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ललित निबंध

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रंग के रूपायन
- नर्मदा प्रसाद उपाध्याय


होली केसरिया रंग के निर्झर पुष्प पलाश का जन्मदिन है। कभी इस पलाश के फूल को ब्रज कानन की वीथियों से एक दिन राधा ने बीना और फिर इसके केसरिया रंग से एक साँवरे को नहलाकर सदैव के लिए भारतीय मन में शाश्वत रूप से बसी कविता के द्वार खोल दिए। कान्हा तब से कविता हो गए और राधा की यह ‘धृष्टता’ हमारी सांस्कृतिक परंपरा की अमर धरोहर होली के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। यदि राधा यह धृष्टता नहीं करती तो कृष्ण, कृष्ण नहीं होते, वे निरे कर्मयोगी बने रह जाते। न राग वसंत होता, न गुलाल और अबीर से घिरते आकाश और न ही मन के क्षितिज से उगते आनंद के सतरंगी इन्द्रधनुष। होली नहीं होती तो निरंजन सूर इतने ज्योतिर्मय कैसे होते? जिनकी आँखों ने कृष्ण के सबसे आलोकमय रूप को देखा और कहा—

खेलन हरि निकले ब्रज होरी
कटि कछनी, पीतांबर ओढ़े
हाथ लिए भौंरा चक्र डोरी
मोर मुकुट कुंडल स्रवनन कर
बर दसन दमक दामिनि छवि चोरी।

वसंत का यह प्रतिनिधि त्योहार केवल आम्र बौरों की मंजरियों के खिल उठने, रंगों के पूरी मस्ती के साथ बिखरने और निसर्ग की निरावृत शोभा को निहारने मात्र का त्योहार नहीं है, बल्कि यह रेखाओं की उस थिरकन की भी मनोरम अभिव्यक्ति है, जिस थिरकन ने भारतीय चित्रांकन परंपरा की विभिन्न शैलियों में इस मादक त्योहार को उरेड़कर सदैव के लिए हमारी संस्कृति के पन्नों में अमर कर दिया।

होली मनाते कान्हा की भावभीनी भंगिमा हमारी चित्रकला की परंपरा में बड़े सलोने रूप में उतरी है तथा वह होली राधा और माधव के उल्लास से भरपूर प्रेम की सहज और सार्थक अभिव्यक्ति के रूप में रंगों और रेखाओं में साकार हुई है। इसी होली को भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मध्यकाल व उत्तर मध्यकाल में फूली और फली चित्र शैलियों में उरेहा गया है। इन सभी चित्र शैलियों में चित्रित होली के लघुचित्र विश्व भर के कला संग्रहालयों तथा व्यक्तिगत संग्रहों में बिखरे हैं। इन चित्रों का समग्रता में वर्णन अत्यंत विस्तीर्ण होगा, इसलिए कुछ विशिष्ट रूपायनों के संबंध में शैलीगत संदर्भ सहित चर्चा की जा रही है।

भारतीय चित्रांकन परंपरा के संदर्भ में यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारतीय चितेरों ने राग और रागनियों को भी रूप दिए हैं तथा उन्हें रंग और रेखाओं में बाँधा है। भारतीय चितेरों ने राग वसंत का चित्रण करते समय होली मनाते राधा-माधव की छवि को ही केन्द्र में रखा है। वसंत रागिनी के रूपायन पर केन्द्रित अनेकों लघु चित्र राजस्थान तथा पहाड़ की विभिन्न शैलियों में बने। इन चित्रों में वसंत ऋतु का चित्रण है। यह चित्रण जहाँ एक ओर निसर्ग की शोभा को अपनी पूरी मनोरमता के साथ अभिव्यक्त करता है वहीं दूसरी ओर कृष्ण के इस शोभा के बीच गोपियों के साथ मुग्ध होकर नृत्य करने की अनुपम भंगिमा को भी दरशाता है। वसंत रागिनी के चित्रण में वसंत की शोभा के साथ-साथ होली के उल्लास को भी मध्यकालीन चित्रों ने अभिव्यक्ति दी है। वसंत रागिनी के अनेक चित्र मौजूद हैं। इनमें से सर्वाधिक आकर्षक रूपायन कोटा शैली का है।

वसंत रागिनी का यह चित्र सन् १७७० में चित्रित किया गया था तथा यह वर्तमान में आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स, सिडनी में संरक्षित है। इस चित्र की सबसे बड़ी विशेशता यह है कि इसमें नृत्यरत कृष्ण की गतिशीलता, वसंत का उल्लास तथा कृष्ण और गोपियों के वासंती परिधान कलाकार के संवेदनशील मन तथा उसकी कल्पनाशीलता को भलीभाँति परिभाषित कर देते हैं। रागिनी वसंत के उल्लेखनीय चित्रों में वह चित्र भी शामिल है, जो आमेर कलम का है तथा जिसे सन् १७०० में चित्रित किया गया था। यह राजा संग्राम सिंह के संग्रह में है।

इसी तरह का होली खेलते राधा-कृष्ण का वसंत रागिनी का एक सुन्दर रूपायन 'प्रीमेन कलेक्शन', टोरेंटो में मौजूद है। यह चित्र भी काँगड़ा कलम का है, जिसे सन् १८०० में बनवाया गया था। इस चित्र की भी सबसे बड़ी विशेषता राधा, कृष्ण और उनकी गतिशील भंगिमाओं का होना है। दक्षिण भारत में सोलहवीं सदी में राग-माला श्रंखला के जो चित्र उरेहे गए उनमें से अधिकांश अब अप्राप्य हैं, किंतु सन् १५८० से १५९० के बीच वसंत रागिनी का अहमद नगर शैली का एक मोहक रूपांकन राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में है। इस चित्र की यह विशेषता है कि तत्कालीन उत्तर भारतीय रूपांकनों के लक्षण इस लघुचित्र में दिखाई देते हैं, विशेषकर ओढ़नी प्रायः वैसी ही स्त्री पात्रों को उरेही गई है जैसी ‘लौरचंद्रा' के रूपांकनों में उरेही गई है। इस चित्र में नायक-नायिका (राधा-कृष्ण) एक झूले पर बैठे हैं, पीछे प्रफुल्लित आम के वृक्ष हैं। झूले के दाईं ओर शहजादे को अपने हरम में होली खेलते दिखाया गया है। सभी के परिधान अलंकृत हैं। स्त्रियों के वस्त्र झीने और रंगीन हैं। शहजादे स्त्रियों से घिरे खड़े हैं। स्त्रियों के हाथों में पिचकारियाँ हैं, जिनसे रँग छूट रहा है। चित्र के आगेवाले हिस्से में रंगीन पट्टियाँ उरेही गई हैं। यह यद्यपि आभिजात्य होली का अंकन है, लेकिन चितेरे ने इसमें अद्भुत आंचलिकता के दर्शन कराए हैं।

दक्किनी कलमों के बाद मुगल कलम में होली के बड़े मनभावन रूपायन हुए। हरम की होली के अलावा तत्कालीन सम्राटों को अपने दरबारियों के साथ भी होली खेलते चित्रित किया गया है। मुगल कलम में बनाए गए होली के रूपायन अपने आप में विशिष्ट हैं तथा मुगलकालीन कलाकारों ने चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, इस त्योहार के अंकन में अपने आत्मिक उल्लास के रंग उड़ेल दिए हैं। सन १७५० में होली खेलते शहजादे का एक शानदार चित्र विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम लंदन में है। इसमें एक शहजादा अपने हरम में होली के त्योहार को पूरे उल्लास के साथ मनाते हुए चित्रित किया गया है। इस चित्र में विभिन्न प्रकार के रंग, वाद्य यंत्र, अवध की वेशभूषा, वहाँ का नारी सौंदर्य और विशेष रूप से प्रकृति की सुषमा से भरपूर पृष्ठभूमि दर्शनीय है। मुगल कलम के अलावा उससे प्रभावित अन्य प्रादेशिक मुगल कलमों से बड़े सुंदर होली के रूपायन हुए। इसके प्रतिनिधि उदाहरण विशेष रूप से अवध कलम में मौजूद हैं।

होली का यह स्वरूप राजस्थान तथा पहाड़ की शैलियों में परवर्तीकाल में बड़े मनोरम रूप में विकसित हुआ। राजस्थान की प्राचीन शैलियों में मेवाड़ शैली अप्रतिम है। इस कलम में होली के बड़े लुभावने अंकन हुए। सन् १६६० में वसंत रागिनी को चित्रित करते हुए मेवाड़ी कलम का एक सुन्दर चित्र राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में है। इस चित्र में कृष्ण गोपियों के साथ होली खेल रहे हैं। बाँसुरी बजाते, नृत्य करते कान्हा की सहभागिन दो सखियाँ हैं, जो वाद्य सँभाले हैं। एक तीसरी सखी पिचकारी से उनपर रंग फेंक रही है। दृश्य में कई पिचकारियाँ दिखाई दे रही हैं। आमने-सामने दो मयूर हैं, जिनके आस-पास अन्य पक्षी विचर रहे हैं। पार्श्व दृश्य गुलाबी है। सभी के परिधान वासंती हैं और मन मानो केसर में पगे। रूप, रंग, स्वर और सौरभ को इस दृश्य में देखा जा सकता है।

राष्ट्रीय कला संग्रहालय नई दिल्ली में ही राजस्थानी (मेवाड़) कलम का राणा प्रतापसिंह द्वितीय का अपने महल में होली मनाते हुए सन् १७५३ का एक चित्रांकन है। यह चित्र दो भागों में है। ऊपरी भाग में लड़ते हाथी तथा दो चीनी चित्र उकेरे गए हैं, जो डच प्रभाव को स्पष्ट करते हैं। महाराणा अपने पुत्र और अन्य सामंतों के साथ होली मना रहे हैं। चित्र के निचले भाग में एक कृतिम युद्ध का दृश्य अंकित है, जिसमें उनके सामंतों के बीच रंगीन पानी से भरे और सोने व चान्दी के पतरों से मढ़ी बन्दूकें रखी हुई हैं। राजसी होली का यह अंकन अद्भुत है।

इस शैली का एक और सुन्दर चित्र उदयपुर संग्रहालय में है, जिसे चित्रकार तारा ने सन् १८५४ में बनाया है। इस चित्र में राणा स्वरूपसिंह (१८४२-६१ई.) को होली मनाते दिखाया गया है। इस चित्र में राणा अनेक अश्वों पर सवार दिखाई दे रहे हैं। इन घोड़ों के खुरों के आघात से गुलाल की धूल उड़ रही है। पार्श्व में उदयपुर महल को बड़े सुंदर रूप में दिखाया गया है। इसी संग्रहालय में सत्रहवीं सदी में 'गीतगोविन्द' के प्रसंग के आधार पर बनाया गया एक मनोहर चित्र है, जिसमें वसंत की सजीव शोभा को रंगों और रेखाओं के माध्यम से अनावृत कर दिया है। एक ही चित्र में कई दृश्य हैं। कहीं राधा और कृष्ण नृत्यरत हैं, कहीं वे एक-दूसरे की बाँहों में बाँहें डाले हैं, कहीं वे नाचती-गाती डफली बजाती सखियों के बीच हैं। चित्र के दाँये भाग में होली खेलते नर-नारियों को दर्शाया गया है।

उदयपुर कलम का एक सुन्दर चित्र जो सन् १७०८ से १७१० के बीच में बनाया गया था, वह वर्तमान में नेशनल गैलरी ऑफ विक्टोरिया, मेलबोर्न में है। इस चित्र में महाराजा अमरसिंह को अपने दरबारियों के साथ होली खेलते दर्शाया गया है। इस चित्र की अद्भुत विशेषता है इसका आधुनिक संतुलन। प्रकृति की शोभा चारों ओर बिखरी हुई है और बिखरते गुलाल के बीच महाराज अमरसिंह अपने दरबारियों के साथ होली खेल रहे हैं। इस चित्र में वे इस प्रकार चित्रित किए गए हैं कि जैसे वे धरती के ऊपर आकाश में बैठे हों, जबकि वास्तविकता यह है कि वे धरती पर ही बैठे हैं। कतारबद्ध होली खेलते उनके दरबारी ऐसे चित्रित किए गए हैं जैसे उन्होंने एक लंबाकार रूप में खड़े होकर उस सिंहासन को थाम रखा हो, जिस पर उनके महाराजा बैठकर होली खेल रहे हैं। यह अपने प्रकार का विलक्षण चित्र है।

बीकानेर कलम का एक सुंदर चित्र, जो सत्रहवीं सदी का है, वह जे.पी.गोयनका के व्यक्तिगत संग्रह में है। इसमें गोपियों के साथ होली खेलते राधा और कृष्ण विशिष्ट स्वरूप में अंकित किए गए हैं। इसी तरह आमेर कलम का एक राधा कृष्ण की होली का बेहतरीन चित्र राजा संग्रामसिंह के संग्रह में है। यह सत्रहवीं सदी में बनाया गया था। इस चित्र में कृष्ण मोर मुकुट पहने, राजसी परिधानों में एक चौकी पर खड़े हैं। वे अपने एक हाथ में थमी पिचकारी से सामने खड़ी राधा पर रंग बरसा रहे हैं। उन्हें राधा की सखियों ने घेर रखा है। एक सखी एक बड़ी पिचकारी से कान्हा पर केसरिया रंग की बौछार कर रही है। हरे और लाल परिधान में लिपटी राधा अपने कान्हा के सामने खड़ी है।

नाथ द्वारा कलम में राधा कृष्ण की होली के अनेक अंकन मौजूद हैं। इनमें से अधिकांश अंकन विभिन्न व्यक्तिगत संग्रहों में हैं। यह शैली अपेक्षाकृत अर्वाचीन है, इसलिए इस शैली में बनाए गए अनेक चित्र उपलब्ध होते हैं। एक उत्कृष्ट चित्र, जिसमें राधा और कृष्ण की होली का अंकन है, वह पॉल.एफ. विल्टर संग्रह, न्यूयौर्क में है। यह चित्र १८५० में बनाया गया था। इसमें राधा और कृष्ण को दैवी और मानवीय दोनों ही स्वरूपों में दर्शाया गया है। अपनी परंपरागत वेशभूषा में भगवान कृष्ण राधा से होली खेल रहे हैं। पार्श्व में नाथद्वारा की भव्य अट्टालिकाएँ हैं तथा आकाश में भी देवी-देवता अपने यानों में बैठकर इस होली में सम्मिलित होते दिखाई पड़ रहे हैं।

इंडियन म्यूजियम, कलकत्ता में सन् १७८० में बनाया गया राधा-कृष्ण की होली का एक मनोहारी रूपांकन उपलब्ध है। यह पहाड़ी कलम का है। इसी तरह चंडीगढ़ म्यूजियम में काँगड़ा कलम का अठारहवीं सदी का होली खेलते कृष्ण का एक सुंदर रूपायन मौजूद है। इस तरह न केवल राजस्थान और पहाड़ की बड़ी-बड़ी रियासतों में बल्कि छोटे-छोटे ठिकानों में भी होली के सुंदर रूपांकन हुए। होली और राग वसंत के इन रूपायनों के अलावा कहीं-कहीं राग हिंडोला में भी होली के दृश्य भारतीय लघुचित्रों में दिखाई देते हैं।

राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली, भारत कला भवन, बनारस तथा महाराजा छत्रपति शिवाजी संग्रहालय मुंबई (प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम) जैसे विश्वप्रसिद्ध भारतीय संग्रहालयों के अतिरिक्त अनेक व्यक्तिगत संग्रहों तथा भारत की कला वीथियों में होली के मनोहारी रूपांकन मौजूद हैं। विदेशों में विशेषकर इंगलैंड में विक्टोरिया एँड अलबर्ट म्यूजियम, लंदन, ब्रिटिश म्यूजियम, इंडिया ऑफिस कलेक्शन जैसे संग्रहालयें में तथा अनेक व्यक्तिगत संग्रहों में होली के महत्वपूर्ण अंकन मौजूद हैं। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न संग्रहालयों में भी होली के मध्यकालीन लघु चित्र संरक्षित हैं।

ऐसे अनेक चित्रों का उल्लेख किया जा सकता है और ऐसे अनेक चित्र अभी मौजूद हैं, जिनका अध्ययन किया जाना है। इस अनमोल विरासत का अध्ययन करना और इससे रूबरू होना अपने आप में एक अप्रतिम अनुभूति है। होली का त्योहार बार-बार उस भाव का स्मरण कराता है जिस भाव में डूबकर राधा और माधव के अलौकिक प्रेम को अष्टछाप के महान कवि नंददास ने इन शब्दों में बाँध दिया था—

रंग रँगीली राधिका
रंग रँगीली पीय
इहि रंग भीनै नित बसौ
नंददास के हीय। 

१ मार्च २०१९

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