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पद्य-कथा

चूहे भाई
भावना कुँअर

 
 

 

 

 

 

 

 

ढूँढ़ कहीं से लाए रजाई,
छिपकर बैठे चूहे भाई।
बाहर गिरे बर्फ़ के गोले,
मुश्किल से थी जान बचाई।

आई मटकती चुहिया रानी,
भोजन की करती तैयारी।
बोली भूख लगी है भारी,
ले आओ तुम फल-तरकारी।

उठकर दौड़े चूहे भाई,
अब तो शामत ही है आई।
लानी होगी फल-तरकारी,
वरना मार पड़ेगी भारी।

लेकर थैला जब वो निकले,
पड़ी बर्फ़ पर ऐसे फिसले।
पहुँचे बिल्ली के आँगन में,
अटकी जान काँपते तन में।

सोचा कैसे जान बचाऊँ,
घर वापस अब कैसे जाऊँ।
बोला मौसी पैर दबाऊँ,
या फिर गरम दूध ले आऊँ।

मौसी बैठी थी चुपचाप,
शायद चढ़ आया था ताप।
सर्दी आज पड़ी है खूब,
आई नहीं ज़रा भी धूप।

चूहे ने तरकीब लगाई,
पास पड़ी फिर टाई उठाई।
बोला मौसी झूला झूलें,
या फिर आँख मिचौली खेलें।

बोला पहले मैं छिपता हूँ,
उमर में तुमसे भी छोटा हूँ।
तब तक झूला डालो तुम,
ऊँची पेंग बढ़ा लो तुम।

मौसी ने जब आँख दिखाई,
चूहे जी ने दौड़ लगाई।
जाकर चुहिया पर गुर्राए,
कारण चुहिया समझ न पाए।

9 सितंबर 2007

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