साहित्य संगम

साहित्य संगम के इस अंक में प्रस्तुत है राजकुमार पंड्या की
गुजराती कहानी का हिन्दी रूपांतर कम्पन जरा जरा, रूपांतरकार हैं सुशीला जोशी।


लड़के की कॉपी से एक कविता निकली। बतौर एक बाप के पढ़ने का मेरा फर्ज। पढ़ा तो उस में किसी बेनाम लड़की के प्रति कुछ मुक्तक थे। इस जमाने में किसी को कविता बनानी नहीं पड़ती। फिल्म के गीत ही ये काम कर देते हैं। फिर भी कनक को क्या जरूरत पड़ी कविता करने की? लगता है, कुछ ज़्यादा ही डूब गया है आशिकी में। अभी तो मूँछ के चार डोरे फूटे हैं और आवाज की घाँटी भी नहीं फूटी, तभी से यह? हकीकत में ज्यादा दोष लड़कियों का ही होता है। नज़र से नज़र वह मिलाए, आँखें पटपटाए और फिर सामने वाला आसामी तनिक घायल हो कि ये मायाएँ दो-चार कड़े तीर उड़ा दे। फिर तो कविता, शेरोशायरी और ऐसा ही सब कुछ नरम मुलायम रुई जैसा उड़ता रहे और इसी तरह टाँगागाड़ी जुड़ जाए। हमारे ज़माने में बिलकुल ऐसा नहीं था।

लड़के की कॉपी से एक पिचका हुआ फूल भी निकला। इस के अतिरिक्त तितली का एक पर, किसी ऐक्टर के हस्ताक्षर, किसी दोस्त का पता, फोन नंबर वह सब एक बारगी निकला। एक पन्ने पर गावस्कर के द्वारा किए गए रन की लिखी-काटी सूची। दूसरे पन्ने पर एस-टी, के पास का नंबर और उस के नीचे भी दो बादाम जैसे दो दिलों को एक ही तीर से बींधे और भीतर से रक्त रिसता रहे ऐसी बूँदें। दरअसल यह सब उस उम्र की खासियत है यह भी सच है और यह भी सही है कि इससे कोई मुक्त नहीं।

लेकिन हमारे ज़माने में ऐसे फंडे नहीं थे। कनक ने घंटी बजाई तो मैने झटपट उसकी कॉपी बंद कर दी और सामने के शीशे में गहरा उतर गया होऊँ, यों उसके ड्रेसिंग टेबल पर ही चिपका रहा। उस ने दरवाजा खोला तो ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी अपनी कॉपी देख कर उसे कुछ असुख-सा महसूस हुआ है यह मैं ने शीशे में देखा। लेकिन मैं भी कम नहीं। हम तो ऐसे देखते रहे गोया नोट बुक को देखा ही किसने हैं!

उसने झट से कॉपी उठाई, बगल में दबाई और जाने के लिए कदम उठाया तभी मैं शीशे से बाहर निकला, "कनक,"
वह अचकचाकर खड़ा रह गया।
"कहाँ चले, यों आ के तुरंत?"
"फ्रेंड के घर", वह बोला, "पढ़ने के लिए।"
"कौन-सा फ्रेंन्ड?"
मुँह पर आया सो नाम फेंक कर गच्छंति की उसकी मंशा। लेकिन हमने भी सिर के सारे के सारे सफेद बाल चुन थोड़ी न लिए थे, सब समझते हैं। लेकिन किसी को सीधा नोच कर खुला करने की अपनी आदत ही नहीं। फिर चाहे बेटा ही क्यों न हो।
"अपनी मम्मी से मिल कर जाना।"
"क्यों?"
"क्यों?"
अब क्यों और त्यों। ऐसे सवाल ही गैरज़रूरी होते हैं। यह तो वह भी समझ सकता है। मैंने 'क्यों' का जवाब दिया तो उ
स ने कॉपी को टेबल की दराज़ में ठूँस कर दराज़ को चाबी लगा दी और अंदर के कमरे में गया। मैं पुनः सोच में पड़ गया।

ज़माना बारीक है। किसी तीसरी के प्रेम में पड़े हुए जवान लड़के को सीधा यों ही दूसरी को पसंद करने के लिए कहना हो तो उस के लिए भी होशियारी चाहिए, जो अपने पास न मिले। इस मामले में मुझे बीच बचाव करना चाहिए ऐसा विचार भी पैदा हो कर मर गया। विचार इसलिए मर गया कि दूर की सोचने पर यह समझ में आया कि औरतें जिस नज़ाकत से बात कर सकती है हम नहीं कर सकते। व्यापार में भले ही हम जो भी चालाकी कर लें, लेकिन ऐसे मामले में तो आखिरी फैसले पर मार ही खा जाएँ। मान लो कि यह इकलौता बेटा कहे कि कॉपी में लिखी हुई इस लड़की के सिवा दूसरी नहीं चलेगी तो क्या हम सामने मुस्कुरा सकेंगे? अरे धौल-धपाट तक बात पहुँच जाए और यों करने के बाद भी निपटे तो नहीं ही। अतः आखिर उसकी मम्मी के ज़िम्मे डाल दिया।

वह अंदर के कमरे में गया और मैं यहाँ वह प्रेम क्या चीज है इस सोच में पड़ गया। अपने को हुआ था या नहीं किसी दिन, याद्दाश्त पर बड़ा ज़ोर दिया, याद किया, खूब याद किया, देर लगी। पचास-साठ साल का अंतर पिछले पैरों काटें तो देर तो लगेगी ही न, न जाने कितनी बिन्दियाँ भाल-प्रदेश झलकीं-छलकीं और छुप गईं, शुरू-शुरू के दो-चार अफलातून
थे। वे सब पंद्रह सत्रह की रही होंगी, और मैं बीसेक का, मुश्किल से।

छोटी-सी दुकान पर नौकरी करता था। कितनी पगार, लिखना, यह भी तय नहीं। पढ़ सकते थे उतना भर पढ़ लिया। बाकी नौकरी तय करवा दी थी इसलिए करता था। साइकिल चलानी आती थी, यह अपनी योग्यता। इधर-उधर नज़र नहीं डालने की यह दूसरी योग्यता।

विचार यहाँ तक पहुँचा तभी अंदर से कनक आ गया। पीछे-पीछे उसकी मम्मी आई। ड्रेसिंग टेबल के आईने में वे दोनों मुझे दिखाई दिए कि तुरंत ही मैं, जो मन में दूर तक आगे निकल गया था, पीछे मुड़ गया। बोला, "क्यों?"
"कनक मान गया है", वह बोली, "तुम बाप-बेटे कल सवेरे निकल जाओ।"
कनक की ओर मैं ने देखा लेकिन उसने नहीं देखा। खीझ में हो तो मेरी बला से। अपने को तो वह साथ आने के लिए रेडी हो गया यही नफ़ा था। लड़की को देखेगा फिर तो नफा ही नफा है। मनहर गोविंद की लड़की में क्या कमी है, रूप, गुण, पढ़ाई, पैसा और गठन सब कुछ है।

कनक के न कहने का कोई कारण नहीं। एक दफा यदि उस में वह भीग गया तो फिर नोटबुक वाली बेनाम लड़की के
लिए लिखी सारी कविताएँ उस के नाम ट्रांसफर हो जाएँ, यह बात कठिन नहीं हो सकती है।

सवेरे हम निकले तो साथ ही लेकिन वह मुझ से बिलकुल अजनबी-सा चलता रहा। उस के बगल के थैले में देखा तो वही नोटबुक। तो यह बात है, कच्ची बुद्धि करीब बीस एक साल तक रहती है। अभी इसे इक्कीसवां लगा है। वरना यह कूड़ा साथ में लेने का कोई कारण? पूछा तो बोला कि मेरी इम्पॉर्टन्ट क्वेश्चन्स और श्योर सजेशन्स की नोटबुक है। रास्ते में पढ़ने के लिए रख ली है। हालांकि मैं जानता था कि अंदर कौन से क्वेश्चन्स और कौनसे सजेशन्स हैं और किस तरह के इम्पॉर्टन्ट हैं, लेकिन उसकी मम्मी के साथ मैं ने बोली की थी कि जहाँ तक हो सके ऐसा व्यवहार करूँगा कि मैं इस लड़के के बारे में कुछ जानता ही नहीं। वरना हो सकता है कि कहीं ऐसा हो कि इस का दिमाग फिर जाए और यह
प्लेटफॉर्म से ही वापस लौट जाए, इसलिए मैंने कहा, "अच्छा"।

बाकी लड़की जो मुझे इस वक्त याद आई वह थी परागी। उस के साथ कोई प्रेम जैसी चीज़ अपने पास नहीं मिलेगी। बात सिर्फ इतनी कि हमारे घर में मैं चौदह साल का हुआ तब से कुछ भनभन हुआ करती थी कि उस के साथ मेरी सगाई होने वाली है। उस वक्त एक दफा उसे देख लेने को मन किया था, सो ज्यों का त्यों बना रहा। मौका ढूँढ़ रहा था तभी मिल गया। एक दोस्त के बड़े भाई की साली लगती थी वह। परागी, परागी नाम उस के मुँह से बार-बार सुनता और फिर वह नाम भी ऐसा कि किसी का न हो इसलिए मैंने जब दोस्त से पूछा कि यह जो परागी, परागी होता है वह मगन भगवान की लड़की तो नहीं? यदि वही हो तो जिस के साथ मेरा रिश्ता जोड़ने की बातचीत चलती है, वही है। अपने को एक बार अकेले में देखने को मिल सकती है!

एकांत में देखने को मिले इसके लिए मैं दोस्त से इतनी दफ़ा बोलता रहा कि कुछ दिन तो उसने मेरे साथ बोलना ही छोड़ दिया। उस वक्त यह हाल था। इस कनक की तरह ऐसा नहीं कि नोटबुक में कविता बविता लिखी है और तितली का पंख जुटाया है और दिल-बिल खींच कर खून-बून निकाला है। कनक नोटबुक ले कर स्टेशन पर इस तरह घूमता था जैसे मैं हड़प लेने वाला होऊँ। बचकानापन ही है, उसके सिवा और क्या, गाड़ी चलने के बाद मेरे मन में सरसराहट हुई, "
अरे भई, क्या है इस में इतना कि इस कदर चिपकाए रहता है?"

पहले तो वह चौंक गया। लेकिन फिर गंभीर हो गया। बोला, "सच बताऊँ पापा, इस में मेरी अपनी फ्रेन्ड पर लिखी कविताएँ हैं।"
"फ्रेन्ड," गोया मैं कुछ जानता ही नहीं। कहने की क्या जरूरत- "गर्ल-फ्रेंड," वह आँखें नचाता हो इस अंदाज में बोला, "बड़ी स्वीट लड़की है, पापा . . ."
मैंने उसकी मम्मी से कहा था कि बात नहीं छेडूंगा। लेकिन अब जबकि भाई श्री खुद ही बात की गुत्थी छोड़ रहे हैं तो मुझे अपनी बोबड़ी बंद रखने की कोई वजह हो सकती है, पूछ ही डाला, "लव-बव का कोई लफड़ा तो नहीं हैं न, बेटे?"
हँस दिया वह। मंद मुस्कान से ज्यादा। बच्चे की तरह बांकी मुस्कान के साथ वह बोला, "हो भी तो क्या पापा?"
"
क्यों?"
"आप मुझे उस के साथ मैरेज करने देंगे?" वह बोला, "मम्मी बता रही थी कि करने ही नहीं देंगे।"

हद हो गई इस लड़के की। ऐसा पूछा जाता है? परागी के साथ मेरी सगाई की बात करीब नब्बे प्रतिशत निश्चित थी फिर भी मैं ने कभी अपने बाप से यह पूछा था कि सगाई कब करने वाले हो? अरे, उस विचार से ही अपनी नस फट जाती और बात से बाप की नस फट जाती। वैसे मन तो यही करता कि पूछ, पूछ। क्योंकि परागी मुझे अच्छी लगती थीं। यों तो नाम से ही अच्छी लगने लगी थी लेकिन बाद में जब एक विवाह-प्रसंग में हम आमने-सामने आ गए तभी तय कर लिया था कि शादी करनी होगी तो इस सूरत के साथ ही। बात दरअसल यों बनी कि मैं और मेरा दोस्त चले जा रहे थे और देखा तो सामने से एक मक्खन का पिंड-सा चला आ रहा है। आसपास दो-चार सहेलियाँ भी थीं। लेकिन वह सबसे अलग उभर आती थी। ताज़ा-ताज़ा कमल। यों लगे जैसे तालाब से नहा कर सीधी चली आ रही हो। मुझे देख कर क्या पता किसी सहेली ने उस के बाजू पर चुटकी ली हो या भगवान जाने, पर वह एकदम धीमी पड़ गई। सामने देखा-
अनदेखा किया और पुतलियाँ झुक गईं। उसकी सहेलियाँ भी कैसी कि आसपास इधर-उधर हो गईं। बावरी-बावरी सी हो कर वह आसपास देखने लगी। उस वक्त मैं ने देखा तो मेरा भी दोस्त अंतर्धान, हमें मिलाने की यह साजिश। उस का मुँह लाल-लाल हो आया। आँखों में नज़र करो तो बिलकुल तराशी हुई लगें। बार-बार पलकों के पलकने से एक पैमाने पर घूमती रहें।
मुझे खुशी, संकोच, छाती धकधक !! सब एक साथ हो आया था !! मुझे याद है।
वह भी खड़ी रह गई थी, वहीं पर। मैं आगे चला। उसके नज़दीक आया तो लगा गोया सुख का ढेर यहीं हैं। यहाँ होने का सुख यानी दुनिया भर का सब से बड़ा सुख।
"कैसी हो?" बिलकुल आहिस्ता साँस में बोलना हो, यों मैं बोला।
चिड़िया की चोंच की तरह गुलाबी ओठों में कुछ कंपन हुआ लेकिन कोई शब्द अंदर से फड़फड़ा कर बाहर आ पड़े उस से पहले ही बाहर यकायक शहनाई के सुर शुरू हो गए। औरतों के झुंड की इस ओर आने की पदध्वनि सुनाई दी। परागी कुछ काँप उठी और तुरंत ही सावधान हो गई।

"
आप जाइए यहाँ से।" वह बोली, "बाद में . . .बाद में मिलिए।" बोलते-बोलते उसे लगा कि कुछ महापाप हो गया हो जैसे। वह ऊपर-तले होने वाली छाती पर हाथ लगा कर बोली, "हाय माँ, अब क्या होगा?"

लेकिन कुछ हुआ नहीं। मैं आगे निकल गया। थोड़ा-सा कंपन तो मुझ में भी व्याप्त गया होगा। बर्फ की तरह क्षण के सुख का गठ्ठर पिघलने लगा। बाहर निकल कर जा कर देखता हूँ तो समूची दुनिया ही बदल गई थी। ढोली ढोल पीट रहा था, ब्राह्मण श्लोक बोल रहे थे। औरतें बैठी-थकी आवाज में गीत गा रही थीं और गली में कोने पर जूठी पत्तलों का ढेर पड़ा था। गाय वहाँ खड़ी हो कर नथुने फड़का रही थी। सब कुछ बड़ा मामूली लग रहा था। मेरे मतलब का उस में कुछ नहीं था। मैं इन सबसे दूर, अलग जरा ऊपर उठ गया था। छलक-छलक हो रहा था अंदर ही अंदर। दोस्त ने आ कर पीछे से पीठ पर मुक्का लगाया। कान के पास किसी ने पटाखा फोड़ा हो, इस तरह मैं सहम गया।
ऐसा होता था उस वक्त, चालीस साल पहले। खूब याद किया तो पूरा टूकड़ा ज्यों का त्यों निकल आया।
"
पापा . . .", कनक ने पूछा, " किस विचार में खो गए?"

"कुछ नहीं, यह तो . . ." मैं ने कहा, "अपनी मैरिज की बात तुम ने खुद निकाली इसलिए सोच रहा था कि हम जिस कन्या को देखने जा रहे हैं वह यदि मन में जँचे तो फिर ज्यादा खींच तान मत करना। हाँ कर देना।"
उसकी मुस्कान भी मज़ाक जैसी - या मुझे ही ऐसा लगा हो। चालू गाड़ी में ज्यादा क्या कहना, वरना अपना दिमाग तेज़। कुछ नहीं बोला वह और आँखें बंद कर सोच में पड़ गया। पहली बार मुझे यह महसूस हुआ कि इसे रेज़र से रोज़-रोज़ की मूंछे उतार लेनी चाहिए। यों तो आदमी देवदास लगे।
कुछ बात तो करनी चाहिए न, पूछा, "वह है कौन?"
हाथों की दाब और आँखें खोल कर मेरे सामने देखा, "कौन?"
"यह जो तुम बता रहे थे वही तुम्हारी गर्लफ्रेन्ड," गलत नहीं कहा जाएगा। उस के गालों पर कुछ शर्म तो झलक आई।

हमारे ज़माने में हम जिस तरह शर्म में गड़ जाते थे वैसा नहीं। हमारे ज़माने में तो अपने पिता जी के साथ ऐसे डायलॉग कभी होते ही नहीं थे। यदि डायलॉग हो सकता तो मैं ज़रूर कह देता कि हमारी परागी के साथ ही जमने दो, और आज लगता है कि कहा होता तो शायद हो भी जाता। ओहो! ओहो! तो फिर बात कहाँ करनी! बिल्कुल उधेड़ लिया था उसने अपने को। जहाँ-तहाँ भीड़ में मैं उसे ही चुनता फिरता। और मिले नहीं तो न मिलने के लिए उस पर खीझ भी आ जाती। एक दफा स्कूल जाती हुई लड़कियों के झुंड के पीछे-पीछे दो-तीन गलियों तक आया और उन में से लंबी झूलती चोटी वाली जो है वही परागी हो, यों नज़र को मनाता रहा। लेकिन निकली कोई और ही। उस वक्त भी उस पर खीझ चढ़ी। उस झुंड में वह क्यों नहीं थीं, होना चाहिए न? यह बात मैंने अपने दोस्त से कही तो वह बोला कि परागी तो दूसरे स्कूल में पढ़ती है। वह इस रोड से कैसे निकलती, यह बात भला अपने को कैसे मालूम होती? मैं कोई उसे पूछने थोड़ी न गया था कि, भई तू किस स्कूल में पढ़ती है? कब जाती है? किस-किस से मिलती है? रास्ते में मैं फव्वारे के पास मिलूँ तो टेढ़ी नज़रों से भी मेरे सामने देख लेगी या नहीं? लेकिन एक बार फेस टु फेस हो तो पूछूँ न? जहाँ चेहरा ही दुबारा मुश्किल से देखने को मिला वहाँ दूसरी बात कैसे की जाए?

दुबारा चेहरा देखने को मिला वह भी मुश्किल से। गुरुकुल के मैदान में गाँव के तमाम स्कूलों का कोई समारंभ जैसा था। दोस्त ने बताया कि उस में परागी तो आएगी, आएगी और आएगी ही। उस में आना अनिवार्य होता है। इस संजोग का तो अपने को लाभ लेना ही है, यों अस्सी मिनट में मन में गाँठ लगा ली।
गाड़ी रुकी तो कनक ने पूछा, "पापा, आप फिर सोच में पड़ गए?"
"ना . . .ना," मैं ने कहा, "यह तो ज़रा यों ही नींद-सी लग रही थी।"
वह उतर कर नमकीन ले आया। पानी के गिलास भर लाया। हमने नाश्ता भी किया लेकिन चुपचाप। आखिर उस के मन में ही जो हलचल मची हुई थी सो उसी ने पूछा, "पापा, आप कुछ कह रहे थे न?"
"क्या?"
"कि मेरी वह स्वीट गर्ल फ्रेन्ड . . ."
"तू शर्माने लगा तो मैं ने पूछना छोड़ दिया। फिर सुस्ताने लगा।"
वह आँखों में चमक भर के बोला, "उस में तो ऐसा है पापा कि चोरी नहीं। हमारा पूरा कॉलेज जानता है कि उस के लिए मुझे ऐसा है।"
मुझे कुछ याद आ गया, "लेकिन वह खुद जानती है या नहीं?"
"
जानती ही होगी न?"
"जानती होगी के माने? तुम्हारी कभी बात नहीं हुई?"
"
ना" वह बोला, "बात तो नहीं हुई, एक बार फेस टु फेस मिले थे उतना ही . . .लेकिन उस में वह समझ नहीं सकती।"

काफी, काफी दूर से पटाखे की आवाज़ आ रही हो यों मेरे मन में एक शब्द फूटा : "लड़की . . ."
मैं प्रकट रूप से बोला, "लड़की की जात का कुछ कहा नहीं जाता। लेकिन बात हुए बगैर किस तरह जाने, तुझे बात कर लेनी चाहिए न, उस के बाद मेरे शब्द तड़ातड़ फूटे, "बात कर ही लेनी चाहिए, यह कोई पहले का ज़माना थोड़े ही है। आजकल तो कितना अच्छा है कि लड़के-लड़कियाँ साथ पढ़ते हैं . . . एक दूसरे के साथ बातें करते हैं और . . ."
"
लेकिन . . .," उसने कहा, "लड़कियाँ आज भी शर्माती हैं।"

बात सही होगी। परागी के साथ दो शब्द बोलने के लिए अपने राम ने जितने प्रपंच किए थे उसकी फेहरिस्त बड़ी लंबी है। स्कूल के समारोह के समय गुरुकुल के पिछले भाग में मिलने की बात मैंने मन ही मन तय कर ली थी। उस में भी एक पुराना आम का पेड़ मैंने मन ही मन सजा लिया। ज़्यादा कोई अनुमान नहीं बस इतना ही पूछना था कि, '"मैं तुझे अच्छा लगता हूँ?" दोस्त से कह दिया था कि तुम्हारा तो उस के घर आना-जाना है। यों इतना मिलने का कुछ जमा दो तो उपकार। कोई न जाने ऐसे कह देना। लेकिन दोस्त भी ऐसे दिमाग का कि कहने के बाद आठ दिन तक झाँक कर देखा तक नहीं। यहाँ मेरी जान जाती थी। परागी के स्कूल के मार्ग पर सुबह-शाम हाथ में हरकारे की डाक हो यों खड़ा रह जाता। उसे आते-जाते देखता। उस का ध्यान जाता तो वह नीचे नज़र करके और लड़कियों के साथ निकल जाती। मुझे तो उस से इतना ही पूछना था कि, "तू तो मुझे विद्या की कसम इत्ती अच्छी लगती है कि बात नहीं, लेकिन मैं तुझे अच्छा लगता हूँ?" यदि इतनी बात का जवाब 'हाँ' में मिले तो यह भी पूछना था कि, "हमारी सगाई की बातचीत चल र
ही है, वह तेरे घर में कहाँ तक पहुँची?"

इतनी बात करने के लिए गुरुकुल के पुराने आम के पेड़ के पास मुझ से मिलाने के लिए दोस्त से कहा था तो वह मुझे लटका कर आठवें दिन आया और बोला कि, "कह दिया है।" मैंने पूछा कि "क्या," तो बोला कि, "उस में रिपीट क्यों करवाता है? तू ने कहा था वही कह दिया है।" मैंने पूछा कि, "हाँ कही या ना?" तो पूछता है, "किस बात की?" मैंने कहा कि, "मूरख, मिलने की। मिलने की हाँ कही या ना? जवाब में वह बोला नहीं पर हंसोड़ की तरह, अपने को खीझ चढ़े यों हँस दिया। हँसते-हँसते दूर चला गया और वहाँ खड़े-खड़े पेन्सिल की नोक निकालने लगा। बाद के चार दिन तो कैसे गुज़रे वह मेरा मन जानता है। परागी ने मिलने की हाँ कही होगी या ना, लड़की की जात है। डरपोक होती है। न भी
आए। हालाँकि मन कहता था कि आएगी, आएगी ज़रूर।

समारोह के दिन सबेरे से गुरुकुल के पिछवाड़े के मैदान में हेरा-फेरी करता रहा। न जाने क्यों जी मचल रहा था, सेठ के पास से छुट्टी ले कर सबेरे से ही निकल गया था लेकिन यों लगता था जैसे नौकरी में था ही नहीं। होना भी नहीं चाहिए। सब से अलग-थलग फिरता और बार-बार नज़र पुराने आम के तने के पास डोरे की तरह लिपटती रहती। ऐसा होता था। इस वक्त याद आ रहा है।

यकायक ज़ंजीर खींची गई और गाड़ी रुक कर खड़ी हो गई। बिलकुल वीराना-सा था तो भी सब नीचे उतरने लगे। कनक उतरे तो मुझे अच्छा न लगे। अतः उसे बिठाए रखने के लिए ही मैं ने पूछा, "मिले हो या नहीं किसीं दिन?"

"यों तो एक बार एक नाटक में हमें एक साथ उतरना था।" वह बोला और फिर विचारों में बह गया। लेकिन तभी गाड़ी हिचकोले के साथ चली। कोई बोला कि किसी ने यों ही बिना किसी वजह जंजीर खींची थी। चालू गाड़ी को व्यर्थ ही हिचकोले खाने पड़े। फिर से कनक मेरे सामने देख कर बोला, "पापा, सच बताऊँ? मुझे और उसे एक ही डायलॉग एक साथ बोलना था। लेकिन बात यह हुई कि वह मेरे सामने आई और मैं डायलॉग भूल गया। वह अपना डायलॉग बोल कर चली गई और मेरे बाद बोलने की जिस की बारी थी वह लड़का भी अपना डायलॉग बोल कर चला गया। में स्टेज पर रहा लेकिन कुछ बोल नहीं सका। उसी में घपला हो गया।"
"
ऐसा हो जाता है, कई बार," मैंने उसे आश्वासन देने के हिसाब से कहा।

मैं तो साढ़े पाँच बजे से पुराने आम के पेड़ के पास पहुँच गया था। बेवजह पहले से ही मन में दहशत पैदा हो गई थीं कि परागी नहीं आएगी। और कमबख्त बुरी कल्पना सच बनने के लिए हमेशा आगे दौड़ती रहती है। अपने को इस बात का खूब अनुभव है। पौने छह, पौने छह और पाँच, छह में पाँच कम और छह भी बज गए। झाडू की तरह आँखें घुमा-घुमाकर थक गया। साढ़े छह बज गए। कहीं दिखाई न दी। थोड़ी-सी ठंड, थोड़ी-थोड़ी हवा। सात बजे और आम के पत्ते खड़कने लगे। लेकिन सब कुछ खाली लग रहा था। फीका और नीरस। बिलकुल मरियल। बिलकुल रंग विहीन।

साढ़े सात बजे एक बूढ़ा आया। चपरासी के सिवा कौन हो सकता है, मुझ से पूछा, कौन है? यहाँ क्यों खड़ा है? मैं क्या जवाब देता? उसने मुझे मैदान से बाहर निकाल दिया। मुझे यह भरोसा करना अच्छा लगा कि यदि पौने आठ तक रहने दिया होता तो शायद परागी आ भी जाती।

निकल कर समारोह में जुड़ गया। लड़कियों का गरबा नृत्य चल रह था। एक-एक चेहरा देख लिया। कहीं परागी, कहीं परागी नहीं थी। बाहर निकला तो वह दोस्त मिल गया।
"
क्यों?" उसने पूछा, "खूब राह देखी न," फिर उपहास के अंदाज़ में बोला, "कैसे आती? आज दोपहर को उस को मामा आ कर ले गए।"

फिर पता चला कि बड़ी साज़िश चल रही थी। मामा ने अपने साले का लड़का उस के लिए तय किया था। दिखाने ले गए थे। सवाल एक ही कि बिलकुल यों ही चली गई होगी? किसी तरह की हाँ-ना नहीं की होगी? फिर मुझे ही दूकान में बैठे-बैठे पुनः विचार आया कि ये सारे सवाल ही बचकाना थे। जिन का जवाब 'ना' में ही आता था। पहली बात तो यह कि हमें और उसे क्या? प्रेम-व्रेम था? बात-वात हुई थी? सगाई की बात जारी थी। हुई नहीं थी, होने वाली थी। यह बात अलग है। रूबरू भी तो ज्यादा मिले नहीं थे। मामले में था कुछ, कि अंदर ही अंदर कुलबलाते रहें, यदि एकाध बार मिले होते तो भी बात व्यावहारिक लगती।

"कनक," मुझसे अनायास कनक को पूछा गया, "उस नाटक वाले मामले के बाद तू मिला या नहीं कभी उससे?"
"नहीं मिला, मिलूँगा कभी।"
मिल लो अब, न जाने वह 'कभी' कब आए, किसे पता? 'कभी' पचास साल के बाद भी आ सकता है। दोस्त खबर लाया था कि परागी की सगाई हो गई। सुना तब मैं जूनागढ़ के पार्सल की लिस्ट बना रहा था। उसे पूरा किए बिना उठा नहीं जा सकता था। पूरा करके पान खाने गया तभी पूरी बात सुनी। सोडा पीने का मन न जाने क्यों हो आया। सोडा अच्छी चीज़ है। उस से मुँह का फीकापन दूर हो जाता है। वह सब रास आ गया दो-तीन साल में। अपनी भी सगाई हो
गई। ठाठ-बाट में पड़ गए। नौकरी का नशा दिमाग पर सवार हो गया। धंधा शुरू किया तो उसका और भी डबल स्ट्रांग नशा चढ़ा। पाँच साल-सात साल-दस साल-शादी, संसार और बच्चे। पैसे पैदा किए, उसका भी नशा कुछ ऐसा-वैसा थोड़ी न रहता है!

बीच-बीच में परागी के समाचार मिल जाते थे। पति के साथ पटती नहीं थी। पीटता था खूब उसे। किस का दोष है, उसने दूसरी बीवी की, यह समाचार भी किसी ने दिया। उसका छोटा भाई मेरे पास वाली दूकान में गुमाश्तागीरी करता था। उसी ने एक दफा बताया था कि बहन घर आ गई है और अब उसे वापस भेजना नहीं हैं।

उसी शाम मैं गुरुकुल के मैदान से छोटे रास्त पर मंदिर जा रहा था। मैदान के फाटक में दाखिल होते ही दूर तक नज़र दौड़ गई। यों भी हर रोज़ पुराने आम के पेड़ से टकराने की एक आदत-सी पड़ गई थी। उस दिन भी नज़र दौड़ा दी तो शाम के हलके धुँधलके में दूर से एक सफेद धब्बा-सा दिखाई दिया। ज़रा दस-पंद्रह कदम पार किए तो दिखाई पड़ा कि कोई सफेद साड़ी में आम के तने के पास पीठ करके खड़ा था। कमर के नीचे से फूली हुई कोई औरत है यह तो तुरंत समझ में आ गया था लेकिन परागी है यह तो बिलकुल पास जाने पर ही पता चला। लंबे, काले बाल कहाँ गए, अरे! एक छोटा-सा जूड़ा लटकता था। साड़ी सफेद? लेकिन उतर कर गर्दन तक आ गई थी इसलिए मालूम पड़ा कि अच्छी-खासी सफेदी छंट गई थी बालों पर। शरीर स्थूल। न जाने क्यों? पगडंडी की ओर पीठ करके आम के ठूँठे तने को अपलक आँखों से देखती हुई खड़ी थी। मानो उसके सामने खड़े हो कर उसका ध्यान धर रही हो। मैंने गला खँखारा तो
उसने चौंक कर पीछे देखा। मुझे पहचान तो लिया होगा ऐसा लगता है, क्योंकि आँखों में ज़रा-सी ठंडी मुस्कान की फुसफुसाहट-सी हुई। लेकिन वह तो एक ही पल। फिर गंभीर हो गई।

किसी ने जंजीर खींच कर गाड़ी को रोक दिया हो यों। मैं भी रुक कर खड़ा रह गया। बोलूँ। बोलूँ, मन किया। पर क्या बोलूँ? बोलने का सवाल ही कभी कहाँ पैदा हुआ था हमारे बीच, 'कैसे हो' पूछना भी नसीब नहीं हुआ। मुँह में शब्द बनते-बनते रह गया। नज़रों में पहचान जगी और फिर व्यवहार बनते-बनते रह गई। एक आध पल मैं रुका। ज़रा-सा मुँह मुस्का दिया और कंपन-सा लगा। तुरंत आगे निकल गया। कोई पीछे से धक्का मारता हो, चला रहा हो इस कदर तेज़ी से मैं चलने लगा। कोलाहल-कोलाहल-कोलाहल हो गया मन में। लेकिन रुका नहीं। समझता था कि वह सब व्यर्थ है। मन व्यर्थ ही फुफुड़-फुफुड़ होता है। जिस के साथ सिर्फ एक बार ही सगाई की बात चली थी, और एक बार 'कैसे हो, का व्यवहार हुआ था उसके लिए भला इतना सारा कोलाहल? चलते हुए बैल को आर घोंचने का काम व्यापारी का नहीं। कितने सुखी हैं हम। घर-बार, धंधा, आबरू, नौकर-चाकर, घर सम्हाले ऐसी पत्नी, जब कहो तब कन्या देखने के लिए चल पड़े ऐसा लड़का। माल-मिल्कियत क्या नहीं है अपने पास? एक हरकारे की पेढ़ी में काम करते थे उसमें से यह सब बसाया। कितना भोगा? तब कहीं सफल हुए। ज़िंदगी में सफल हुए। कभी भी किसी चीज़ का गम अपने को रहा नहीं, डंक रहा नहीं। फिर भी यह पुराने आम के ठूँठ के पास से निकलते समय खटका क्यों होता है? क्यों? कोई कारण है भी? डंक जैसा क्यों लगता है? कारण? यों ही।

शीघ्रता से मंदिर में जा कर एक हाथ में टोपी उतारी, ज़ोर से घंटा बजाया तो इतने ज़ोर से बजा कि सब विस्मय से देखते रह गए। कानों में घंटी की कंपन हुई तो ज़ोर से आँखें बंद कर के भगवान की स्तुति में ओंठ फड़फड़ाने लगे। फिर पीछे हारमोनियम ले कर भजन गाने के लिए बैठे हुए भगत से कहा, "आप अपना चालू कीजिए।" मैं कुछ काँप उठा था। ऐसा हुआ था तब।

"कनक," विचारों से बाहर निकल कर मैं ने कहा, "हम जब तुम्हारी उम्र के थे तो हमें भी किसी के साथ बात करना अच्छा लगता था इसकी ना नहीं, लेकिन यों पढ़ाई या धंधे की बलि दे कर तो कुछ भी नहीं, समझे?
मुझे लगता है, आजकल के लड़के उलटी खोपड़ी के होते हैं। एक कान से सुन कर तत्काल दूसरे कान से निकाल दें। कनक भी उन से अलग नहीं। इतना-इतना कहने के बावजूद वह चालू गाड़ी में उस नोटबुक को निकाल कर पढ़ने लगा। क्या कहना, जैसे ही उसने कॉपी खोली कि भीतर से तितली का कटा हुआ पंख नीचे सरक गया और हवा के थपेड़े के साथ खिड़की से बाहर उड़ गया। वह खड़ा हो गया और आँखें फाड़ फाड़ कर खिड़की से बाहर झाँकने लगा।

न जाने क्या सूझा कि मैंने भी उठकर खिड़की से बाहर गर्दन निकाल कर देखा। लेकिन सरपट भागती गाड़ी के बाहर उड़ जाने वाली पंख जैसी चीज़ यों भला फिर से देखने को मिल सकती है? वह तो गई सो गई ही। मैं भी लड़के के साथ लड़का हो गया सो देखने को मन हुआ। वरना ऐसे कंपन की मैं भला परवाह क्यों करू!

 

१६ नवंबर २००२