लॉन की घास नर्म और गुदगुदी होने लगी थी। क्यारियों में
पिटूनिया के नन्हें पौधे आंखें खोलने लगे थे,
धूप
धीमा धीमा गुनगुनाने लगी थी मौसमी चिड़ियों के झुंड कनेर के पेड़ों पर
चहचहाने लगे थे कुल मिला कर यह कि डाइनिंग रूम से बाहर की ओर खुलने वाले
बड़े दरवाजे के कांच में से दिखता बगीचा गुलज़ार नज़र आने लगा था। नवंबर
का आखिरी हफ्ता था और आकाश कह रहा था कि सर्दियों का मौसम शुरू हो गया।
नीलम किरण विरमानी ने बाहर की ओर एक नज़र देखा और लस्सी
बिलोने लगीं- मटकी में नहीं, मिक्सी में। स्विच की
छोटी सी क्लिक, ज़ूम की तेज़ आवाज़ और शांति,
लस्सी तैयार। उन्होंने अपनी गोरी चिट्टी कलाई पर बँधी बड़ी सी घड़ी में समय
देखा- सात बज कर अट्ठाइस मिनट। लस्सी को गिलास में पलट कर उन्होंने बेसन के
पराठों वाली तश्तरी उठाई और खाने की मेज पर आ गयीं। विरमानी साहब ठीक साढ़े
सात बजे मेज़ पर नाश्ता करने आ जाते हैं और ठीक आठ बजे घर से बाहर ऑफिस की
ओर निकल पड़ते हैं। न जाने कितने सालों से यह क्रम चला आ रहा है।
विरमानी साहब का मानना है कि व्यापार `रमता
जोगी बहता पानी
है। जब तक बढ़ता है तभी तक
ज़िंदा रहता है। पानी को देखो अगर रुक जाए तो उसमें कीड़े या