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ललित निबंध

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ऋतुओं का बदलता संसार
-सुरेश कुमार पण्डा
 


शहर में आकर रहना क्या हुआ प्रकृति से जैसे हमारा नाता ही टूट गया । जीवन की धारा ही बदल गई। जीवन की इस नई शैली को अंगीकार कर तदनुरूप ढ़लते ढ़लते एक लम्बा समय बीत गया। मानव निर्मित तकनीक और ज्ञान का समुच्चय जो फव्वारे की शक्ल में हमारे ऊपर झर रहा था उसे आत्मसात किये बिना क्या रहा जा सकता था? हमारे पास न बचाव के उपयुक्त साधन ही उपलब्ध थे और न इच्छाशक्ति। उनमें अपरिमित आकर्षण भी तो था। व्यक्ति के मन को नूतन ढंग से प्रोग्रामिंग कर अपने इच्छानुरूप ढ़ाल लेने की कला वैज्ञानिक विकास के नाम पर मानव ने स्वयं ही तो विकसित कर ली है। कहीँ मनुष्य स्वयं निर्मित मकड़जाल में तो नहीं फँस रहा है। जो हो, निसंदेह अखिल ब्रह्मांड में मानव प्राणीजगत का एकमात्र विवेकवान जीव है। इस तथ्य को क्या झुठलाया जा सकता है? फिर झुठलाये भी तो कौन? क्या अपने विरूद्ध स्वयं मानव ही उठ खड़ा हो? यह मानने लायक बात तो किसी भी रूप में नहीँ लगती। मानव मन इतना भोला तो नहीं हो सकता है । हाँ, यह अवश्य है कि किसी काल विशेष में वह भले ही भटकन के गिरफ्त में हो ले अंततः विकास की अजस्त्र श्रोतस्विनी में संतरण करना उसका एकाधिकार है और यह उसके लिये सहज संभव भी है।

पुरातन काल से ही वसंत ॠतु में आयोजित होने वाले मदनोत्सव के राग रंग से युवा मन हमेशा ही आन्दोलित होता आया है। कल्पना के वेगवान रथ पर आरूढ़ होकर निरभ्र आकाश की गहराइयों में उन्मुक्त संतरण करते हुए सुशीतल चंद्र रश्मियों में आपाद मस्तक रससिक्त होना किसे आनन्ददायी नहीं लगेगा। अहा, हा, पीन पयोधरों के भार से खण्डित होने को आई अभिसारिका की क्षीण कटि और उज्जवल पारदर्शी उत्तरीय के पीछे छुपाछुपी खेलते से सलज्ज नयनों की सुतीक्ष्ण धार से क्या कोई युवा हृदय घायल होना नहीं चाहेगा । मदनोत्सव का सहयोगी बनकर कामदेव के कुसुमशरों से महमह करती शीतल मंद बयार भी तो उपस्थित है।

अशोक तो आज भी पुष्पित होता है। किसी सौँदर्य के महादेश की साम्राज्ञी के रंग आलता रचित सुचिक्कन पाद देश के आघात की अब वह अपेक्षा करना भी भूल चुका है। उसे तो कन्दर्प के तुणीर में सजना भर अभिष्ट है। वहीं उसके अस्तित्व की सार्थकता भी तो है, फिर अशोक अपने सम्पुर्ण यौवन के साथ क्यों न खिले? खिलो अशोक, खिलो। सम्पुर्ण कमनीयता, रंग, आकार और सुगन्ध के साथ खिलो। ना जाने कब कामदेव को तुम्हारी आवश्यकता पड़ जाय। कब किस महाबीर को मदनासक्त बनाने में उन्हें तुम उपयुक्त जँचो और ना जाने किस क्षण तुम्हारा पुर्ण यौवन के साथ खिलना सार्थकता पा जाय।

बसन्त एक सशक्त आयोजन है प्रकृति का पुरुष को लुभाने के लिये। पुरुष मूल रूप से रूप लुब्धक नहीं है परन्तु रूप की अग्नि जब भी अपने पूर्ण यौवन में जाज्वल्यमान होती है पुरुष चाहकर भी उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। उसे तरल होना ही पड़ता है। प्रकृति के सानिध्य में पुरुष की निष्क्रियता अनायास ही क्रिया के स्तर को उपलब्ध हो जाती है और प्रकृति को उसकी सम्पूर्णता में आत्मसात कर वह अपनी इयत्ता पहचानने का सुयोग पा लेता है। पुरुष का अहंकार जाग उठता है। यही अहंकार परवर्ती काल खण्ड में अपनी तुष्टी के लिये नाना रूप रंग धारणकर पुरुष को तिगनी का नाच नचाने लगता है।

मैं इस कार्य व्यवहार के लिये बसन्त को दोषी नहीं मानता। वह बेचारा तो क्रिया की परिधि में रहनेवाला उत्प्रेरक मात्र है। वह मूल नहीं है। वह उत्स भी नहीं है। वह है शाख पात, फूल, फल जैसा परिणाम जिसे न लक्ष्य से कोई लेना देना है और न लक्ष्य भेदन हेतु तत्पर मदन से। उसके लिये तो दोनो ही बराबर हैं। निश्छल एवं सम।

मैं शहर में बिशाल अट्टालिकाओं के मध्य किसी नखलिस्तान की तरह हरितिमा की चादर ओढ़े नगर निगम द्वारा निर्मित उद्यान में विदेश से आयातित अत्यंत ही मुलायम घास के गलीचे पर बैठकर अनेकों बार बसन्त का आवाहन करता रहा हूँ। पर हत् भाग्य। सुगन्धहीन पुष्पों की क्यारियों और विपिंग अशोक के पीछे पारदर्शी आड़ में प्रेम का नितनूतन खेल खेलते किशोर और किशोरियों के निष्प्रभ परन्तु संतृप्त चेहरे तथा शिशुओं को झूला झुलाती गतयौवना सेविकाओं की कर्कश स्वर लहरियों के साथ कैमरों से चमकती रोशनी के झमाके के अलावा कभी कुछ नहीं मिला। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये परन्तु बसन्त का आगमन नहीं हुआ। कामदेव अवश्य ही कुसुमशरों का परित्याग कर नये नये आयुधों का सफल प्रयोग करते दिख जाते हैं। दूर देश से आया हुआ बासी श्रीहीन गुलाब प्रिया के हाथों में आकर्षण की भूमिका निभाते प्रायः ही दिख जाता है। पता नहीँ प्रिया के गालों की लाली स्वाभाविक होती है या आधुनिक सौंदर्य प्रसाधनों का चमत्कार। मुझे तो वे प्रियाएँ कम निपट अभिसारिकायें ज्यादा लगती हैं।

इन दिनों एक निराला ढंग चल निकला है। इवेंट पार्टी के नाम पर बसंत को टुकड़ों में बाँटकर इने गिने दिनों के लिये पाँच सितारा होटलों के सुरक्षित और गोपनीय लॉन में अवतरित करा लिया जाता है और मदनोत्सव को एकदम ही नये रूप में आयोजित कर कामिनियों को स्वच्छंद हो जाने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान कर दी जाती है। उसके पश्चात शुरू होता है असल खेल। योरोप से आयातित सुचिक्कन तथा पारदर्शी बोन चायना के कमनीय चषकों में धीरे धीरे करके पी गई विभिन्न स्वाद एवं सुगन्ध वाली सुरा के सिर पर चढ़ते ही मत्यांगद की भाँति मानों समस्त प्रकृति ही झूमने लगती है। बसंत का भ्रम इतना सजीव होता है कि अभिसार के पलों में न देह का भान रह जाता है और न समय या परिवेश का ही। युवा शरीर की भँगिमाओं का तो कहना ही क्या है।

बसन्त में अकेले मदनोत्सव होता हो सो बात नहीं है। बसन्त एक ओर जहाँ कामदेव को अपने तुणीर में सजाने के लिये कुसुमशर उपलब्ध कराता है वहीं दूसरी ओर ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के आवाहन पूजन के लिये मुहुर्त भी प्रदान करता है।

शहरों का विकास सुविधाओं का विकास है। मानवीय कमजोरियों पर कृत्रिमता का आवरण चढ़ाकर सुख की अनुभूति को बहुगुणित करने की कला जो पिछले कुछ वर्षों से विकसित हुई है उसने प्रकृति के सानिध्य में रहकर स्वयमेव विकसित अनेक आनन्द निर्झरिणियों को या तो जलहीन कर दिया है या उसकी धारा कुंद हो गई है। यह सब हो रहा है वैज्ञानिक उपलब्धियों के नाम पर। इसी क्रम में ॠतु चक्र भी विसर्जित हो चला ह।

वसँत की पहचान आज खो चुकी है। अट्टालिकाओं के बीच बीच में नखलिस्तान जैसे बाग बगीचों में पलाश के पौधे नहीं उगाये जाते। बसंत की अगवानी के लिये सूर्ख लाल रंग के पुष्पों से लद फँद जाने वाला यह वृक्ष आज शहरियों को आकर्षित नहीं करता। आम के बौर तो यहाँ वहाँ दिख भी जाते हैं परन्तू कोयल को शायद शहर एकदम नापसंद है तभी तो उसकी कूक का गुंजन हमारे कर्णरंध्रों के लिये अत्यंत ही दूर्लभ वस्तु है। हाँ यह अवश्य है कि नरम घास की हरी चादर पर बैठकर सिर जोडे युगलों में वासंतिक उन्माद आसानी से पहचाना जा सकता है।

मुझे लगता है हम चाहे कितनी ही अट्टालिकाओं का निर्माण कर लें, लेकिन हमारी जातीय अस्मिता के प्रतिमान वेणुगोपाल, वीणापानी और वसंत उसमें उसी ढंग से जीवंत रहेंगे जैसे गीत गोविन्द के रचनाकाल में रहा होगा। महाकवि जयदेव के लिये वसँत कृष्ण के रूप में परब्रह्म नारायण की उपासना का आधार प्रस्तुत करता था। अपने इष्टदेव द्वारा समग्र धरती को वासंतिक महारास में सम्मिलित करते हुए देखकर उनका हृदय विगलित होकर गीत के रूप में सृष्टि मात्र को रसप्लावित करने लगता था। रस की यही धारा "गीत गोविन्द" में शब्दों के रूप में बहते हुए दिखती है जिसके सँग-सँग महाकवि जयदेव तो बहे ही बहे अब पाठक और श्रोता दोनों ही बह रहे हैं।

हमें मानना होगा कि आजकल ॠतुचक्र के अनुसार बसन्त का आगमन नहीं होता क्योंकि ॠतुओं का चक्र ही अब अस्तव्यस्त हो चुका है। शहरों में अट्टालिकाओं के मध्य हमारे लिये दो ही ॠतुएँ होती हैं। एक अधिक गरम दूसरा कम गरम। बारिश अधिक गर्मी के दिनों में होती है और शरद एवं बसन्त कम गर्मी के दिनों में आते होंगे। हम इनसे अलग से परिचित नहीं हो पाते। बसन्त चूँकि हमारे रक्त में रचा बसा है इसलिये एक लघु द्वीप का निर्माण कर हम स्मृतियों में उपस्थित बसन्त को अपने तरीके से जीने का उपक्रम करते रहते हैं।

२१ अप्रैल २०१४

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