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परिक्रमा दिल्ली दरबार

भारत–पाक संबंध एक पर्यवेक्षण


भारत विश्व का एक ऐसा राष्ट्र है जिसमें बहुत प्राचीन काल से विभिन्न और बहुआयामी संस्कृतियों के लोग आपस में प्रेमपूर्वक निर्वाह करते रहे हैं। 1857 का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम जो मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में अंग्रजों से देश को स्वतन्त्र कराने के लिए लड़ा गया, उसमे देश के बहुसंख्यक हिन्दू और मुसलमानो ने जिस प्रकार से एक दूसरे का साथ दिया, उससे अंग्रेज़ो के कान खड़े हो गये। उन्हें अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए इन दो बहुसंख्यक जातियों की एकता खटकने लगी। उन्होने एक ऐसी नीति अपनाई जिससे इनके आपसी द्वन्द उभर कर सामने आने लगे। इसी का प्रतिफल था धर्म सिद्धांत पर भारत का विभाजन।

पाकिस्तान का जन्म मजहबी उन्माद एवं धार्मिक असहिष्णुता का परिणाम था जिससे वह आज तक बाहर नहीं निकल सका। आज भी पाकिस्तान की एकता को स्थापित करने अथवा उसकी तत्कालिक समस्या से जनता का ध्यान हटाने के लिये वहाँ के शासक भारत के हौवे का भय खड़ा करते रहते हैं।

पाकिस्तान ने आज तक भारत के साथ 4 बडे़ युद्ध किये है। अपने जन्म के तुरन्त बाद 1948 मे पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। यदि उस समय जल्दबाजी में भारत ने युद्ध न बन्द किया होता तो सम्भवतःकश्मीर की समस्या इतना विकराल रूप धारण न कर पाती । 1948 के बाद से पाकिस्तान सदा भारत के साथ युद्ध करता रहा।

1965 मे भारत के साथ युद्ध मे उसे मुँह की खानी पडी़। 1971 मे न केवल उसे पराजित होना पडा अपितु पूर्वी पाकिस्तान का वह हिस्सा, जो वर्तमान मे बांग्ला देश के नाम से जाना जाता है, भी गंवाना पडा। विश्व इतिहास में पहली बार एक साथ 90,000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया।

लेकिन ढाक के वही तीन पात की कहावत चरितार्थ करते हुए पाकिस्तानी शासकों ने न कुछ सीखा, न कुछ सुधरा। संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा दूसरे विश्व मंच पर जहाँ भी उन्हें अवसर प्राप्त हुआ भारत के विरूद्ध विषवमन करना उनकी नीति का प्रमुख अंग बना रहा। भारत के विरूध सीधी लडाई मे बहुत कुछ खो चुकने बाद उन्होंने गुरिल्ला युद्ध का निश्चय किया तथा कश्मीर एवं देश के अन्य भागों में आतंकवादी कार्यवाही प्रारम्भ कर दी।

दूसरी ओर भारत, पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने के अनवरत प्रयास करता रहा। शिमला समझौता, लाहौर घोषणा पत्र तथा बस यात्रा भारतीय नेताओ की इसी नीति का परिचायक थी। किन्तु इस सबको धता बताते हुए 1999 में उसने चुपचाप जाडे की भयंकर ठंड में भारत के एक बडे़ भू भाग पर कब्जा कर लिया। आखिर भारत को बल प्रयोग द्वारा उन्हें बाहर खदेड़ना पड़ा। इस पराजय का परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान में पुनः सेना की सत्ता परवेज मुशर्रफ के रूप में आ गयी।

पाकिस्तानी सेना को सत्ता का जो स्वाद लग गया है वह छुटाए नही छूटता। अयूब खान, याहिया खान, जनरल जिया और अब परवेज मुशर्रफ, इन सभी बदलते सैन्य नेताओ का एक ही ढंग रहा है— सत्ता को कब्जा कर जन भावनाओ का बेजा इस्तेमाल करके शासन पर अपनी पकड स्थापित करना।

भारत की शान्ति की पहल को पाकिस्तान ने सदा कायरता ही समझा। 1988 से आज तक भरत के लाखो व्यक्ति पाकिस्तानी आतंकवाद के नरसंहार की आहुति बन चुके है। लाखों कश्मीरी पंडितो को आतंकवादी गतिविधियों के कारण विस्थापित होना पडा है और हाल ही में 1अक्टूबर को कश्मीर विधान सभा में हुए आत्मघाती हमले से 36 लोगो की जाने जा चुकी है।  

अपने देश की इस पीड़ा से क्षुब्ध भारतीय प्रधान मन्त्री ने अमरीकी राष्ट्रपति बुश को पत्र लिखकर अपनी भावना से अवगत कराते हुए लिखा कि “ भारत के सब्र की भी सीमा है” तथा तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की जिसे पाकिस्तान ने भारत द्वारा युद्ध आरम्भ करने की कोशिश माना।

 

पकिस्तानी रिरियाना सुनकर विश्व के देश भारतसे संयम बरतने का आग्रह करने लगे। भारत की बार–बार कोशिशों के बावजूद भी अमेरिका और ब्रिटेन ने कश्मीर के आतंकवाद को विश्वव्यापी एजेन्डे में शामिल करने की सम्भावनाओं को नकारते रहे हैं।

न्यूयार्क में आतंकी तबाही मचने पर पश्चिमी देश बेचैन हो गये किन्तु श्रीनगर पर वर्षो से चल रहे नर संहार पर उनके कानों में जूं तक नही रेंगी जबकि भारत ही नहीं सारी दुनिया जानती है कि कश्मीर में हिंसा फैलाने वालों का प्रशिक्षण पाक अधिकृत कश्मीर में आई एस आई द्वारा चलाए जा रहे प्रशिक्षण केन्द्र में दिया जा रहा है या फिर अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन द्वारा संचालित केन्द्रों में।

तालिबान के खिलाफ अमेरिकी सेना को अपना भूभाग एवं सहयोग देने के कारण जनता की तीखी प्रतिक्रिया से बचने और उनका ध्यान बँटाने के लिये मुशर्रफ ने अपनी सेनाओं का जमावडा भारतीय सीमाओं पर करना शुरू कर दिया है। वह सीमा पर आतंकी गतिविधियों के साथ साथ सैनिक गोलाबारी जारी रखे हुए है और भारत से बातचीत की इच्छा भी जताते रहते हैं।

मुशर्रफ ने जर्मनी के चांसलर श्री गेरहार्ड के साथ बातचीत मे अपने पक्ष को मजबूती से रखने की भी कोशिश की जिसमे उसे सफलता नहीं मिल पायी। लेकिन अपने भूतपूर्व मित्र तालिबान के विरोध में खड़े होकर अमरीका की आर्थिक और सैनिक मदद पाकर वह गदगद हो रहा है।

यह एक विडम्बना है कि जहाँ एक ओर अमेरिका, अपने देश पर हुए आतंकी हमले के आरोपी तालिबान निवासी लादेन या उसके सहयोगी पाकिस्तान से बातचीत का रास्ता न अपनाकर सीधी सैनिक कार्यवाही करता है वहीं दूसरी ओर वर्षो से पाकिस्तान पोषित आतंकवादियो के हाथों लाखो लोगो की जाने गंवा चुके भारत को अपनी समस्या बातचीत के माध्यम से सुलझाने की सलाह देता है।

पाकिस्तान के इस दोहरे मापदण्डों कर कारण अमेरिका मे भी पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर संदेह प्रकट किया जा रहा है।  ऐसे में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिये मुशरफ को एक बार फिर भारत से बात करनेकी इच्छा व्यक्त करनी पडी है।

भारतीय प्रधान मन्त्री ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि पाकिस्तान ने भारत की सवेदना को समझने का कभी प्रयास नही किया है। बात करके समस्या को सुलझाने के लिए न्यूयार्क जाने की क्या जरूरत है। वह तो भारत और पाकिस्तान मे भी हो सकती है।इससे भारत की दृढता और दबावो के आगे न झुकने की प्रतिबद्धता भी जाहिर होती है।

भारत की इस तीव्र प्रतिक्रिया से इतना तो हुआ कि बुश प्रशासन को अंततः पाकिस्तान सरकार द्वारा संपोषित आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद और लश्करे तोइबा को आतंकवादी संगठन घोषित करना पडा़ । शायद यह अमेरिकी प्रशासन का देर से किन्तु सही कदम था। अमेरिका फिलहाल पूरी कोशिश में है कि भारत और पाकिस्तान तब तक शान्ति बनाए रखे जब तक अमेरिका लादेन की माँद मे घुसकर उसे कन्धे पर लाद कर न्यूयार्क नही ले जा पाता ।

अंतिम स्थिति यह है कि अमेरिका की अस्पष्ट नीति को मद्देनज़र रखते हुए भारतीय सरकार ने आतंकवाद से जूझने के लिए नयी सम्भावनाओं की तलाश मे उत्तरी गठजोड़ से सम्पर्क बनाना प्रारंभ कर दिया है। 

भारतीय प्रधानमन्त्री की पुतिन से मुलाकात ने आतंकवाद के खिलाफ चल रही विश्वव्यापी मुहिम को नया आयाम दिया है। विश्व शान्ति के लिए खतरा बन चुके आतंकवाद से निपटने में दोहरे मापदन्ड कभी कारगर नही हो सकते। 

इसी परिदृश्य में धीरे धीरे यह स्पष्ट हो रहा है कि भारत के समक्ष कोई मुहिम छेडने के अतिरिक्त दूसरा रास्ता नही बचा है। पाकिस्तान की ताजा कूटनीति को विफल करना जरूरी है और कश्मीर समस्या के समाधान के लिये पाकिस्तान मे चल रहे आतंकी प्राशिक्षण शिवरो को नेस्तनाबूद करना ही पडेगा।

— बृजेश कुमार शुक्ल

1 नवंबर 2001  
 
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