प्रौद्योगिकी

माउसलेस- एक अदृश्य कंप्यूटर माउस
रश्मि आशीष


क्या आप कल्पना कर सकते हैं बिना माऊस के पी सी की। आजकल कम्पयूटर पर किसी भी तरह का काम करने के लिए माऊस की आवश्यकता पड़ती है। हालाँकि बाज़ार में ट्रैकबॉल जैसे और भी उपकरण रहे हैं लेकिन माऊस जितना लोकप्रिय कोई भी नहीं हुआ। माऊस जैसा कुछ और अगर प्रचलन में है तो वो लैपटॉप में प्रयोग होनेवाला, ट्रैकपैड है। लेकिन लैपटॉप पर काम करने वाले लोग भी अक्सर उसकी जगह माऊस ही इस्तेमाल करना पसन्द करते हैं।

अब सोचिए कि यह माऊस गायब हो जाता है। जी हाँ - पारदर्शी नहीं, अदृश्य नहीं, पूर्णतयाः अंतर्ध्यान। अब बिना माऊस के काम कैसे किया जाए। सिर्फ सोचिए कि माऊस चला रहे हैं और वह चलेगा। बिलकुल जादू की तरह। एम आई टी के एक वैज्ञानिक ने ऐसा ही अविष्कार किया है, और उसको नाम दिया है - माउसलेस।

माउसलेस को एक न दिखनेवाला माऊस कहा जा सकता है। रोचक बात तो यह है कि आपको लगेगा कि आप माऊस का प्रयोग कर रहे हैं पर वास्तव में वहाँ कोई माऊस नहीं होता है। आपको बस अपना हाथ ऐसे रखना है जैसे कि आपने कोई माऊस पकड़ रखा हो, बाएँ और दाएँ क्लिक के लिए अपनी उँगलियाँ हिलानी हैं - और यह अविष्कार स्वतः ही सारे संचलन और क्लिक का पता लगा लेगा। आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि यह माजरा क्या है - आखिर यह काम कैसे करता है? तो चलिए इसके बारे में जानते हैं -

माउसलेस माऊस कैसे काम करता है - (कार्य संरचना)

यह अविष्कार एक इनफ्रारेड लेज़र तथा एक इनफ्रारेड कैमरे की मदद से काम करता है। दोनों कम्पयूटर में ही लगे होते हैं। लेज़र किरण को इस तरह से फैलाया जाता है कि यह कम्पयूटर रखने वाली जगह के ऊपर अधोरक्त लेज़र का एक समतल बना देती है। यहीं पर हाथ ऐसे रखा जाता है जैसे माऊस पकड़ा हो। हाथ हिलाने पर अधोरक्त कैमरा उसे पहचान लेता है और स्क्रीन पर कर्सर उसी हिसाब से चलता है। इसी प्रकार से उँगली हिलाने पर कैमरा उसे भी पहचान लेता है और उसे माऊस क्लिक में बदल देता है। माउसलेस नाम का अविष्कार श्री प्रणव मिस्त्री की देखरेख में एम आई टी  की मीडिया लैब  में फ्लूइड इंट्राफेसेज ग्रुप ने किया है।

नीचे दिए गए वीडियो में इसकी क्षमताओं को बड़े मनोरंजक ढंग से दिखाया गया है -



जहाँ तक मूल्य की बात है, कई आविष्कारों की तरह यह अत्यन्त महँगा नहीं है। इसके निर्माताओं के अनुसार इसको बनाने में केवल २० $ (लगभग १००० रू ) की लागत आती है। बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर यह लागत और कम हो सकती है।

१३ सितंबर २०१०