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दोपहर के खाने का समय हो गया था!
`कुछ समय के बाद दो व्यक्ति आकर खाने का ऑर्डर लेने लगे। नवीन
ने अपना ऑर्डर दे दिया! लड़की और वृद्ध सज्जन ने कोई
ऑर्डर नहीं दिया।
`बेटी, चलो खाना खालें,' कहकर दादाजी साथ में लाया हुआ लंच बाक्स उठा लिया!
`मै अभी आई दादू,' कह कर विद्या वाशबेसिन की तरफ चल दी!
विद्या को जाते
हुए देखकर नवीन को एकदम झटका लगा। वह लंगड़ाते हुए चल रही थी!
उसका बायाँ पैर रबर का मालूम होता था!
नवीन के चेहरे का रंग बदल गया! अब तक उस के मन में विद्या के
प्रति जो मोहक भावनाएँ उठ रही थीं वे
सहानुभूति में बदल गईं। वह सोचने लगा -`इतनी सुंदर लड़की को
ऐसी कमी? लड़कियों को अंग वैकल्य हो तो, उन की शादी में कितनी
दिक्कत होती है? आजकल जिनके सब अंग ठीक हैं उनका भी जीना
मुश्किल है, ये लड़की अपना जीवन
कैसे संभालेगी?'
इतने में उस का खाना आ गया !
तीनों ने भोजन कर लिया! दादाजी झपकी लेने लगे! और विद्या ने फिर
से
किताब उठा ली!
`विद्या! मुझे पता नही चला की आप विकलांग है!
यह हादसा कब और कैसे हुआ?'
`तीन बरस पहले, तब मै डिग्री के दूसरी साल मे थी! एक सड़क
दुर्घटना में मेरा पांव चूर-चूर हो गया!
इसीलिए नकली पांव लगाना पड़ा!`
`बड़े अफ़सोस की बात हैं।'
`अफ़सोस क्यों? जो हुआ, सो हुआ! पुराने दुख की याद करते रहेंगे,
तो वर्तमान के सुख खो जाएँगे!
हादसे के बाद कई दिनों तक मै तीव्र नैराश्य में थी! मेरी एक
हॉबी इंटरनेट पर समय बिताने ने मुझे मानसिक
बल दिया! इंटरनेट में कुछ वेब साइट्स जैसे
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ने मेरे जीवन में फिर से विश्वास
भर दिया! जल्दी ही मै निराशा से बाहर आकर सामान्य बन गयी!
"आपको शायद यह नहीं मालूम होगा कि
सब लोग आप जैसे नहीं होते।"
विद्या को लगा कि नवीन उससे सहानुभूति जता रही है। यह समझकर,
बात को बदलते हुए उसने पूछा -जीवन में आप का लक्ष्य क्या है?'
`अब तक तो कुछ नही है देखना है! एम.बी.ए के बाद कोई
कंप्यूटर कोर्स में शामिल हो जाऊँगा!'
`लड़का हो या लड़की, जिंदगी में तो कुछ न कुछ लक्ष्य तो होना ही
चाहिए। कुछ कर दिखाने की ख्वाहिश ही मनुष्य जाति के
विकास की नींव है। मेरा लक्ष्य तो, पेंटिंग में
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाना है।
अगर हमें अपना लक्ष्य ही न मालूम हो तो हम किस दिशा में जाएँगे?
पिछले कुछ महीनों मै कठिन साधना कर रही हूँ।
`पर्यावरण' पर काम करने वाली एक प्रमुख संस्था की
प्रतियोगिता में मैंने दूसरा स्थान प्राप्त किया है। उसी का
इनाम लेने के लिए
नागपुर जा रही हूँ ! हमारी यात्रा का इंतजाम भी उसी संस्था ने
किया है।
नवीन चकित होकर विद्या को देखता रह गया!
`और एक बात बताऊँ नवीन, देखने में तो आप आवारा नही लगते! लेकिन
लड़कियों को घूरने से उन्हें काफ़ी
क्लेश पहुँचता है! शायद आप सोचते होंगे की आंखों से गलती करेंगे
तो पकड़े नही जाएँगे। लेकिन ऐसी हरकतें छुपती नहीं। जो भी हो, मेरी शारीरिक
विकलांगता की अपेक्षा आपकी मानसिक विकलांगता ज़्यादा ख़तरनाक
है। इस
स्थिति से जल्दी से जल्दी बाहर निकलना आप के लिए बेहतर है !
नवीन कुछ न कह सका। उसने सिर नीचे झुका लिया। उसे लगा की विद्या ठीक
कह रही है ! उसके मन में विद्या के प्रति भावनाएँ एक बार
फिर बदलीं। अब वहाँ आदर और शिष्टाचार ने स्थान ले लिया !
मनुष्य में बदलाव लाने के लिए एक छोटी सी घटना ही काफ़ी होती है ! कुछ लोगों का
बड़प्पन दूसरों के अंतरंग को शुद्ध करके उनके मन की गहराई में
छुपे संस्कारों को बाहर निकालता है। यह दूसरे पर निर्भर करता
है कि वह तुरंत इसका लाभ उठा सकता है या नहीं।
नवीन के सोए संस्कार भी जागे।
कुछ क्षण के बाद नवीन ने सिर उठाया और बोला -`मुझे माफ कीजिए!
इंटरनेट में जो मनहूस साइट्स मै देखता हूँ उन्होंने मेरा मन
कलुषित कर दिया है ! मेरा विवेक खो गया है! इसने मुझे
मानसिक रूप के कमजोर बना दिया है ....
विद्या उसकी बातों को कटती हुई बोली -'इंटरनेट पर इल्ज़ाम
लगाना भूल है नवीन! टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल
करना हमारी अपनी रुचि पर आधारित है! मैंने बताया था न, मुझे इंटरनेट से कैसी मदद मिली! सब कुछ हमारी मानसिकता में
ही है!'
नवीन को लगा वह ठीक कह रही है। वे दोनों,
गाड़ी नागपुर पहुंचने
तक बात करते रहे!
गाड़ी स्टेशन पर रुकी!
विद्या
दादाजी का सहारा लेकर नीचे उतरी और नवीन से बोली -`आपका दिन
अच्छा रहे!'
जाते जाते वक्त विद्या की निगाहें नवीन से यही सवाल कर रही थीं
कि तुम कुछ कर के तो दिखाओगे ना? '
नवीन मन ही मन उसका सकारात्मक उत्तर दे रहा था।
गाड़ी अपनी दिशा की ओर बढ़ चली
थी। |