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रत्न रहस्य (4)

 

रत्न चिकित्सा से टयूमर का उपचार


वी के जैन 


यूमर शरीर के भीतर एक असाधारण उपज है। ये ठोस व अर्द्ध–ठोस पदार्थों का मिश्रण है तथा किसी भी अंग में कभी भी धीरे धीरे विकसित हो सकते हैं। साधारण तौर पर इसकी उपज का कारण प्रगट नहीं होता। 

टयूमर दो प्रकार के होते हैं, एक बेनाइन व दूसरा मेलाइन। बेनाइन खतरनाक नहीं होते हैं और अपनी सीमा में रहते हैं परन्तु मेलाइन तेजी से बढ़ते हैं तथा शरीर के दूसरे हिस्से में फैलते हैं। मेलाइन एक कैन्सर सैल है और शारीरिक सैल से अलग तरह का है जो कि जंगली बेल के भांति बढ़ते हैं तथा आसपास की जगह को भरते रहते हैं। ये शरीर के स्वस्थ सेल को विकृत कर उनकी सुचारू क्रिया को अवरूद्ध करते हैं। इस सब प्रक्रिया के होने में सालों लगते हैं और रोगी इससे अनभिज्ञ रहता है।

टयूमर के प्रकार सौ से अधिक हैं और उनके नाम अधिकतर शारीरिक अंगों पर आधारित हैं। प्रत्येक के अपने लक्षण है जो एक दूसरे से शरीरिक बनावट के अनुसार भिन्न हैं:

गर्भाशय का टयूमरः 
इसकी उपज यूटरस की दीवारों में या बाहरी सतह पर डण्ठल की तरह होती है। इसका आकार मटर दाने से लेकर टेनिस के गेंद तक का हो सकता है। ये अधिकतर कैन्सर नहीं होते परन्तु बड़ा आकार खून का रिसाव पैदा करता है या पेशाब में रूकावट डालता है। 

सिस्ट व पौलिपस
यह अनेक साइज में होता है और अधिकतर श्लेष्मा मेम्ब्रेन में पाया जाता है। ये बेनाइन हैं तथा मशरूम के आकार के दिखाई देते हैं, इनका कारण पारिवारिक इतिहास भी है। इन्हें विटामिन सी, जल अधिक मात्रा लेने व अच्छे भोजन के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

ब्रेन टयूमर : 
यह मस्तिष्क में होता है और इसका कारण सेल का अपने आप अनियंत्रित ढंग से बढ़ना है। ये बेनाइन व मेलाइन दोनों हो सकते हैं। मेलाइन खतरनाक होते हैं क्योंकि मस्तिष्क के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकते हैं तथा रीढ़ हड्डी तक घुस सकते हैं। अगर मस्तिष्क में खाली जगह अधिक हो तो मानव को इसका पैदा होने का पता नहीं चलता है परन्तु जगह की कमी हो तो आस–पास के सेलों पर दबाव बढ़ जाता है तथा मस्तिष्क सेल को विकृत करना शुरू कर देता है और नसों पर दबाव के कारण इनमें बहनेवाला द्रव अवरोध होता है। ऐसी स्थिति कई समस्यायें पैदा करती हैं जिसकी वजह से टयूमर को निकालना पड़ता है।

स्तन कैन्सर : 
लगभग 1 करोड़ महिलाएं विश्व में इसका शिकार हैं। अधिकतर यह एक सख्त गांठ व दर्द के बगैर मेंलाइन टयूमर होती हैं और खतरनाक होती है। इसकी उपज 40 वर्ष के बाद ही होती है।

प्रायः देखा गया है कि कैन्सर व टयूमर का पता अग्रिम अवस्था में चलता है, इसको जानने के लिये टयूमर की बाइप्सी की जाती है और इसक एक छोटे से टुकड़े को काटकर प्रयोगशाला में माइक्रोस्कोप से उसका अध्ययन करते हैं। शल्यक्रिया से ट्यूमर या कैंसर को निकाल दिया जाता है पर एक तो इस क्रिया से कई अन्य कष्ट उत्पन्न होते हैं दूसरे इसके बनने की प्रक्रिया पूरी तरह बन्द या समाप्त नहीं होती। कीमोथैरेपी से बाल उड़ना, उलटियां, कमजोरी, थकावट आदि तथा यकृत, गुर्दे व हृदय को नुकसान पहुंचा सकती हैं। 

आज हम सब ऐसे वातावरण में रहते हैं जहां हवा, पानी, मिट्टी में जहरीले पदार्थों का मिश्रण है ऐसा वातावरण अन्य रोगों के साथ ही ट्यूमर की स्थिति को भी खराब करता हैं। इसके अतिरिक्त रहन सहन का तरीका, खान–पान, सोने के नियम और मानसिक तनाव इत्यादि धीरे–धीरे शरीर को कमजोर करते जाते हैं। 

जब भी कैन्सर का पता लगे, भय से ग्रस्त होने की बजाय धैर्य से काम लेना चाहिये। नियमित आहार विहार और व्यायाम करते हुए प्राकृतिक साधनों पर जीवन को लाने का प्रयत्न करना चाहिये। रत्न चिकित्सा द्वारा इस पर बिना किसी कष्ट के विजय प्राप्त की जा सकती है।

ट्यूमर के लिये ग्रहों की रंगीन उर्जा के सिद्धान्त को रोगी के कष्ट के साथ समन्व्य करते हुए समझ कर विश्लेषण किया जाता है जिससे मूल्य कारणों का पता चल सके और आवश्यकतानुसार रत्नों का चयन किया जा सके। यह आसान कार्य नहीं है अतः इसके लिये योग्य रत्न चिकित्सक से सलाह लेकर रत्न धारण करवाए जाते हैं।  रत्न शरीर के किसी विशेष स्थान या अंगुलियों में पहनते हैं जिससे असमन्वय वाले केन्द्रों की उर्जा को कम या अधिक किया जा सके। जैसे–जैसे केन्द्र की ऋणात्मक व धनात्मक उर्जा सुचारू स्तर तक पहुंचने लगती है वैसे वैसे रोग का निदान होता चला जाता है।

टयूमर के लिये रत्न चिकित्सा की दो विधियों का साथ–साथ प्रयोग किया गया। पहली विधि में टयूमर को बढ़ने से अवरूद्ध किया और दूसरी में शरीर की रोग अवरोधक प्रणाली को पुष्ट किया गया ताकि शरीर को रोग से लड़ने की शक्ति प्राप्त हो। टयूमर की बढवार को अवरूद्ध करने के लिये नीले व जरकन रत्नों का उपयोग किया तथा रोग अवरोधक प्रणाली की बढ़ौतरी के लिये अनेक रत्नों की मदद ली गयी। प्रायः यह देखा गया कि जो टयूमर बिना छुए, बिना काटे या बिना पंक्चर के थे सब अपनी–अपनी पूर्ण अवस्था में आ गये। सही अवस्था में आने का समय 6 से 36 महीने रहा। यह समय टयूमर की किस्म व आकार पर आधारित था। यह प्रयोग पेट, छाती, मस्तिष्क, व गर्भाशय के ट्यूमरों पर किया गया। उपचार के दौरान रोगी को सलाह दी गई थी कि वे समय–समय पर डाक्टर से चेक कराएं व परामर्श लेते रहें ताकि टयूमर की स्थिति की सही जानकारी मिलती रहे। 

अग्रिम अवस्था वाले कुछ कैन्सर टयूमर रोगी जिनका जीवन काल बहुत कम था, का उपचार इस विधि से किया गया पर सफलता अधिक मात्रा में नहीं मिली। ऐसी घटनाओं में प्रायः देखा गया कि आरम्भ में रत्नों का प्रभाव बहुत अच्छा रहा और रोगी व परिवार जनों मे एक नयी आशा जगी परन्तु यह कुछ समय की ही रही। इस रोग पर अभी भी नये प्रयोग जारी हैं। प्रारम्भिक प्रयोगों से पता चलता है कि रत्न चिकित्सा का योगदान टयूमर की प्रारम्भिक अवस्था में अच्छे परिणाम दे सकता है। यदि इस विधि का आधुनिक चिकित्सा पद्यति के साथ–साथ प्रयोग किया जाय तो बड़ी ही कारगर सिद्ध हो सकती है।  

 
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