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माँ-बाप ने बड़े शौक से
विघ्नराज नाम रखा था।
उन्हें मालूम था कि बाबू विघ्नराज
तालचर ट्रेन की तरह रुक-रुक कर एक-एक क्लास पार करेंगे।
मैट्रिक पास करते-करते वह बीस वर्ष का हो गया। दूब घास की
तरह चेहरे पर मूँछ-दाढ़ी उग आई। मन तितली की तरह उड़ने लगा।
कॉलेज में तीन वर्ष पार करते न करते पूरा फेमस। सभी जान गए
बाबू विघ्नराज को। परीक्षा हॉल में कलम के साथ-साथ चाकू भी
चलाया, फिर भी लाभ नहीं हुआ
एक दिन उसके जिगरी दोस्त
अमरेश ने आकर समझाया, 'भाई, इस पढ़ाई से कोई लाभ नहीं
होनेवाला है। मान लो, कांथ-कूथ कर किसी तरह हमलोगों ने बी.ए.
पास कर लिया, तो भी ज़्यादा से ज़्यादा सब इंस्पेक्टर या
हवालदार ही तो होंगे। रोज़ मंत्री को सौ सलाम ठोंकना होगा।
बात-बात पर डाँट-फटकार और कदम-कदम पर ट्रांसफर की धमकी।
इस
गुलामी से तो अच्छा है चलो राजनीति करेंगे। वह किशोर है न
अरे वही, हमारा नवला, तीन बार बी.ए. में फेल हुआ। आज
एम.एल.ए. है। आगे-पीछे गाड़ी चक्कर काटती फिरती है। लक्ष्मी
रात-दिन घर-आँगन में घुंघरू खनकाती रहती है। बड़े-बड़े ऑफिसर
चारों पहर खुशामद करते रहते हैं।'
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