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 ललित निबंध

 

मेरा प्रिय पाहुन वसंत
- पूरन सरमा


जी हाँ, मैं वसंत बेचता हूँ। भाँति-भाँति के वसंत, हरा-पीला-लाल और गुलाबी वसंत। सतरंगी आसमान तक फैला नीला वसंत। मेरी वसंत की दूकान में वसंत कोई महँगा नहीं है। आप एक बार आइए तो सही। अच्छा और किफायती लगे तो ले लेना, वरना लौटा देना मेरा मखमली दूब वाला हरा-भरा वसंत। शायद आपका ध्यान नहीं गया, वसंत की मेरी दूकान वर्षों पुरानी है। पूरे वासंती मौसम में भीड़ पड़ी रहती है। आपने शायद नहीं देखा है वसंत। देखेंगे तो चेहरा खिल उठेगा और हँसी नाचने लगेगी आपके होंठों पर। मेरे वसंत में महक है और मदहोश कर देने की शक्ति भी। आप किस चिंता में डूबे हैं और निराशा का कारण क्या है? मुझे पता है, आपने वसंत को नजदीक से देखा नहीं है, इसीलिए नहीं जानते हैं उसकी महत्ता को। जितना दिल खुला होगा, वसंत भी उतना ही खिलखिलाएगा। मेरे वसंत के रंग हजार हैं। जो भी रंग पसंद हो, उसी रंग का लीजिए वसंत। बैर, कटुता, द्वेष और कलह मिटानेवाला वसंत। थैले में नहीं, झोली में भर लीजिए वसंत।

हल्की गुलाबी ठंडी बयारवाला भीना-भीना वसंत। मोगरे की तीखी गमक-गंधवाला सफेद वसंत और सरसों के पीले फूलों से सुबह-सुबह ओस से नहाया हुआ ताजा-ताजा वसंत। यहीं क्यों, गुलाब के खेत में खिला बहुरंगी मनोहारी वसंत। बागों से पूरी मनुहार के साथ लाया गया मनभावन वसंत। सारी पीड़ाएँ हर लेगा, तनाव-मुक्त कर देगा और खुशमिजाज बना देगा मेरा सुंदर सपनों से सजा फूलोंवाला वसंत। वसंत पंचमी को ही मैंने श्रीगणेश किया है, सरस्वती पूजन के साथ मैंने इस गदराए, सजीले, रुपहले और मदमाते वसंत का। रूप, लावण्य और गौर वर्णवाले वसंत को खरीद लीजिए, बहुत सस्ता है, कर-मुक्त वासंती दूकान का यह प्राकृतिक वसंत। सारी धरती को इसने अपनी चपेट में ले लिया है। महँगाई इसे छू भी नहीं पाई है और नदी की शीतल धार में अभी-अभी नहाकर आया है। यही नहीं, यह रागों में गाता है तो पक्षी लगते हैं चहकने और हिरन भरते हैं कुलाँचें। खरगोश सा मुलायम रेशोंवाला धवल-दूधिया वसंत।


मैं आपकी खुशामद इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि इसका स्टॉक डेढ़-दो माह में बीत जाएगा और इसके बाद आप हाथ मलते रह जाएँगे। इस समय मेरी वासंती दूकान इसके बेशुमार स्टॉक से भरी पड़ी है। इन दो माहों में मैं चौबीसों घंटे वसंत बेचता हूँ। दूकान खुली ही रहती है रात-दिन। अपनी सुविधा से आइए और आजमाइए, जीवन बदल जाएगा। कम पड़ जाए तो मन चाहे उतनी बार आकर ले जाइए, रूप, रंग और चमचमाता सुनहला वसंत। आप अकेले क्यों आते हैं, घरवालों, पड़ोसियों और सगे-संबंधियों, सबको लेकर आइए। हर उम्र के लिए मुफीद और आरामदायक, हँसता-बिहँसता और खिलखिलाता वसंत। आप कीमत और बाजार भाव से घबरा रहे होंगे। घबराइए नहीं, मैं इसकी कीमत भी बता दूँगा। मेरी पहली शर्त आपका मेरी दूकान पर आगमन जरूरी है। आएँगे तो खुद जान जाएँगे, यह कितना सुलभ और सस्ता है। हड़बड़ी और जल्दबाजी में न आएँ। इसका मजा किरकिरा हो जाएगा। मिठाई से मीठा और नमकीन सा
चटपटा स्वादवाला वसंत।

खेतों में मीलों तक फैला है वसंत। धूप-छाँव का अनोखा खेल खेलता और अनूठा राग अलापता अलगोजे से निकलता सुमधुर वसंत। नव कोंपलों में फूटता लयकारी गुनगुनाता वसंत। सुबह-सुबह नाचता मोरपंखिया वसंत। हर तरफ फूलों की बारात सजाए, बंदनवारें सजाता और पलाश में दहकता वसंत। वन-उपवन में इठलाता, कूदता, गंधायमान अनूठा वसंत। वसंत की मेरे पास अकेली दूकान है। लाइन में लगने की नौबत नहीं है। अपनी मरजी और मस्ती से भरकर ले जाइए वसंत। रागमाला चित्रों से सज्जित है नायाब वसंत। रूप भी एक नहीं, बहुरूपिया है वसंत। चैन और सुकून देनेवाला चित्ताकर्षक वसंत। मदिरा और भाँग से भी ज्यादा नशीला वसंत। रसीला भी यह कम नहीं है, एक बार लेकर तो जाइए, रस से सराबोर कर देगा, भीग जाएँगे आप इस मदमाते वसंत की गंध से।

कीमत ज्यादा नहीं है, अपनी एक मोहक मुसकान दे जाना और ले जाना ढेर सारा माघवाला ठंडा-ठंडा वसंत। वसंत भाग रहा है फागुन की ओर। फागुन में रूप की होली, गुलालों वाली होली की तरफ लपकता होलीवाला वसंत। मदनोत्सव का पर्याय है वसंत। शांतिनिकेतन में वेणी में सजा और नाचता वसंत। रूप की थाप पर थिरकता और आह्लाद से भरा प्रकृति का श्रृंगार-वसंत। निराला की कविता का नवोत्कर्ष, मन को भानेवाला वसंत, मन को हरषानेवाला मेरा प्रिय पाहुन वसंत।

वसंत कोई बेचा थोड़े ही जाता है। यह तो आपको बहलाने-बहकाने का बहाना है मेरा। यदि आप हँसकर वसंत को घर के लिए ले जाएँगे तो क्या बिगड़ जाएगा। एक तरह से मेरा वसंत मुफ्त का है। इसीलिए तो कहता हूँ, ले जाइए खूब सारा वसंत। हरा-भरा और बतियानेवाला वसंत । चाँदनी रात में देखना कभी वसंत को, साक्षात् परियों का राजा सा लगता है वसंत। मुझे पता है, आपके पास वक्त नहीं है। वक्त निकालिए और ले जाइए मेरा मतवाला वसंत
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१ मार्च २०२५

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