सामयिकी भारत से

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमरीका यात्रा पर जाने-माने पत्रकार ओमकार चौधरी की टिप्पणी-


और करीब आए भारत-अमेरिका


प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पाँच दिन की अमेरिका यात्रा से लौट आए हैं। जार्ज डब्ल्यू बुश के समय डॉ. सिंह की पहल पर परमाणु सहयोग समझौते सहित कई क्षेत्रों में सहयोग का जो नया सिलसिला भारत और अमेरिका के बीच शुरू हुआ था, इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा उसे आगे बढ़ाते हुए दिखाई दिए। बदले वैश्विक परिदृश्य में न तो अमेरिका की भूमिका को नज़र-अंदाज़ किया जा सकता है और न ही अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय घटनाओं-परिघटनाओं को। कुछ समय पहले तक कौन सोच सकता था कि महाशक्चित अमेरिका का राष्ट्रपति चीन की यात्रा पर आकर उसका गुणगान करेगा। ऐसा हुआ। बराक ओबामा बीजिंग आए तो उन्होंने अति उत्साह में चीन को यह सलाह दे डाली कि दक्षिण एशिया में खासकर भारत-पाकिस्तान के बीच की समस्याओं को सुलझाने में वह भूमिका निभाए। ओबामा के नासमझी में दिए गए इस बयान पर उसी समय भारत ने कड़ा प्रतिवाद किया और चीनी नेतृत्व को भी साफ़ करना पड़ा कि उसका ऐसा करने का कतई इरादा नहीं है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी सफाई दी लेकिन ओबामा की बिन माँगी सलाह से भारत-अमेरिकी रिश्तों को लेकर एक संशय का माहौल ज़रूर पैदा हो गया।

ऐसे समय डॉ. मनमोहन सिंह वाशिंगटन यात्रा पर गए तो कई सवाल हवा में तैर रहे थे। अब जबकि वे लौट आए हैं, तो कह सकते हैं कि संशय के बादल बहुत हद तक छँट गए वहाँ न केवल भारतीय प्रधानमंत्री का शानदार स्वागत हुआ, बल्कि उनके सम्मान में शाही भोज भी दिया गया। यह सही है कि परमाणु सहयोग समझौता ईंधन के दोबारा उपयोग के मुद्दे पर अब भी अटका हुआ है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने संकेत दिए हैं कि बाधाओं को जल्द ही पार कर लिया जाएगा। चीन यात्रा के दौरान उनके बयान से दोनों देशों के बीच जो कसीदगी पैदा हुई, कुछ हद तक ओबामा ने उसे ख़त्म करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि भारत-पाक के बीच चीन, अमेरिका या किसी भी तीसरे देश की भूमिका वे नहीं देखते। अलकायदा, तालिबान और चरमपंथियों का खात्मा होने तक चूकि अमेरिका पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका देखता है, इसलिए सार्वजनिक तौर पर वह भारत की चिंताओं पर भले ही राय जाहिर नहीं करता हो, परन्तु परदे के पीछे से सीमा पार की घुसपैठ को कम करने, मुंबई के हमलावरों और षड़यंत्रकारियों को कानून के कटघरे में अमेरिकी प्रशासन की भूमिका को नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता। अमेरिका सख्ती नहीं दिखाता तो पाकिस्तान उन पर कड़ी कार्रवाई कभी नहीं करता।

डॉ. मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाएगी क्योंकि ओबामा ने उन्हें अपना पहला राजकीय अथिति बनाया। प्रधानमंत्री ने अमेरिका की सरज़मीं से चीन और पाकिस्तान को कुछ-कुछ खरी-खरी सुनाईं। उन्होंने साफ़ कहा कि पिछले कुछ समय से चीन के व्यवहार में आक्रामकता और तल्खी को भारत नोट कर रहा है। वह दबदबा दिखाने की चेष्टा कर रहा है। सीमा पर उसने जो सैन्य हरकतें शुरू की हैं, वह भी हमारी निगाह में हैं। पाकिस्तान के बारे में तो उन्होंने और भी सख्त लहजे में बयान जारी किए। उनका साफ़ कहना था कि भारत दक्षिण एशिया में शांति, समृद्धि और मैत्री चाहता है। इसके लिए ज़रूरी है कि आतंकवाद को खात्मा हो। पूर्वाग्रह समाप्त हों। भरोसा बहाल हो। डॉ. मनमोहन सिंह ने दो टूक कहा कि पाकिस्तान से पैदा ख़तरों से विश्व मुँह नहीं मोड़ सकता। यदि तालिबान और अलकायदा का खात्मा नहीं हुआ तो वे पूरे विश्व के लिए ख़तरा बनेंगे। मनमोहन सिंह के पाकिस्तान के अंदरूनी हालातों पर यह कहकर दो टूक टिप्पणी की कि हमें नहीं पता कि वहाँ किससे बात करें? वहाँ प्रभावी सरकार की ज़रूरत है।

अमेरिका सामरिक ज़रूरतों के चलते भले ही पाकिस्तान को महत्व दे रहा है, लेकिन भारत से उसके रिश्तों की तुलना पाकिस्तान के संदर्भ में करें तो खुद पाकिस्तानी निजाम भी खुद को ठगा हुआ सा महसूस करता है। मनमोहन सिंह को पहले राजकीय अथिति का दर्जा दिए जाने से हमारा पड़ोसी दिल ही दिल में किस कदर परेशान होगा, इसका सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। ऊपर से ओबामा ने यह कहकर उसकी पीड़ा में और इज़ाफा कर दिया कि भारत एशिया-विश्व का अगुआ और ज़िम्मेदार परमाणु ताकत है। मनमोहन सिंह और ओबामा के बीच शिखर वार्ता में आतंकवाद से निपटने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर बातचीत के अलावा परमाणु सहयोग समझौते को अंतिम रूप देने, द्विपक्षीय रिश्तों को और सुदृढ़ बनाने, जलवायु परिवर्तन पर डेनमार्क में होने जा रहे सम्मेलन में संभावनाओं पर बात हुई। इसके अलावा दोनों देशें के बीच आर्थिक व्यापारिक रिश्तों को आगे बढ़ाने और कृषि, शिक्षा व विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग तेज़ करने पर सहमति बनी, सो अलग।

इस समय विश्व के समक्ष मुख्यत: तीन चुनौतियाँ हैं। आतंकवाद से लड़ाई। पर्यावरण को स्वच्छ बनाना और दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्चत बनाना। मनमोहन सिंह और बराक ओबामा ने इन तीनों मसलों पर गंभीर चर्चा की। ओबामा ने इधर कुछ मंचों पर कहा कि भारत को सीटीबीटी पर दस्तख़त कर देने चाहिए। एटमी ऊर्जा संयंत्रों के लिए न्यूक्चलीयर ईंधन की सप्लाई करने वाले समूह के कुछ सदस्य देशों ने भी यह शर्त लगाने की कोशिश की है कि जब तक भारत परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं केरगा, तब तक उसके साथ समझौते पर अमल संभव नहीं होगा। ईंधन के रिप्रोसेसिंग का मसला भी अभी अटका हुआ है। भारत ने इस मामले में अपना पक्ष बहुत मज़बूती के साथ अमेरिका के समक्ष रखा है। भारत सीटीबीटी पर हस्ताक्षर के लिए उसी सूरत में तैयार हो सकता है, जब विकसित और परमाणु शक्चित से लैस देश बराबरी का व्यवहार करें। भारत का मानना है कि जहाँ तक अमेरिका के साथ हुए परमाणु सहयोग समझौते को अंतिम रूप देने का प्रश्न है, जब बराक ओबामा अप्रैल २०१० में भारत की यात्रा पर आएँगे, तब तक इसका कोई सर्वमान्य हल भी निकल आएगा।

१४ दिसंबर २००९