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प्रकृति और पर्यावरण

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संस्कृति की साँसों में - कमल
– अर्बुदा ओहरी


दलदल में उगने वाला कमल का फूल विश्व के सबसे आकर्षक फूलों में से एक है। भारत तथा वियतनाम के राष्ट्रीय फूल कमल का वनस्पतिक नाम नेलुम्बो नुसिफेरा है। यह नेलुम्बोनेसी परिवार का सदस्य और पानी में उगने वाला पादप है। अनुकूल परिस्थितियों में कमल के बीज कई वर्षों तक जीवित अवस्था में रह सकते हैं। पुराने दस्तावेज़ों के अनुसार चीन की एक सूखी झील में करीब तेरह सौ साल पुराने बीज से अंकुरण का ज़िक्र भी है।

कमल का फूल

कमल के फूल की जड़ों को नदी या झील की मिट्टी में रोप दिया जाता है जबकि तने और पत्तियों को पानी की सतह पर छोड़ दिया जाता है। सामान्यतः पानी की सतह से कुछ सेंटिमीटर ऊपर ही फूल उगते हैं। फूलों का आकार ड़ेढ सेंटीमीटर से लेकर २५ सेंटीमीटर तक होता है। कुछ किस्मों में बड़े तो कुछ में छोटे फूल खिलते हैं। इन पौधें में फूलों का सिलसिला पाँच से छह दिनों तथा आठ से दस माह तक चलता रहता है। कमल के पौधे की लंबाई करीब १५० सेमी तथा फैलाव ३ मीटर तक हो सकता है। खिले हुए फूल का व्यास २० सेमी तक हो सकता हैं।

कमल के पत्ते

कमल के पत्ते एक से तीन फुट व्यास के गोलाकार, चिकने, चमकीले, नतोदर और तश्तरीनुमा होते हैं। इनका आकार ८० सेंटीमीटर तक हो जाता है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में कमल के विक्टोरिया लांगवुड हाईब्रिड किस्म के पत्ते का आकार स़ाढे आठ फुट दर्ज किया जा चुका है। पत्ते काफी लंबे नाल से संबद्ध होते हैं, जिन पर कुछ दूरी पर छोटेछोटे कांटे भी होते हैं। इनमें एकाकी फूल गर्मी या वर्षा काल में श्वेत या गुलाबी सुगंधित और लंबे डंठल पर आते हैं। कमल की लगभग सौ किस्में उपलब्ध हैं। जिनमें विविधता लिए सफेद, नीला, पीला, आसमानी, नारंगी, लाल आदि रंगों के फूल आते हैं।
 

फल, बीज और नाल

इसके पौधे की विशेषता यह होती है कि मुरझाए हुए फूलों की कलियाँ स्वतः ही पानी की सतह के नीचे चली जाती है। कमल की कर्णिका यानी बीजाधार स्पंज के समान धूसर रंग की होती है, जिनमें आधे इंच लंबे चिकने, काले और गोल बीज बीज रहते हैं। इन्हें कमलगट्‌टा कहा जाता है। इससे सब्जी, चिप्स, हलवा और कई दवाइयाँ बनती हैं। कमल के कंद और बीजों में ग्लुकोज, मेटाबिन, टैनिन, वसा, राल और नेलंबिन नामक क्षाराभ पाया जाता है। कमल के पौधे के सूखे हुए बीज के सिरे कई छिद्रों वाले होते हैं जो गुलदस्ते बनाने या अन्य सजावट के काम में आते हैं। इस पौधे के फूल, बीज, पत्तियाँ यहाँ तक कि जड़ें भी खाने में काम आती हैं।

भोजन में कमल

भारत तथा अन्य एशियाई देशों में फूल की गुलाबी पत्तियों को भोजन के ऊपर सजाने के काम में लिया जाता है तथा बड़ी-बड़ी पत्तियों को खाने की चीज़ें लपेटने के काम में लिया जाता है। इसकी राइज़ोम या जड़ों की सब्जी, सूप बनता है। जापान, भारत, चीन, ताईवान, कोरिया आदि देशों में कमल भोजन में किसी न किसी रूप में शामिल रहता है। भारत में कमल नाल जिसे कमलगट्टा या भसीड़े कहा जाता है बहुतायत से भोजन में सब्जी या कोफ़्तों के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इनका अचार भी डाला जाता है। कमल के बीज से मखाने तैयार किए जाते हैं जो सूखे मेवे के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।

ताप नियंत्रण क्षमता

एक शोध के अनुसार कमल के पौधे में इंसानों की तरह तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता होती है। आस्ट्रेलिया के एडेलैड विश्वविद्यालय के शारिरिक वैज्ञानिक डा़ रौगर एस. सेमुर तथा डा़ पौल शुल्ट्ज़ ने विश्वविद्यालय के वनस्पतिक बाग में पाया कि जब वातावरण का तापमान ५० डिग्री तक गिर चुका था तब कमल के फूल का तापमान ८६ से ९५ डिग्री फारेनहाइट पर कायम था। प्रकृति का यह वरदान कुछ ही पादप जातियों को प्राप्त है।

आयुर्वेद में कमल

आयुर्वेद में कमल को शीतलता प्रदान करनेवाला माना गया है। यह शरीर के रंग को उत्तम बनाता है। यह मधुर रसयुक्त, कफपित्त नाशक और दाह, रक्तविकार, विष, शरीर में होने वाली छोटीछोटी फुंसियों को दूर करने वाला होता है। कमल की पंखु़डयों का शीत, दाह कम करने वाला, हृदय का संरक्षण, रक्तसंग्राहक, पेशाब जनन और अतिसार में उपयोगी होता है। इसके उपयोग मुख्यतः रक्तपित्त, ज्वर एवं अतिसार में किया जाता है। तीव्र ज्वर में हृदय पर ज्वर पर दुष्प्रभाव से बचाने में कमल की पंखु़डयों का सेवन लाभकारी बताया गया है, जो मिश्री, श्वेत चंदन और मुलेठी के साथ लिया जाता है। इसके सेवन से तेज ज्वर की स्थिति में हृदय की ध़डकन कम होकर संतुलित हो जाती है। यह भी कहा गया है कि गर्भावस्था में भी इसके सेवन से जादुई लाभ मिलता है।

संस्कृतियों में कमल

प्राचीन भारतीय धर्मों में कमल अर्थात पद्म को मुख्य रूप से सौंदर्य तथा अनासक्ति भाव के प्रतीक रूप में देखा जाता है। कमल की जड़ें कीचड़ में रहती हैं परंतु यह पानी की ऊपरी सतह पर पंक से अलिप्त सदा प्रकाश की ओर बढ़ता है। जीवन में इसी को प्रतीक रूप मान कर चलने की बात भग्वदगीता में भी कही गई है। बौध धर्म में भी कमल को प्रतीक रूप मान लेने की बात इसी ढंग से कही गई है। बौध धर्म में मन तथा हृदय की सुंदरता व पवित्रता के साथ साथ लंबी आयु, स्वास्थ्य, खुशहाली, वृद्धि आदि को कमल प्रदर्शित करता है। कमल का फूल का संबंध बहुत से देवताओं के साथ भी है। भगवान कृष्ण के नेत्रों को कमल नयन की उपमा दी गई है वहीं लक्ष्मी, ब्रह्मा, गंगा जी तथा गणेश को भी को कमल पर विराजे देखा जाता है। विष्णु तथा सरस्वती के रूप वर्णन में कमल कमल का उल्लेख हुआ है। कमल को चेतना के केन्द्र में माना जाता है अर्थात चक्रों के प्रतीक रूप में कमल को ही स्थान मिला है। भारत के अलावा अन्य देशों में कमल के कई प्रतीकातमक रूप माने जाते हैं। जैसे मिस्र में कमल को चिन्ह को वहाँ की भाषा में सेसेन कहते हैं। मिस्री पुराणों के अनुसार कमल के फूल को सूर्य, सृजन तथा पुनर्जन्म के रूप में चिन्हित किया गया है। तिब्बत के पवित्र मंत्र 'ओम मनी पद्मे हम' में कमल रत्न को नमन किया है। पूर्वी देशों में आत्मिक विकास का प्रतीक कमल माना जाता है।

स्थापत्य में कमल

भारतीय स्थापत्य में भी कमल के विशेष स्थान प्राप्त है। मंदिरों के शिखर बंद कमल के आकार के बनाए जाते है। और भारत के राष्ट्रीय चिह्न में भी अशोक की लाट पर उल्टे कमल का चित्र अंकित किया गया है। धार्मिक चित्रों, व मंदिरों की दीवारों, गुंबदों और स्तंभों में कमल के सुंदर अलंकरण मिलते हैं। अधिकांश हिन्दू देवी-देवताओं को हाथ में कमल के साथ चित्रित किया जाता है, लक्ष्मी और ब्रह्मा ऐसे प्रमुख देवता हैं। खजुराहो के देवी जगदम्बी मंदिर में हाथ में कमल लिये हुए, ५ फीट ८ इंच ऊँची खड़ी हुई चतुर्भुजी देवी की मूर्ति है। यहीं स्थित एक सूर्य मंदिर में सूर्य को एक पुरष के रूप में स्थापित किया गया है। मूर्ति ५ फुट ऊँची है और उसके दोनों हाथों में कमल के पुष्प हैं। उदयपुर में पद्मावती माता जल कमल मन्दिर नामक मंदिर को कमल के आकार में बनाया गया है। संगमरमर से निर्मित देवी पद्मावती के इस मन्दिर में देवी लक्ष्मी, सरस्वती एवं अम्बिका की भव्य प्रतिमाएँ विराजमान हैं। राजस्थान के धौलपुर जिले में मचकुण्ड तीर्थ स्थल के समीप ही कमल के फूल का बाग हैं। चट्टान काटकर बनाये गये कमल के फूल के आकार में बने इस बाग का ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व हैं। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर में गर्भ गृह के ऊपर का शिखर कमल का आकार में है जिसके ऊपर सोने का कलश है। अशोक की लाट में भी अधोमुखी कमल का प्रयोग किया गया है। भारत की राजधानी दिल्ली में बने बहाई उपासना मंदिर का स्थापत्य पूरी तरह से खिलते हुए कमल के आकार पर आधारित है जिसके कारण इसे लोटस टेंपल भी कहते हैं।

२१ जून २०१०

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