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पर्व-परिचय


कुल्लू का दशहरा
दीपिका जोशी


कुल्लू घाटी में विजयदशमी के पर्व का परंपरा, रीतिरिवाज़, और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व है। पूरे भारतवर्ष में इस दिन रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण की प्रतिमाएँ जलाने का रिवाज़ हैं जिसमें अच्छाई की बुराई पर विजय दर्शायी जाती है। जिस दिन पूरे देश में दशहरे की समाप्ति होती है उस दिन से कुल्लू की घाटी में इस उत्सव का ज्वार चढ़ने लगता है- रथ यात्रा की रम्यता, ख़रीदारी का उल्लास और धार्मिक परंपराओं की धूम इस ज्वार को विविधता से भर देती हैं।

कुल्लू में विजयदशमी के पर्व को इस तरह उत्सव मनाने की परंपरा राजा जगत सिंह के राज में १६३७ में हुई। फुहारी बाबा के नाम से जाने जाने वाले किशन दास नामक संत ने राजा जगत सिंह को सलाह दी कि कुल्लू में भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा की स्थापना की जाय। उनके आदेश का पालन करते हुए जुलाई १६५१ अयोध्या से एक मूर्ति ला कर कुल्लू में रघुनाथ जी की स्थापना की गई। किंवदंती है कि राजा जगत सिंह किसी दुस्साध्य रोग से पीड़ित था। इस मूर्ति के चरणामृत सेवन से उसका रोग जाता रहा और धीरे-धीरे वह पूर्ण स्वस्थ हो गया। इसके बाद राजा ने अपना जीवन और राज्य भगवान को अर्पण कर दिया। और इस तरह यहाँ दशहरे का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाने लगा। अश्विन महीने के पहले पंद्रह दिनों में राजा सभी ३६५ देवी-देवताओं को धालपुर घाटी में रघुनाथ जी के सम्मान में यज्ञ करने के लिए न्योता देते हैं।

इस उत्सव के पहले दिन दशहरे की देवी, मनाली की हिडिंबा कुल्लू आती हैं जो राजघराने की देवी मानी जाती है। कुल्लू में प्रवेशद्वार पर राजदंड से उसका स्वागत किया जाता है और उनका राजसी ठाठ-बाट से राजमहल में प्रवेश होता है। हिडिंबा के बुलावे पर राजघराने के सब सदस्य उसका आशीर्वाद लेने आते हैं। इसके उपरांत धालपुर में हिडिंबा का प्रवेश होता है।

रथ में रघुनाथ जी की तीन इंच की प्रतिमा को उससे भी छोटी सीता तथा हिडिंबा को बड़ी सुंदरता से सजा कर रखा जाता है। पहाड़ी से माता भेखली का आदेश मिलते ही रथ यात्रा शुरू होती है। रस्सी की सहायता से रथ को इस जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है जहाँ यह रथ छह दिन तक ठहरता है। राज परिवार के सभी पुरुष सदस्य राजमहल से दशहरा मैदान की ओर धूम-धाम से रवाना हो जाते हैं।

सौ से ज़्यादा देवी-देवताओं को रंगबिरंगी सजी हुई पालकियों में बैठाया जाता है।

मंडी से कुल्लू जाने वाले हरियाली से घिरे रास्तों पर घर की बुनी सदरी और गोली टोपी से सजे पुरुषों के छोटे-छोटे जलूसों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कुछ के हाथ में दाँत की बनी गोल तुरही होती है और कुछ नगाड़ों को पीटते चलते हैं। बचे हुए लोग जब साथ में नाचते गाते हुए इस मंडली को संपूर्णता प्रदान करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे पहाड़ की घाटी के सन्नाटे में उत्सव का संगीत भर गया हो। पहाड़ के विभिन्न रास्तों से घाटी में आते हुए देवताओं के इस अनुष्ठान को देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानो सभी देवी-देवता स्वर्ग का द्वार खोल कर धरती पर आनंदोत्सव मनाने आ रहे हैं। जैसे-जैसे नगर नज़दीक आता है पर्व के शोर का रोमांच अपनी ऊँचाइयों को छूने लगता है। घाटी विस्तृत होने लगती है और भीड़ घनी होने लगती है।

उत्सव के छठे दिन सभी देवी-देवता इकट्ठे आ कर मिलते हैं जिसे 'मोहल्ला' कहते हैं। रघुनाथ जी के इस पड़ाव पर उनके आसपास अनगिनत रंगबिरंगी पालकियों का दृश्य बहुत ही अनूठा लेकिन लुभावना होता है। सारी रात लोगों का नाचगाना चलता है। सातवे दिन रथ को बियास नदी के किनारे ले जाया जाता है जहाँ कंटीले पेड़ को लंकादहन के रूप में जलाया जाता है। कुछ जानवरों की बलि दी जाती है। इसके बाद रथ वापस अपने स्थान पर लाया जाता है और रघुनाथ जी को रघुनाथपुर के मंदिर में पुर्नस्थापित किया जाता है। इस तरह विश्व विख्यात कुल्लू का दशहरा हर्षोल्लास के साथ संपूर्ण होता है।

धालपुर की धरती इस समय देश के कोने-कोने से आए व्यापारियों से भी भरी रहती है। प्रचार के तहत खाज़गी और राजकीय स्तर पर कई प्रदर्शनियाँ लगती हैं। रात में कला केंद्र में अंतर्राष्ट्रीय कला महोत्सव का भी आनंद लिया जाता है।

कुल्लू दशहरा घाटी में मनाए जाने वाले सभी त्यौहार और महोत्सवों का अंतिम त्यौहार है। त्योहारों की अगली शुरुआत मार्च के महीने से होती है।


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