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व्यक्तित्व

अभिव्यक्ति में मन्नू भंडारी की रचनाएँ

गौरवगाथा में
यही सच है

स्त्री सुबोधिनी

 


मन्नू भंडारी

जन्म : ३ अप्रैल १९३१ को मध्य प्रदेश के भानपुरा नगर में।
शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक (१९४९) और एम. ए. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (१९५२) से।

कार्यक्षेत्र : बालीगंज शिक्षा सदन (१९५२-६१), रानी बिड़ला कालेज (१९६१-६४) में अध्यापन के बाद सन् १९६४ में वे मिरांडा कालेज में हिन्दी की प्राध्यापक बनी और अवकाश प्राप्त करने (१९९१) तक कार्यरत रहीं। अवकाश प्राप्त करने के उपरांत वे दो वर्षों तक उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ की निदेशिका(१९९२-९४) रहीं।

मन्नू भंडारी ने कहानियां और उपन्यास दोनों लिखे हैं। `एक प्लेट सैलाब' (१९६२), `मैं हार गई' (१९५७), `तीन निगाहों की एक तस्वीर', `यही सच है'(१९६६), `त्रिशंकु' और `आंखों देखा झूठ' उनके महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं। विवाह विच्छेद की त्रासदी में पिस रहे एक बच्चे को केंद्र में रखकर लिखा गया उनका उपन्यास `आपका बंटी' (१९७१) हिन्दी के सफलतम उपन्यासों में गिना जाता है। लेखक राजेंद्र यादव के साथ लिखा गया उनका उपन्यास `एक इंच मुस्कान' (१९६२) पढ़े लिखे आधुनिक लोगों की एक दुखांत प्रेमकथा है जिसका एक एक अंक लेखक-द्वय ने क्रमानुसार लिखा था। आपने `बिना दीवारों का घर' (१९६६) शीर्षक से एक नाटक भी लिखा है।

मन्नू भंडारी हिन्दी की लोकप्रिय कथाकारों में से हैं। नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार के बीच आम आदमी की पीड़ा और दर्द की गहराई को उद्घाटित करने वाले उनके उपन्यास `महाभोज' (१९७९) पर आधारित नाटक अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। इसी प्रकार 'यही सच है' पर आधारित 'रजनीगंधा' नामक फिल्म अत्यंत लोकप्रिय हुई थी और उसको १९७४ की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।

 
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