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गरमा-गरम पकौड़े और चाय
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दिनेश कुमार सिंह
बात उन दिनों की है, जब हम अपने
उम्र के उस पड़ाव में थे जब सपने बुने जाते है, कुछ नया करने की
इच्छा होती है। हम तीन दोस्त अक्सर सप्ताह के अंत में, शहर से
दूर खेती लायक जमीन देखने निकल पड़ते। कभी कभी तो हम सौ
किलोमीटर भी चले जाते।
ऐसी ही एक बरसात की दोपहर थी, जब हम फिर एक बार अपनी खोज पर
निकले। शहर की सीमा पार करते ही आसमान ने जैसे अपने सारे कपाट
खोल दिए थे। मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिसने हाईवे को छोड़कर
सँकरे ग्रामीण रास्तों को और भी रहस्यमय बना दिया था। हाईवे पर
तो इक्का-दुक्का गाड़ियाँ दिख जाती थीं, पर जैसे ही हमने
मुड़कर अंदरूनी रास्ता लिया, सन्नाटा और हरियाली ने हमें घेर
लिया। पहाड़ों से छोटे-छोटे झरने फूट पड़े थे, हरियाली इतनी
घनी थी कि आँखें तृप्त हो रही थीं। सड़क पर हमारी गाड़ी के
अलावा शायद ही कोई और वाहन था। इस सफर का अपना ही एक जादू था,
जो हमें शहर की भागदौड़ से दूर, किसी और ही दुनिया में ले जा
रहा था।
काफ़ी तेज़ बरसात हो रही थी। हायवे छोड़ने के बाद रास्ता सँकरा हो
गया था। जगह जगह पहाड़ों में छोटे-छोटे झरने बन गए थे। चारों
तरफ हरियाली ही हरियाली फ़ैल गई थी। रास्तों पर इक्का दुक्का
गाड़ियों को छोड़ कर कोई और नहीं था। सफ़र में काफी आनंद आ रहा
था।
ऐसे मौसम में, दिल और दिमाग दोनों ही गरमा गरम चाय की तलब
महसूस करने लगते हैं। एक मित्र ने अचानक कहा, "यार, चाय के
बिना तो ये मौसम अधूरा है!" मैंने तुरंत सहमति जताई। अब शुरू
हुई एक नई खोज – एक ऐसी जगह जहाँ गाड़ी खड़ी हो सके, जहाँ
साफ-सुथरा शौचालय हो, और जहाँ गरमा गरम चाय मिल सके। कुछ
किलोमीटर की मशक्कत के बाद, हमें दूर एक टिमटिमाती रोशनी दिखी।
यह एक छोटा सा ढाबा था, जहाँ पहले से ही कुछ चहल-पहल थी। मानो
हमारी प्रार्थना सुन ली गई हो।
हमने एक मेज पर सुविधाजनक जगह पकड़ी और चाय मँगवाई। जल्दी चाय
भी आ गई। पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था पर चाय गुमटी में
टीन के नीचे बैठने से काफी आराम मिला, जहाँ बारिश से बचाव की
सही व्यवस्था थी। चाय की पहली चुस्की मुँह में जाते ही एक
सुखदायी भाव का अहसास हुआ। बहुत अच्छा लगा।
तभी हमारी नजरें ढाबे वाले पर पड़ीं, जो कढ़ाई में से गरमा गरम
पकौड़े निकाल रहा था। उनकी सुगंध हवा में तैर रही थी, और वहाँ
खड़े लोग उन्हें गपागप खा रहे थे। ठन्डे मौसम में, खासकर जब
बरसात हो रही हो, पकौड़ों को देखकर भला कौन खुद को रोक सकता
है! उन पकौड़ों को देखकर हमारे मुँह में भी पानी आ गया। हमने
बिना देर किये प्याज़ के पकौड़े मँगाए। देखते ही देखते पकौड़े आए
भी और ख़त्म भी हो गए। क्या स्वाद था! करारे, मसालेदार, और अंदर
से नरम। देखते ही देखते प्लेट खाली हो गई।
पकौड़ों की भूख और बढ़ गई। हमने आलू के पकौडे मँगाए। वो भी पलक
झपकते ही गायब। फिर बारी आई मिक्स पकौड़ों की। साथ में चाय का
सिलसिला भी जारी था। हमारी इस पकौड़ा-चाय स्पर्धा को देखकर
ढाबे वाला भी अपनी हँसी नहीं रोक पाया।
योजना के मुताबिक़, हमारे दस मिनट का चाय ब्रेक कब चालीस मिनट
में बदल गया, हमें पता ही नहीं चला। पेट ने आखिर में कहा, "बस
भी करो दोस्तों!" हम हँसते-हँसते बिल चुकाकर बाहर निकले। वहाँ
से हम दूसरी जगहें देखने निकले, पर उस ढाबे और उन पकौड़ों की
यादें मन में बस गईं। वह बारिश, वह चाय, वह गरमा गरम पकौड़े,
और सबसे बढ़कर, दोस्तों के साथ बिताया वह यादगार पल – ये सब
मिलकर एक अमिट छाप छोड़ गए थे। यह सिर्फ पकौड़े और चाय का
अनुभव नहीं था, यह दोस्ती के अटूट बंधन का, सपनों की तलाश का,
और जीवन के छोटे-छोटे पलों में खुशियाँ खोजने का एक खूबसूरत
संस्मरण था।
अंत में हम वहाँ से निकले और दिन भर अलग अलग जगह घूमने के बाद
घर की ओर लौट आए। घर लौटते समय, न भूख थी और न प्यास, बस वह
अनुभव था जो बार-बार याद आ रहा था। हाँ हमारी वो पकौड़ों की वह
कहानी आज भी रह रह कर याद आ जाती है। वो पकौड़े, वो चाय, साथ
में हमारी स्पर्धा और बकवास बातें। यह एक अविस्मरणीय घटना बन
गई थी और शायद आगे भी कई दिनों तक याद आती रहेगी।
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