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पर्व परिचय                      

विजयादशमी पर विशेष

जन रंजन भंजन सोक भयं
डॉ. सुधा पांडेय


आपदां पृहर्त्तारं दातारं सुख संपदाम्।
लोकाभिरामं श्री रामं भूयो भूयो नमोम्यहम्।।

श्रीराम की पूरी अवतारी लीला-मर्यादा की स्थापना, असत्य व आसुरी शक्तियों तथा प्रवृत्तियों पर सत्य और धर्म की विजय से मूल्यों की रक्षा की ही रही। ऐसी आदर्श श्रीराम से जन-जन का जुड़ाव इतना व्यापक, आत्मीय व आराध्य भाव का रहा है कि मर्यादा व शक्ति के संगम का वार्षिकोत्सव आनंद बन 'दशहरा' अर्थात 'विजयादशमी' सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व बन चुका है। 'शक्ति' के मूल तत्व की आत्मप्रेरणा से विजय अभियान प्रारंभ करने की प्रतीक बन विजयादशमी सूक्ष्म अर्थ में अधर्म पर धर्म तथा असत्य पर सत्य की विजय को ही रेखांकित, मंचित और प्रमाणित करती आई है।

शक्ति को मर्यादित रूप से प्रयोग करते हुए सत्य और धर्म के पथ पर अग्रसर व्यक्ति अवश्य ही विजयी होता है। अधर्म व अनीति में शक्ति प्रयोग कभी सफल नहीं हो सकता। यही संदेश देती विजयादशमी उत्सव स्वरूप में प्रतिवर्ष आनंद और पुनःस्मरण के भाव से रामलीलाओं और रावणदहन की पुनरावृत्ति करती आ रही है। चैत्र शुक्ल दशमी से धर्मराज पूजन से प्रारंभ प्रत्येक माह की दशमी व्रत पर्व रही है। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दशावतार व्रत के पश्चात आश्विन शुक्ल दशमी 'विजयादशमी' है- 'नारद महापुराण' के अनुसार श्रीराम सहित उनके अनुजों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का पूजन आज किया जाता है।

इसे श्रवण नक्षत्र युक्त प्रदोषव्यापिनी, नवमी विद्धा लिया जाता है। माँ दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजयप्रयाण, शमीपूजन और नवरात्र का पारण भी आज ही होता है- शरद ऋतु का प्रारंभ आज से ही माना जाता है। दशमी तिथि को जब सूर्यास्त के बाद तारे उदित होते हैं तब 'विजय' नामक मुहूर्त में आरंभ किया प्रत्येक कार्य सिद्ध होता है।

माता भगवती की आराधना कर वर्षाकाल की समाप्ति पर प्राचीन काल से ही राजतंत्रात्मक व्यवस्था में समारोहपूर्वक रामलीलाओं तथा शोभायात्राओं से राजाओं के विजय अभियान इसी तिथि से प्रारंभ होते थे। जन-जन तक इसे पहुँचाने और अनूठा लोक उत्सव ही बना देने का श्रेय रामकथा का ही रहा है। शस्त्र पूजन तथा शमी वृक्ष का पूजन और नीलकंठ पक्षी का दर्शन भी परंपरा रही है।

बनारस (रामनगर), कुल्लू का दशहरा और ढालपुर मैदान की रामलीला हो अथवा मैसूर राजघराने की अदभुत शोभा यात्रा-दशहरे की धूम तो स्थान-स्थान पर रामलीलाओं के मंचन और रामकथा गुणगान से सर्वत्र विस्तृत ही रहती आई है। भव्य आयोजनों और व्यावसायिक संदर्भों के बीच भी विजयादशमी अपने मूल संदेश के चलते तो साथ ही लोक उत्सव की रंगीन छटा के बीच दिनोंदिन लोकप्रिय ही होती गई है।

शक्ति यदि अनीति, अधर्म से संयुक्त हो, अमर्यादित और लोककल्याण हेतु न हो तो व्यर्थ होती है, पराजित होती है। शक्तिशाली रावण का वध और सौरज धीरज जेहि रथ चाका-सत्यशील दृढ़ ध्वजा पताका, के विजय रथ पर रथारूढ़ श्रीराम की विजय से यही संकेत और निर्देश प्रतीक रूप में देती विजयादशमी मात्र धूमधाम और लोक उत्सव को ही नहीं अपितु आत्मबल और प्रेरणा के साथ सदवृत्तियों के शक्ति संचयन का भी आवाहन करती आई है। श्रीराम का अनूठा आदर्श जन-जन को इससे प्रेरणा देता आया है। वस्तुतः प्रत्येक लोक पर्व अपने बाह्य परिदृश्य में जहाँ उमंग, उत्साह और आनंद मनाने की व्यक्ति की सामूहिकता की प्रवृत्ति से रंगबिरंगा दिखता है, वहीं मूल आंतरिक भाव-प्रेरणा-नव ऊर्जा तथा सद्प्रवृत्तियों को ग्रहण करने और पुष्ट करने में ही निहित रहता आया है। आदर्श प्रतीक के रूप में श्री राम विजयादशमी में जन-जन के आराध्य बनते हैं जैसे नवरात्रि में भगवती दुर्गा इसी प्रतीक शक्ति का केंद्र बन प्रत्येक को दिशा प्रदान करती हैं। रामचरित की महिमा का बखान तो तुलसी जी इसी संदर्भ में दे गए हैं-

समर विजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
विजय विवेक विभूति नित तिन्हहिं देहिं भगवान।।

मातृशक्ति के पूजन, आशीर्वाद और सत्य, नीति और धर्म पथ पर उसके मर्यादित प्रयोग से विजयी होते श्रीराम की वंदना वाल्मिकी भी अपनी रामायण में कर रहे हैं... सुग्रीव, विभीषण, अंगद और लक्ष्मण के माध्यम से...
ततस्तु सुग्रीव विभीषणांगदाः सुह्रद्विशिष्टाः सह लक्ष्मणस्तदा।
समेत्य दृष्टा विजयेन राघवं रणेभिरामं विधिनाभ्यपूजयन्।।


नवरात्र के अवसर पर
सुर-नर-मुनि-जन सेवत
डॉ. सुधा पांडेय


शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः।।
सर्वा बाधा विनिर्मुक्तो धनधान्य सुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः।। (दुर्गासप्तशती-द्वादश अध्याय १२-१३)

पितरों के श्राद्धतर्पण के पश्चात देवी पक्ष अर्थात नवरात्रि की महापूजा का आगमन हो चुका है। वस्तुतः शारदीय नवरात्र, विजयादशमी और शरत्पूर्णिमा 'देवीपक्ष' की ही शास्त्रीय मान्यता के अंतर्गत है। माँ का महात्म्य श्रवण, पूजन और उनकी ही सेवा में प्रतिक्षण मन-क्रम-वचन से लगे भक्त उनके आगमन से पुनः प्रसन्नता, आशा और आकांक्षा के साथ-साथ अवर्णनीय आत्म-सुख में ही निमग्न दिखते हैं। नित्य पाठ, पुष्पांजलि और आरतियों से माँ की चरण-वंदना और उनके वात्सल्य रस से नहाते सभी उनके विविध रूपों की आराधना में ही व्यस्त दिखते हैं। सारा वातावरण ही 'मातृरुपेण संस्थिता' का ही प्राकट्य उपस्थित करता दिखता है। ऐसा प्रशस्त और व्यापक है शारदीय नवरात्र का महाउत्सव कि बस माता के ही जयकार और माता के ही जगरातों की शोभाछटा चहुँ ओर बिखरी दिखती है। घर-घर माँ के मंगल गीत हैं- माँ से अधिक और उनके अतिरिक्त और हो भी कौन सकता है- सो बस मइया, माता, जननी, माँ-शेरावाँली- न जाने कितने भावविभोर करते संबोधनों, गीतों, कीर्तनों से नर-नारी बस उनके ही गान-ध्यान में डूबे हैं, ऐसी आत्मिक प्रसन्नता कि माँ को शृंगार कराने, सेवा और प्रसन्नता की जैसे होड़-सी लगी दिखती है।

आश्विनस्य सिते पक्षे नानाविधि महोत्सवैः।
प्रसादयेयुः श्री दुर्गा चतुर्वर्ग फलार्थिनः।।
(बृहत्सार सिद्धांत)

महासप्तमी, महाष्टमी की अर्धरात्रिकालीन महानिशापूजा की तैयारियाँ हैं, तो साथ ही महानवमी की त्रिशूलनी पूजा और व्रत-पारण- अर्थात कर्मांत में किए जाने वाले हवन की आतुरता है। हवन में कम से कम नौ व्यक्तियों द्वारा श्री दुर्गासप्तशती का पाठ और नवार्णमंत्र का जाप होता है। श्री सूक्त की प्रतिध्वनित होती मधुरता मन मोह लेती है- तो साथ ही श्री हनुमान जी को ध्वजा अर्पित करना शास्त्रोक्त माना गया है। शारदीय नवरात्र का प्रारंभ भी श्री राम द्वारा माँ की आराधना से ही माना जाता है। माँ की आराधना में कौमारी पूजन को प्रधानता दी जाती है। अतः नवमी को हवन तथा सरस्वती पूजन के पश्चात नव कुमारिकाओं को पूजन, सम्मान, भोजन और दक्षिणा- माँ के ही नव रूपों के प्रतीक के रूप में की जानी अभीष्ट है।
मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मी मातृणा रूपधारिणीम्।
नव दुर्गात्मिका साक्षात कन्यावामाहध्याम्यहम्।।

''स्त्रियः समस्तास्तव देवि भेदः'' के चलते पारण और नारियल प्रसाद के साथ-साथ कन्या पूजन अनिवार्य कहा गया है। 'सकला जगत्सु' के आधार पर ये सभी नौ कन्यायें माता जगदंबा का ही रूप और प्रतीक मानी जाती है। नित्य नवीन भावों, रूपों और चरित्रों वाली अंबे माँ की भक्ति में डूबे भक्तों के जयकारों, गायन, मंत्रोच्चारणों से तो मंदिरों, पांडालों व जागरण स्थलों पर साज-सज्जा और मूर्तिकारों की कला स्वयमेव निखरी दिखती है।
ओम नमो दैव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्।।
(श्री दुर्गासप्तशती ५१९)

६ अक्तूबर २००८

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