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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में प्रस्तुत है
सिंगापुर से डॉ. संध्या सिंह की कहानी- ऐसा होता है


उस दिन बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। रुकती भी क्यों? आखिर, बारिश को भी तो अपना दमख़म दिखाना था। वैसे भी इस शहर पर बारिश ज़्यादा ही मेहरबान रहती है। धूप की बात तो निराली ही है पर यहाँ बारिश भी हमेशा दूसरे मौसमों से आगे ही दिखी है। बस इस मैं बड़ी, मैं बड़ी की लड़ाई में एक चेहरा याद आ जाता है।

विवेक हाल ही में भारत से सिंगापुर आया था। इस देश के लिए नए सपने, नई उम्मीदें थीं और काम भी जोश भरा। दफ़्तर नया था पर ‘एडजस्ट’ होने की कोशिश कर रहा था।
“आज घर की बहुत याद आ रही है। रास्ते में ही माँ से बात करूँगा।”
सोचते हुए उसने अपने घर के नज़दीक जाने वाली ‘ट्रेन’ पकड़ ली। ट्रेन में भीड़ अधिक थी। ठीक से खड़े होने की गुंजाइश भी जब कम लगने लगी तो माँ से फोन पर बात करने का विचार त्यागना पड़ा।

उसने सोचा “इतने चेहरों के भाव पढ़ने का मौक़ा मिला है ये भी क्या कम है? पर ये कैसा देश है जहाँ एम.आर.टी. (मेट्रो) में इतने लोग बैठे हैं लेकिन हर चेहरे को देखकर ऐसा ही लग रहा है जैसे उनके आस-पास सब कुछ शून्य है। क्या कोई संवेदना नहीं है इतने सारे लोगों में? क्या मैं बड़ी जल्दी अपनी राय बना रहा हूँ?”

डिब्बे में बैठे या खड़े लोगों की ओर नज़र घुमाने पर उसके मन में कई तरह के प्रश्न उठने लगे। “अरे एक साथ पाँच महिलाएँ, वो भी हमउम्र। बैठी हैं, पर बात करना तो दूर, एक दूसरे की ओर नज़र भी नहीं घुमा रहीं। क्या तकनीकी का ही दोष है? जो राग आजकल हम गाते रहते हैं या कुछ और?”
बीच-बीच में घर की याद भी आ रही थी और प्रश्नों का गोला तो घूमे ही जा रहा था। उसके जीवन में यह पहली बार था जब वह इतनी दूर कहीं आया था और वह भी एकदम अकेले। तभी इन ख्यालों को भंग करती हुई एक घोषणा उसे सुनाई देती है “नेक्स्ट स्टॉप बून ले।”

हालाँकि भीड़ अधिक होने के कारण आवाज़ स्पष्ट नहीं थी पर जब कुछ दिनों का अभ्यास हो तो सन्देश सुनाई पड़ ही जाते हैं।
“अच्छा मेरा गंतव्य तो आ रहा है।”
वो दफ़्तर का थैला समेटते हुए बाहर निकलने के लिए खड़ा हो गया। मेट्रो में भीड़ थी तो बाहर निकलने के दरवाज़े के पास भी काफी लोग थे जिनमें कुछ चीनी बालाएँ भी थीं। उसके चंचल मन ने फिर एक प्रश्न उठा दिया।

“इतनी सुन्दर चीनी लड़कियों को देखकर मेरे मन में वो आकर्षण क्यों नहीं उठ रहा जो देश में उठा करता था? क्या मैं उस उम्र से बाहर निकल आया हूँ या इनका आकर्षण मेरी सोच से अलग है?”
ऐसी बातें मन में चलने लगीं। चले भी क्यों नहीं, बाहर बारिश का मौसम और शुक्रवार का दिन। सिंगापुर में शुक्रवार मतलब कहीं मौज-मस्ती की शुरुआत तो कहीं हफ़्ते भर के ‘पेंडिंग’ काम का लेखा-जोखा।।

“अगले दो दिन छुट्टी है तो इस नए आए देश में घूमने का मौक़ा मिलेगा। कुछ नए घर भी देखूँगा क्योंकि ‘बून ले’ दफ़्तर से बहुत दूर पड़ता है और यह है भी तो ‘टम्परेरी’ और फिर दफ़्तर के लोग भी तो कहते हैं कि कहाँ ग़रीबों के इलाक़े में रह रहे हो!”
ग़रीब और सिंगापुर विरोधाभास ही तो है पर पिछले कुछ दिनों में उसे कई ऐसे दृश्य देखने को मिले हैं जो सिंगापुर की चकाचौंध वाली तस्वीर पर कुछ और निशान भी अंकित करते हैं।

“आज भी चीनी अम्मा दिखेंगी? या बस कुछ दिनों की ही परेशानी थी?”
अभी विवेक को इस देश में आए दिन ही कितने हुए हैं पर दफ़्तर से लौटते वक़्त मेट्रो के पास ख़ुद-ब-ख़ुद उसकी नज़र एक महिला पर टिक जाती है।
चीनी युवतियों के चेहरों की चमक और उस औरत में कितना भेद है, यह सोचने लगता है। कहाँ तो एकदम मक्खन जैसी त्वचा, बालों की चमक, पहनावे और ‘मेकअप’ पर किये जाने वाले खर्च अपने व्यक्तित्व के प्रति सचेत मानसिकता को उजागर करते हैं और वहीं समाज का दूसरा आईना बिलकुल अलग और विपरीत है।

पिलपिला सा चेहरा जैसे दाँतों ने साथ ही छोड़ दिया हो, एक-आध को छोड़कर। चेहरे पर पड़ी मोटी-मोटी झुर्रियाँ सारे ‘ब्यूटी प्रोडक्ट्स’ को ताक पर रख देने की सलाह देती हैं क्योंकि जहाँ तक उसकी समझ है चीनी, जापानी लोग तो अपनी त्वचा का बहुत ध्यान रखते हैं। आखिर चीनी अम्मा ऐसी क्यों हैं? क्या धन ही हर सुख का पर्याय है? हाँ, शायद यही है, चाहे कोई माने या न माने। उम्र लगभग अस्सी तो होगी ही या कम भी हो तो जीवन की जद्दोजहद ने उसे बढ़ा दिया है।

उस चीनी अम्मा का रूप-रंग सब कुछ जैसे उसके सामने तैर रहा हो। घुटनों तक निक्कर और गोल गले वाली टी शर्ट नुमा ऊपरी वस्त्र, चप्पल के नाम पर काले रंग की पुरानी अजीब सी सैंडल जो पैरों की ख़ूबसूरती को भी बदसूरत कर दे। चीनी अम्मा के पैरों की खुरदुराहट को और भी पीड़ा दायक बना रही होगी, वह चप्पल। बाल, अगर साफ-धुले हुए और ठीक से कंघी किये हुए होते तो आधुनिक लहज़े में ‘सॉल्ट एंड पैपर’ की संज्ञा संभवत: दी जा सकती थी। पर इस वक्त तो यही लगता है कि यहाँ भी पानी-साबुन की इतनी कमी है? भौहों तक उलझे बालों के बीच छोटी-छोटी आँखों वाली चीनी अम्मा हमेशा कुछ ढूँढती ही नज़र आई हैं। आज उसका मन हो रहा है कि स्टेशन से बाहर निकलते ही पूछ ले, “आप इस उम्र में भी इतना काम और ऐसा काम क्यों कर रही हैं।”

इस उम्र में भी पेट भरने के लिए यह काम करना पड़ रहा हो तो यह विडंबना ही है। जितना उसने देखा है उसके हिसाब से वे कूड़े में से ‘एल्युमिनियम’ के ‘केन’ और ‘रिसाइकिल’ होने वाली चीज़ें ढूँढने का काम करती हैं।
“हाँ, यही तो मैंने देखा है पिछले दस-बारह दिनों में, जिसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यहाँ भी ऐसा होता है?”
बुढ़ापा हर समाज में श्राप बनता जा रहा है। भविष्य को तो बड़े लाड़-प्यार से हर समाज पाल रहा है पर अतीत इतना बड़ा बोझ!

उनके हाथ में हमेशा एक औज़ार या कहें हथियार होता है। हाँ, वह उनका हथियार ही तो है, जैसे जानवर अपनी रक्षा के लिए अपने पंजों और दाँतों का इस्तेमाल करते हैं, सिपाही बन्दूक का और अधिकारी या अध्यापक अपने काम के लिए क़लम का, वैसे ही वे चिमटे जैसा कुछ लिए रहती हैं। यह चिमटे जैसा औज़ार कूड़ेदान में से ‘टिन’ वगैरह निकालने में उनकी मदद करता है। कभी हामिद ने दादी के हाथ को जलने से बचाने के लिए चिमटा ख़रीदा था और आज भी किसी दादी के हाथ गंदे न हों इसलिए ख़ुद ही चिमटा पकड़ लिया गया है।

दिनभर वे क्या करती हैं यह तो अब तक पता नहीं पर अब तक रोज़ देर शाम को लौटते वक़्त उन्हें यहीं स्टेशन के पास ‘फ़ूड कोर्ट’ के बाहर वाले कूड़ेदान के पास मंडराते देखा है। उनकी नज़र हर उस इंसान पर रहती है जो चलते-चलते ‘टिन’, ‘कैन’ या ऐसी कोई चीज़ फेंके। बड़ी फुर्ती से वे ऐसे निकाल लेती हैं जैसे कभी-कभी लगता है क्या ‘टिन’ कूड़ेदान की सतह तक पहुँचा भी होगा? निकालते ही उस ‘टिन’ को उलट-पलटकर खाली करती हैं और फिर उसे ज़मीन पर रखकर ठोक-पीटकर चपटा बना देती हैं और झट अपने थैले में रख लेती हैं।
“शायद बाज़ार में बेचकर पैसों से अपना जीवन चलाती हों!”

तभी उसे माँ से बात करने का ख्याल फिर से आया और तुरंत फ़ोन निकाल नंबर मिला दिया। ‘ट्रिंग-‘ट्रिंग’ की घंटी तो अब बजती नहीं और फ़ोन उठाने वाले का भी ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ता। सोशल मीडिया ने जो भी अच्छा-बुरा किया हो पर फ़ोन की ‘कनेक्टिविटी’ बहुत बढ़ा दी है।
“हाँ विवेक! कैसा है, घर आ गया, खाना खाया कि नहीं?”
माँ के एक ही साँस में इतने सारे सवाल, उनके प्रति और सम्मान बढ़ा देते हैं। माँ ही तो हैं जिनको हर बात की चिंता होती है। कभी-कभी लगता है कि एक यही रिश्ता है जो स्वार्थ से परे है पर वो चीनी अम्मा भी तो किसी की माँ ही होंगी, है न! फिर उनके हालात ऐसे क्यों हैं?

“हाँ माँ, मैं ठीक हूँ, आप कैसी हैं और बाबू जी कैसे हैं? आज आपकी बहुत याद आ रही है।”
“यहाँ सब ठीक है, हमें तो रोज़, हर वक्त तुम्हारी याद आती रहती है। आज कुछ ख़ास है क्या?”
“माँ को कैसे बताऊँ यह सब, वो क्या सोचेंगी क्योंकि विदेश के बारे में तो उनके मन में एक अलग ही छवि है। वही बरक़रार रहे तो अच्छा।”

“जैसे आपको मेरी याद हमेशा आती है, वैसे ही मुझे भी, बस कभी-कभी थोड़ी ज़्यादा हो जाती है।... दस-बारह मिनट के बाद फ़ोन रखा तो लगा गला कुछ सूखा-सूखा है, क्यों न कुछ ख़रीदकर पी लिया जाए। और चीनी अम्मा को भी ढूँढा जाए।” यहाँ ठंडा ‘हनी लेमन टी’ बहुत मशहूर है तो वही लेकर पीने लगा और आँखें पुन: चीनी अम्मा को ढूँढने लगीं।

“यहीं तो होती हैं, कहाँ चली गईं, बारिश भी तो पूरी तरह से थमी नहीं है। आज कहीं घर तो नहीं चली गईं, बारिश में कैसे जाएँगी भला, तो आज शायद आई ही न हों! क्योंकि छाता संभालने भर की जगह उनके हाथों में तो बची ही नहीं रहती। अपने यहाँ की तरह कहीं ये अम्मा भी फ़ुटपाथ पर तो नहीं सोतीं? नहीं-नहीं यहाँ फ़ुटपाथ पर सोता आज तक मुझे तो कोई नहीं दिखा। यहाँ तो सभी के घर रहते होंगे। खैर, अब घर चला जाए और कुछ बनाकर खाया जाए।”

यह सोचते हुए आगे बढ़ा और ‘ड्रिंक’ का ‘कैन’ फेंकने ही वाला था कि लगा किसी ने हाथ से ही ले लिया हो। अचानक सामने चीनी अम्मा खड़ी नज़र आईं। ‘कैन’ लेते ही दूसरी ओर मुड़ गईं, साफ़ करते हुए आगे बढ़ती जा रही थीं और उनकी नज़रें शायद दूसरों को ढूँढ रही थीं।

मन हुआ उन्हें रोक ले और आज अपने मन के सारे सवालों के जवाब पूछ ले।
“उनसे कुछ पूछूँ? पर किस भाषा में? मुझे चीनी भाषा का क, ख, ग भी नहीं आता और क्या पता उनको अंग्रेज़ी आती हो या नहीं? और पूछूँगा भी क्या? आप ये काम क्यों करती हैं या क्या आपके बेटे-बेटी आपका ख्याल नहीं रखते? भला मैं कौन होता हूँ?”

क्या हम इस बात से तसल्ली न कर लें कि वे मेहनत कर रही हैं, किसी के सामने हाथ नहीं फैला रहीं। चाहे जैसा भी काम हो कम से कम ख़ुद का पेट तो पाल पा रही हैं। हर जगह “ऐसा होता है” और समाज की इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। वह विचारों से बाहर निकला और आस-पास देखा तो चीनी अम्मा किसी और के पास, थोड़ी दूर ‘कैन’ ख़ाली होने का इंतज़ार कर रही थीं।

१ जुलाई २०२६

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