फ़िल्म-इल्म

गांधी जी और सिनेमा
अन्हसिर्क अमर

फ़िल्मी दुनिया ने गांधी जी की उपलब्धियों को याद रखने का भरसक प्रयत्न किया है। नाइन आवर्स टु राम, द मेंकिंग ऑफ़ महात्मा, गांधी-बनाम-गांधी, मैंने गांधी को नहीं मारा, लगे रहो मुन्ना भाई और गांधी - माई फ़ादर जैसी फ़िल्में इस तथ्य की ज्वलंत मिसाल हैं।

स्वतंत्रता-पूर्व के भारतीय इतिहास में गांधी जी का उदय और फ़िल्म निर्माण का प्रारंभ प्राय: एक साथ ही हुआ। दादा फालके ने भारत का पहला चलचित्र 'राजा हरिश्चंद्र' सन १९१३ में बनाया था और उसी के आसपास गांधी जी भी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस लौटे थे। आठ वर्ष के अंदर ही यहाँ के फ़िल्म उद्योग के विकास पर स्थायित्व की मुहर लग गई, और तभी - यानी सन १९२१ में - गांधी जी ने भी यहाँ की राजनीति की बागडोर हाथ में लेकर अपना पहला सत्याग्रह आंदोलन चलाया। फिर सन १९३० में जब गांधी जी ने अपने दूसरे आंदोलन की शुरुआत की तब यहाँ सवाक चित्रों का प्रादुर्भाव हुआ और पाँचवें दशक में जब वह 'क्विट इंडिया' का नारा बुलंद कर रहे थे उस समय 'झाँसी की रानी' जैसी फ़िल्मों के माध्यम से यहाँ के चित्रपट पर रंगीनी आनी प्रारंभ हो गई थी। इस तरह हम देखते हैं कि भारत में गांधी जी और फ़िल्म उद्योग के विकास का इतिहास साथ-साथ चला।

लेकिन दोनों के इतिहास-क्रम में इतना साम्य होने के बावजूद गांधी जी ने सिनेमा के पक्ष में कभी कुछ नहीं कहा। अपने समग्र जीवन में उन्होंने मात्र एक चित्र देखा था - 'मिशन टु मॉस्को' - लेकिन उसकी प्रशंसा भी उन्होंने किसी से नहीं की। मालवीय जी के अत्यधिक आग्रह पर उन्होंने 'रामराज्य' नामक फ़िल्म के कुछ भाग निश्चित ही देखे थे, लेकिन उनका सौंदर्यबोध प्रेम अदीब और शोभना समर्थ जैसे अधेड़ कलाकारों को राम और सीता के रूप में स्वीकार नहीं कर पाया और वह बीच में ही उसे छोड़ कर बाहर आ गए। उसके बाद उन्होंने कभी कोई फ़िल्म नहीं देखी। यही नहीं, उन्होंने समय-समय पर अपने लेखों में फ़िल्मों के विरुद्ध उद्धरण भी दिए, और आज भी राष्ट्रीय अभिलेखागार में संग्रहीत नवजीवन और हरिजन सेवक के बीसियों पृष्ठ उनके सिनेमा-विरोधी विचारों से भरे पाए जा सकते हैं।

इस तथ्य के बावजूद देश के फ़िल्म उद्योग पर गांधी जी का जो प्रभाव पड़ा उससे इनकार नहीं किया जा सकता। प्रारंभ में अधिकांश फ़िल्में केवल पौराणिक कथाओं या मारधाड़ के आधार को लेकर ही बना करती थीं, लेकिन जैसे-जैसे भारत की राजनीति में गांधी जी का वर्चस्व बढ़ता गया वैसे-वैसे फ़िल्मों की कथावस्तु में भी परिवर्तन होते गए। फ़िल्मों में सामाजिक चेतना का प्रादुर्भाव गांधी जी की प्रेरणा से ही हुआ। राजनीतिक और सामाजिक विषयों को लेकर जनसाधारण के दृष्टिकोण में जो भी तबदीलियाँ आईं उनका पूरा असर हमारे फ़िल्म उद्योग पर हुआ। उस काल में निर्मित 'राम-रहीम', 'रैथ' और 'खुदा की शान' जैसे चित्रों में हम मानवता तथा ऐक्य संबंधी गांधी जी के आदर्शों का ही प्रतिपादन पाते हैं।

फ़िल्मों के निर्माण पर गांधी-विचारधारा का यह प्रभाव स्वाभाविक ही था। कला और संस्कृति का देश की राजनीतिक परिस्थितियों के साथ अटूट संबंध है, और गांधी जी का प्रभाव जब हमारी कविता, कहानी, उपन्यास और नाटकों की विधाओं पर पड़ा तो फ़िल्म कला ही उससे अछूती कैसे रह सकती थी? देश के फ़िल्म निर्माण का प्रारंभिक इतिहास देखने से पता चलता है कि उस पर गाँधीवाद का व्यापक प्रभाव पड़ा था, और उस कालखंड में प्रदर्शित कम से कम आधा दर्जन ऐसे चित्रों के नाम आसानी से लिए जा सकते हैं जिन पर गांधी जी और उनके आदर्शों की स्पष्ट छाप थी। तकनीक की दृष्टि से वह फ़िल्में यद्यपि निर्दोष नहीं थीं और उनका निर्माण मूल्य भी बहुत मामूली था, तब भी उन्होंने एक निश्चित विचारधारा को हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया और अपने उस उद्देश्य में उनको पर्याप्त सफलता भी मिली।

गाँधीवाद से उत्प्रेरित अच्छे चित्रों का निर्माण सन १९३५ से प्रारंभ होता है, जब पुणे स्थित प्रभात स्टूडियो के लिए महात्मा के नाम से वी. शांताराम ने एक कथा-चित्र बनाया। उन्हीं दिनों गांधी जी ने अस्पृश्यता के विरोध में अपनी आवाज़ उठाई थी और इस फ़िल्म का निर्माण उसी के आधार पर किया गया था। महाराष्ट्र के संत के रूप में गांधी जी से मिलता-जुलता एक ऐसा चरित्र उसमें प्रस्तुत किया था जिसने स्पष्ट शब्दों में अस्पृश्यता को युग का सबसे बड़ा अभिशाप घोषित किया था। लेकिन उस चित्र के नाम को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सहन नहीं कर पाई और ज़बरदस्ती उसका नाम 'महात्मा' के स्थान पर 'धर्मात्मा' कर दिया गया। इसके बाद 'अछूत' और 'अछूत कन्या' आदि ऐसे बहुत से चित्र इसी विषय को आधार बना कर निर्मित किए गए जिनकी गणना आज भी भारत में बने श्रेष्ठतम चित्रों के अंतर्गत की जाती है। 'मिल' और 'अमृतमंथन' अन्य चित्र थे जिनमें गाँधीवाद का स्पष्ट चित्रण था। 'मिल' में अहिंसात्मक उपायों से अपने अधिकार प्राप्त करने पर ज़ोर दिया गया था, और 'अमृतमंथन' में बलि-प्रथा के विरोध में आवाज़ उठाई गई थी। इसी अवधि में गांधी जी के गाँव वापस चलो नारे के आधार पर भी कई फ़िल्में बनाई गईं जिन्हें पर्याप्त लोकप्रियता मिली। शराबबंदी आंदोलन के संबंध में भी कई चित्रों का निर्माण हुआ जिनमें अभिनेत्री नंदा के पिता मास्टर विनायककृत ब्रांडी की बोतल और सोहराब मोदी का मीठा ज़हर उल्लेखनीय हैं। इन सब चित्रों पर गाँधीवाद और गांधी जी द्वारा प्रचारित आंदोलनों की स्पष्ट छाप थी।

इसके बाद आया हिंदू-मुस्लिम एकता बढ़ाने के संबंध में गांधी जी के प्रयत्नों का युग, और हमारे फ़िल्म उद्योग ने उस दिशा में भी उनका पूरा साथ दिया। पड़ोसी, हम एक हैं, दोस्त, संदेश और भक्त कबीर सभी ऐसे चित्र थे जिनमें दोनों संप्रदायों के आपसी मेलजोल पर बल दिया गया था। उन चित्रों में यह बताने की कोशिश की गई थी कि हिंदू-मुसलमान दोनों का कल्याण इसी में है कि वह भाई-भाई बन कर रहें। उस कालखंड में बने अनेक चित्रों के गीत भी इसी आदर्श को ध्यान में रखते हुए लिखे गए थे, जैसे बोलो हरहर महादेव, अल्लाहो-अकबर (चल चल रे नौजवान) या बंद करो आपस के झगड़े, आपस की तकरार (नया संसार)। उन दिनों निर्मित अधिकांश चित्रों में हिंदू-मुसलमानों को गले मिलते दिखाया गया है।

१९४२ के आंदोलन के बाद भी इस संबंध में कई फ़िल्मों का निर्माण किया गया, जिनमें गुलामी और अपना घर उल्लेखनीय हैं। इन सब फ़िल्मों का आधार गांधी जी का भारत छोड़ो प्रस्ताव था और उन सभी में इस बात का चित्रण करने की चेष्टा की गई थी कि विदेशी शक्तियों को भारतवर्ष में शासन करने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन इस तरह की जो भी फ़िल्में बनाई गईं उनकी कथावस्तु को अनेक परतों से ढँक कर पेश करना पड़ा, क्यों कि तत्कालीन ब्रिटिश सेंसर बोर्ड इस प्रकार के निर्माण का प्रबल विरोधी था और वह इसका पूरा ध्यान रखता था कि फ़िल्मों के माध्यम से कोई राजनीतिक संदेश न निसृत हो पाए। कई बार तो सेंसर बोर्ड ने फ़िल्मों में गांधी जी के चित्रों को काला करने के लिए निर्माताओं को विवश तक कर दिया था।

लेकिन इतनी कड़ी निगरानी रखने के बावजूद सरकार फ़िल्मों पर गांधी जी के निरंतर बढ़ते हुए प्रभाव को रोक नहीं पाई. इतना अवश्य हुआ कि उसके परिणामस्वरूप स्पष्टत: गांधी-विचारधारा का चित्रण न करके घुमाफिरा कर उसे प्रस्तुत करने की कोशिश की जाने लगी, जिनकी कथावस्तु तो पौराणिक होती थी लेकिन उनके आदर्श कट्टर गांधीवादी हुआ करते थे। 'सम्राट चंद्रगुप्त', 'महात्मा विदुर' और 'ज़मीन' आदि चित्र मूलत: गाँधीवाद से ही उत्प्रेरित थे और उसके आदर्शों को ध्यान में रखते हुए ही उनका निर्माण किया गया था। 'अमृत' और 'मंदिर' दो अन्य चित्र थे जिनके माध्यम से गांधी जी के विचारों का प्रसार करने का प्रयत्न किया गया था। इस तरह सेंसर बोर्ड का तीव्र प्रतिरोध भी गांधीवादी फ़िल्मों के प्रचार को नहीं अवरुद्ध कर सका और वह समान गति से बनती रहीं। उस काल के सिनेमा उद्योग के जिन व्यक्तियों ने गाँधीवाद से प्रेरित फ़िल्मों के निर्माण में सर्वाधिक रुचि ली उनमें कथाकार वि. स. खाण्डेकर और निर्देशक विनायक के नाम प्रमुख हैं. बाद की गांधीवादी फ़िल्मों में आखिरी पैगाम और कश्मीर हमारा है उल्लेखनीय मानी जाएँगी. इन सभी फ़िल्मों में अहिंसा की हिंसा पर और सत्य की असत्य पर विजय दिखलाई गई थी। इसी तरह नीचानगर, आज और कल तथा बयालीस में भी हमें गांधीवादी आदर्शों की स्पष्ट झलक मिली थी।

उन दिनों सिनेमा का प्रत्येक हॉल परदे पर गांधी जी का चित्र आते ही दर्शकों की तालियों से गूँज उठता था और वह रूपहले परदे के सर्वाधिक जाज्वल्यमान सितारे बन गए थे। आज वह मील के एक ऐसे पत्थर बन चुके हैं जिसकी किलोमीटर की इस दुनिया में कोई सार्थकता नहीं बच रही है। गांधी जी के विचारों को तिलांजलि देकर हमारे देश के अग्रणी परिचालक, हमारी राजनीति के मूर्द्धन्य नियंता और निन्यानवे प्रतिशत से अधिक हमारे राजनेता भले ही अपने पथ से पूरी तरह भ्रष्ट हो चुके हों, लेकिन फ़िल्म संसार के मध्य अब भी उनकी कुछ याद बाकी है। ऐसा अगर नहीं होता तो 'नाइन आवर्स टु राम', 'गांधी वर्सेज़ गांधी', 'मैंने गांधी को नहीं मारा', 'लगे रहो मुन्ना भाई' और 'गांधी-माई फ़ादर' जैसी फ़िल्मों का निर्माण नहीं हो पाता। भले ही यह सब फ़िल्में मुख्यत: पैसा कमाने के उद्देश्य से ही बनाई गई हों लेकिन उनके माध्यम से उस युग-पुरुष को याद रखने का जो प्रयत्न किया गया है, उसे किंचित अनदेखा नहीं किया जा सकता।

-(न्यूज़फ़ीचर्स)

१ अक्तूबर २००७