगे बढ़कर ली को गले लगा लिया। अब ली को गला खखारने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी, कैसे भी अपने को संयत करती, रिधू के गले लगी-लगी ही वह दुबारा बहुत ही धीमी और भावभीनी आवाज़ में फुसफुसाई, ''एक और बात बताऊँ तुम्हें रिधू, मुझे पहले से ही पता था कि तुम यही कहोगी, जो तुमने अभी-अभी कहा और वही करोगी, जो तुमने किया भी। तभी तो तुम मेरी सहेली हो। अब हमारे पूर्वजों के बीच जो घटा क्यों न हम उसे इतिहास के पन्नों में ही रहने दें, वैसे भी क्या किसी के कहने भर से फूल अपनी महक बदल देता है, या हीरा चमक खो देगा?''

रिधू और ली के स्नेह-भीगे आँसू एकसाथ सदियों से बंजर पड़ी नफ़रत और ग़लतफ़हमियों की दरारों से तार-तार उस ज़मीं को सींचे जा रहे थे जिसे हज़ारों के खून ने रंगा था, नफ़रत की आग ने झुलसाया था. . .रिधू को लगा आज ज़रूर ही कोई त्योहार होना चाहिए, होली दिवाली-सा बड़ा त्योहार, क्योंकि आज न सिर्फ़ पहली बार रिधू के घर में वह अमलतास ही फूला था, अपितु बरसों से भटकती प्यासी और तरसती रिधू की खुद अपनी जड़ें भी नम हो चुकी थीं. . .एक अपनी ज़मीन, अपना बसेरा पा चुकी थीं।

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16 जून 2007

 

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