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संस्कृति


झाड़ू-देवी की कथा

- रमा चक्रवर्ती
 


साधुजनों के परित्राणार्थ दुष्कर्मियों का विनाश कर घर-घर में शुचिता स्थापित करनेवाली हे सम्मान की देवी सम्मार्जनी तुमने विश्व के समस्त घरों में, मंदिरों में, होटलों में, पाठशालाओं में और कहाँ तक गिनाऊँ, सर्वत्र अलौकिक मानव प्रीति से भरकर तथा सर्वदा लोकहित-व्रत लेकर अपने जीवन का उत्सर्ग किया है। पाठक अभी तक समझ गए होंगे कि झाड़ू को आदर से संस्कृत में सम्मार्जनी यानी सब कुछ चमका कर साफ़ कर देने वाली कहा गया है।

इस पूरे लेख में झाड़ू के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए इसे सम्मार्जनी के नाम से ही संबोधित किया गया है। इसके विषय में कहा गया है कि हे देवी तुम सम्मार्जनी के रूप में संध्या, पूजा के मंदिरों को, झाडू के रुप में प्रत्येक गृह, दफ्तर आदि को, वाड़न या बढ़नी नाम से दूकानों कोस, कोस्ता या पोंचड़ा नाम से कारखानों के तरल द्रव्यों को, ब्रुश नाम से होटलों, स्टेशनों, दाँतों और जूतों की पॉलिश की सहायता से सुंदर एवं निर्मल करती हो।

हे कलुषनाशिनी, तुम्हारे नाम देश-भेद से सम्मार्जनी, झाँटा झाड़ झाडू, कूचा, वाढ़न, बढ़नी, कोस्ता, पोंचड़ा, ख्योंरा ब्रुश, ब्रास, पॉलिश आदि अनेक हैं। रूप एवं व्यवहार भेद से तुम दीर्घ एवं वर्तुले तथा कोणविशिष्ट आकार को धारण करती हो। इस प्रकार रिपुदमन यह झाडू देश, काल, पात्र तथा व्यवहार भेद से एवं आकार भेद से अनेक रूपा है। परंतु सभी युगों में (सत्य, त्रेता, द्वापर) मालिन्य मोचन द्वारा ही संसार का संकट मोचन इसने किया है। तभी तो रत्नमाला ग्रंथ में कहा गया है-सम्मार्ज्जनश्च संशुद्धिः संशोधने विशोधने।

अपने विशिष्ट गुणों के कारण इसे कभी देव और कभी दैवी रुप में वर्णित किया है। भर्तृहरि ने कहा है-
स्त्रीपुसावात्मभागो ते भिन्नमूर्तेः सिसृक्षया। प्रसूतिमाजः सर्गस्य तावेव पितरौ स्मृतौ।।
द्रवसंघातकठिनः स्थूलसूक्ष्मो लघुगुरुः। व्यवतो व्यवतेतरश्चासि प्राकाम्यं ते विभूतिषु।।

इतिहास के पृष्ठों में इसके विषय में अनेक रोचक कथाएँ मिलती हैं। शाहज़ादा शुजा की कन्या अमीना (तिन्नि) द्वारा झाडू से प्रहार करने पर होने पर अराकान के राजकुमार अत्यंत प्रसन्न हुए थे। दिल्ली के सम्राट अकबर के खुशरोज मेले मीना बाज़ार में अश्लीलता दमन के लिए अनेक तेजस्विनी राजपूत नारियों ने इस झाडू से ही अपने सतीत्व की रक्षा की थी। यूनानी जातीय विद्रोही रिवेल ने कमालपाशा के हाथों झाडू की मार खा कर आत्म संयम की शिक्षा प्राप्त की थी। इस वीर रिवेल या कमाल को तुर्की का न्याय संगत नायक माना गया है। इस प्रकार इस सम्मार्ज्जनी यानी सबको साफ़ कर देने वाली झाड़ू देवी की बहादुरी के अनेक ऐतिहासिक किस्से उपलब्ध होते हैं।

शास्त्रकारों ने तो यहाँ तक कहा है- अजरजः खररजस्ततः सम्मार्ज्जनीरजः। स्त्रीपादरजौ राजन् शक्रादपि हरेत श्रियम्। व्यवहार सौरव्यम्। अर्थात् धन्य है सम्मार्ज्जनी! अज की पदधूलि, अश्वतर की पदधूलि, सम्मार्ज्जनी की पदधूलि देवराज इंद्र का भी श्री हरण करती है।

अंतरिक्ष वासी झाडू ज्योतिर्विद डाक्टर हेली साहब के अनुसार - तीनों लोकों में निवास करने वाली तथा अणिमा, लघिमा गुण संपन्ना यानी छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा आकार धारण करने में समर्थ यह झाडू या उल्का या धूमकेतु-सम्मार्ज्जनी यानी झाड़ू के रूप में वर्णित की गई है। महाकवि मिल्टन के अनुसार महामारी धूमकेतु सम्मार्ज्जनी का अनुसरण करती है। यह भी कहा गया है कि सम्मार्ज्जनी का देव शरीर सूवर्णमय था, एवं उसके कटिभाग में मणि-माणिक्य आदि शोभायमान थे, क्या यह सत्य है? कलियुग में तो कटिभाग में रस्सी से ही बाँधी जाती है। वह कौन सा युग रहा होगा जिसमें मणि-माणिक्य आदि झाड़ूदेवी की कमर को सुशोभित करते होंगे।

एक किंवदंती है कि बिल्ली को यदि झाडू से मार दिया जाय तो वह जैसे भी हो मर जाती है, मालूम नहीं यह सत्य है या नहीं परंतु यह तो सत्य है कि साधारण मनुष्य को इसके प्रहार से कोई प्रसन्नता नहीं होती। झाडू के सहोदर नारियल के रेशे से भी कितने ही प्रकार के ब्रुश बनते हैं और स्वयं सहोदर की तो महिमा ही अपार है। उनका जल तथा मधुर घोल मातृ-दुग्ध के अभाव का भी मोच कर सकता है। यह बात वैद्य सम्मेलन द्वारा स्वीकृत है।

झाड़ू का धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष भी कुछ कम रोचक नहीं। संतापहारिणी, शांतिविधायिनी माँ शीतला का शासन दंड भी सम्मार्ज्जनी झाडू ही है। परंतु माँ जब अपने राजकीय वेश में रहती थी तभी इसे लेती थी अपने वाहन को ठीक रखने के लिए। वाहन को ठीक रखने में झाड़ू या ब्रुश का क्या महत्व है इसको सब जानते हैं। प्राच्य तथा पाश्चात्य देशों के सांस्कृतिक रुचिभेद तथा मतभेद रहने पर भी इस सम्मार्ज्जनी की शक्ति पर सब एकमत हैं। गया धाम में विष्णुपाद मंदिर जिस झाडू से साफ़ किया जाता है, वह सम्मार्ज्जनी जब मंदिर के बाहर आती है तब उस झाडू को भक्त हिंदुओं की भीड़ अत्यंत सम्मान के साथ अपने सिर पर लगाती है। आज भी यही परंपरा है। झाडू लगानेवाले को भक्तगणों द्वारा उचित पारितोषिक भी दिया जाता है।

टोने टोटके में भी झाड़ू का खूब प्रयोग होता है। प्राचीन बंगला देश (संप्रति कामाख्या कामरूप) में झाँटा वाण द्वारा धूल पड़ा, जल पड़ा, तेल पड़ा आदि टोटका, गाँठुली बात, मादुली, कवच ठीक तथा शुद्ध होता है। झाडू वाण द्वारा भूत, प्रेत, धागी, बोका, मामुदो, च्यांनाड़ा, ब्रह्मदैत्य, निरालंब, वायुमुक आदि शांत किया जाता है। सत्य, त्रेता, द्वापर युगों में इस सम्मार्ज्जनी का क्या रूप तथा शक्ति या पद मर्यादा थी यह ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता है, परंतु पंचवाण में सम्मोहन उन्मादन, तापन, शोषण तथा स्तम्मन शक्ति थी। यह अनुमान किया जा सकता है। कर्णमर्दन-वाटिका, वेत्नखंड पाचन, उपानत रसायन, पदाघात, अरिष्ट, चड़ाघ घृत, किलाच अवले आदि औषधियाँ जब सफल नहीं होती हैं, तब इसके स्पर्शमात्र से रोगी रोग मुक्त होते हैं। अतः इसकी उपयोगिता निर्विवाद है।

इस विश्वप्रसिद्ध झाड़ू में देवाशंसम्मत आश्रित वत्सल, अवलावांध, त्रिकालज्ञ, मोहमुद्दरगर ज्ञानांजन श्लाका सभ्यता निदान, आयुश्रेष्ठ सम्मार्ज्जनी शक्ति द्वारा हम अपने को शुद्ध पवित्र करते हैं। संसार की सभी हड़तालें चल सकती हैं परंतु इसकी हड़ताल एक दिन से अधिक कहीं भी नहीं सही जा सकती है। कहा गया है कि पतितोद्धारिणी गंगा इनके वृक्ष का लालन पालन करती है। लक्ष्मी इसकी साहचर्य कामना करती है। पहले इनकी सहायता से संसार साफ़ होता है और बाद में गंगाजल से पूर्ण शुद्ध होता है।

बंगाल में कहावत है- 'लक्ष्मी श्री चाओ यदि, झाँटा घर निरवधि।'' अर्थात अगर लक्ष्मी की कामना है तो घर की सफ़ाई रोज़ झाड़ू से करनी चाहिए। बंगाल में जब  नवविवाहिता वधू घर में आती है तो सर्वप्रथम घर में ननदे आदि झाडू को साड़ी पहनाकर सजा-धजाकर कोने में बैठा देती है और बहु से कहती हैं (व्यंग्य के रूप में) - यह गृहलक्ष्मी है।' कहीं कहीं 'यह दादी है' आदि कहकर बहू को उसे प्रणाम कराते हैं। इसका तात्पर्य अनुशासन की शिक्षा देना है।

२८ अप्रैल २००८

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