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`नवीन ने उसकी सलाह मान ली! फिर थोड़ा रुक कर बोला, `कुछ भी कहो यार,  सफ़र लंबा है, काफ़ी उबाऊपन होगा! "
"अरे, फ़र्स्ट क्लास के डिब्बे में जा रहे हो! कुछ उपन्यास, और वॉकमैन भी ले जा रहे हो,  उबाऊपन क्यों होगा?' और तुम्हारा सीट नंबर क्या है? संदीप ने पूछा।
"छत्तीस ..."
झट से संदीप डिब्बे में घुस गया और तुरंत वापस आया!
"यार, तू तो बड़ा भाग्यवान है! तेरे सामनेवाली सीट पर एक खूबसूरत लड़की बैठी है! अब तो तेरा सफ़र सुखमय होगा!"
"सच, मैंने तो नहीं देखा," कह कर नवीन ने डिब्बे में अपनी सीट की तरफ एक नजर डाली।

ध्यान से देखा तो वहां एक लड़की और उसके साथ में एक बूढ़े सज्जन बैठे थे। बंगाल की सूती साड़ी में वह लड़की शिष्ट और गरिमामय लग रही थी। 
"वाह, क्या नमक है बाप, 'स्टन्निंग ब्यूटी' नीचे स्वर में नवीन ने कहा!
इतने में रेलगाड़ी छूटने का वक्त हो गया और माइक पर गाड़ी चलने की सूचना प्रसारित हो गई। संदीप ने हाथ हिलाते हुए अलविदा कह दिया!

गाड़ी की रफ़तार बढ़ने पर, नवीन अंदर आया और अपनी सीट पर बैठ गया!  बैग से वॉकमैन बाहर निकला और उसमें 'रिकी मारटिन' का 'उल्वे' कैसेट लगाकर टेप आन किया और गीत के अनुसार पैर हिलाने लगा! नवीन को अच्छी तरह मालूम है कि वह शिष्टाचार नही है, फिर भी।

थोड़ी देर बाद जान बूझकर सामने की सीट पर बैठी लड़की को झाँकना लगा!
`तू चीज बड़ी है मस्त मस्त, तू चीज बड़ी है मस्त.....जो गाना उसने कल रात शाटिलैट चैनेल पर देखा था उसे गुनगुनाने लगा!

वह लड़की इस सबको नज़रंदाज़ करती हुई "बार्न टु विन" पढती रही। उसके साथ में बैठे हुए सज्जन ने थोड़ी देर बाद नवीन से अखबार मांगा और चुपचाप पढ़ने लगे!
नवीन ने लड़की को आकर्षित करने के लिए एक अँग्रेज़ी उपन्यास बाहर निकाला! पुस्तक को आंखों के रख कर, उस लड़की की सुंदरता की रस लेने लगा। नवीन की नजरें उस लड़की की हर अंग को छूने लगीं। 
`वाह, कितनी सुंदर है, परफेक्ट फिगर! इस का हाथ माँगनेवाला, भाग्यशाली बनेगा` सोचा नवीन ने, `मेरे सामने वाली खिड़की में एक चांद का टुकड़ा रहता है...`एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे ...फ़िल्मी गाने इतनी धीमी आवाज में
गाना शुरू किया, ताकि वह सुन सके!
लेकिन उस लड़की ने इसकी परवाह नहीं की, किताब पढ़ने में लगी रही!  वृद्ध सज्जन भी अखबार में निमग्न हो
गए।

तीन घंटे के बाद गाड़ी 'काजीपेट' स्टेशन पर रुकी! चाय, काफी और नाश्ता बेचने वाले ऊँची आवाज में चिल्लाने लगे।
'क्यों बेटी, चाय पियोगी?' वृद्ध सज्जन ने पूछा
'हां, दादाजी, पिएँगे' कहकर, उस ने किताब को सीट पर रख दिया! नवीन की तरफ देख कर मुसकराई!
नवीन ने झट से अपना नाम बता कर, उसका नाम पूछा!
'मेरा नाम विद्या है' उसने बताया।
नवीन ने प्लेटफ़ार्म पर दुकान से एक पेप्सी का कैन खरीद लिया और आराम से धीरे धीरे पीने लगा।

`आप कहां जा रहे हैं?' लड़की ने पूछा।
`नागपुर'
गाड़ी ने फिर रफ़तार पकड़ ली थी थोड़ी ही देर में वह पटरियों पर दौड़ने लगी।
चाय पीकर विद्या ने फिर पुस्तक उठाई! नवीन समझ गया की अगर विद्या किताब पढ़ने मे लीन हो गयी तो, उससे बातचीत करना मुश्किल है!  उसने तुरंत बात बढाई!
'आप क्या पढ़ रही है?
`मैने विजुअल आर्ट्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है! आपने`?'
`हाल ही में मेरा बी.कॉम पूरा हुआ है! एम.बी.ए प्रवेश परीक्षा ले रहा हूं! स्टडी मेटीरियल के लिए दिल्ली जा रहा हूँ नवीन ने आवाज़ में रोब लाते हुए कहा।
' ओ, अच्छा', कह कर विद्या ने फिर से किताब उठा ली।
'आप की हॉबीज़ क्या हैं, विद्या?'
'पेंटिंग और किताबें पढ़ना।'
`अच्छा, रीडिंग का मुझे भी शौक है! साइंस फ़िक्शन मुझे बहुत अच्छा लगता है! इंटरनेट देखना और भी पसंद है!`
` तो आपने फ्रॉम द अर्थ टु मून ज़रूर पढ़ी होगी। 
नवीन ने नकारात्मक सिर हिलाया!
`अच्छा तो फिर जर्नी टु द सेंटर ऑफ़ अर्थ तो पढ़ी ही होगी।
नवीन ने और एक बार नकारात्मक सिर हिलाया! वास्तव में उसने इन किताबों के नाम तक नही सुने थे। वह फिर
भी लड़की के सामने अपने सम्मान की रक्षा करते हुए झूठ बोला, `इतना समय नहीं मिल पाता है! चाहते हुए भी पढ़ नही सका।'
विद्या नवीन की असलियत समझ गई और किताब पढ़ने लगी।
गाड़ी हवा को काटती हुई तेजी से चली जा रही थी।

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