हास्य व्यंग्य

दगे पटाखों की महक
—के पी सक्सेना 


शुभं करोति कल्याणं ...आरोग्यं धन संपदा ...शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योति नमोस्तुते।' सुहाग अखंड ...आनंद अखंड। इसी आशीष के साथ एक पुराने मैच का 'एक्शन री–प्ले' दोहरा रहा हूँ, मेरी बहनों ...बेटियों! इसे 'फ़ुरसतनामा' समझ कर पढ़ लेना। दगे हुए पटाखों के धुओं की भी एक याद होती है। ख़ैर!

लैंपपोस्ट के नीचे वह किसी रिक्शे का इंतज़ार कर रही थीं। कल दीवाली है। एक हाथ में पैकेट, दूसरे से एक छह वर्षीय मासूम बच्चे की अंगुली पकड़े। बालों में सफ़ेदी, आँख पर सुनहरा चश्मा, शरीर फैल गया था। साँवले चेहरे का सारा सोडियम क्लोराइड (नमक) उम्र ने धो दिया था। रह–रहकर मुझे ग़ौर से देख रही थीं। न रहा गया तो धीरे से पूछा, "आप के.पी. सक्सेना हैं न?"
मैंने ग़ौर से देखा। अचानक मुँह से निकल गया, "आप घंटी!"
धीमी हँसी हँसकर बोली, "धत‌! अब कहाँ की घंटी। देख रहे हो, घंटाघर हो गई हूँ। यह मेरा ग्रांडसन है, प्रतुल! नमस्ते करो बेटे, बाबा हैं।"

यादों के सारे थान तेज़ी से खुल गए। सन बावन में गोरखपुर के सेंट एंड्रूयूज कालेज में बी.एस-सी. में मेरी साथ थीं। छोटे कद के कारण सारा क्लास, दबी ज़बान 'घंटी' कहता था। आगे लहराती दो चोटियों में चाँदी के घुँघरुओं की छोटी–छोटी घंटियाँ। मुझे ग़ौर से देखकर बोलीं, "केपी, ऐसे क्या देख रहे हो, मुठ्ठी में बँधी रेत फिसल गई सब। पैंतालीस दीवालियाँ बीत गईं। छह साल पहले पति एक्सीडेंट में नहीं रहे। बेटा यहाँ इंजीनियर हैं। होली-दीवाली-दशहरा यहीं मनाती हूँ। वैसे दिल्ली में पति के मकान में अकेली रहती हूँ। तुम कैसे हो? क्या सोच रहे हो?" उसकी आँखों में बादल छलक रहा था।
मैंने कहा, "हिश! त्योहार पर गीली आँखें! देख यार, कभी ध्यान से देख। दीवाली की रात हर मुंडेर पर कोई एक दिया बुझता रहता है। दस साल पहले तेरी भाभी नहीं रही। बेटे–बहू के साथ हूँ। ऐसा ही एक पोता भी है। छोड़, यह सब। लिफ़ाफ़े में क्या हैं?"
बोली, "बच्चे के पटाखे।"
मैंने हैरत से कहा, "इतने ज़रा से।"

बोली, "यही डेढ़ सौ के हैं। अपना टाइम भूल जाओ, लल्लू! दो रुपयों में थैला भर जाता था। मिठाइयों से दिल भर जाता था, मगर मुँह से देशी घी महकता रहता था। लकीरें पीट रहे हैं हम। सुनो, मैं महीना भर यहाँ हूँ। एफ–6, गांधी एन्क्लेव। याद रहेगा। बेटे–बहू से मिलाऊँगी। प्रो ग्रोवर, डा.शुक्ला, प्रो.वार्की, प्रो.सहाय की गुज़री बातें करेंगे। आओगे न? उम्र के अंधेरे गलियारे में कुछ रोशनी तो मिले।" उसने गीली आँखें पोंछी।

मैंने हँसी में पीठ थपथपा कर कहा, "घंटी तू तब भी सेंटीमेंटल थी, अब भी हैं। कल आऊँगा।" वह चली गई। तभी पीछे से एक हाथ में सरदार ढ़ढ्‌ढ़ा साहब ने धर लिया। दूसरे में मिठाई का डिब्बा था। इधर–उधर झाँक कर धीरे से बोले, "बाऊजी, आप नूं मेरे सिर दी सौं (कसम)। चुट्‌ट (झूठ) नई बोलना। ये किस पोखरन दा दगा होया परमाणु बम था? बड़े प्रेम नाल मिठ्ठी–मिठ्ठी गलां बुड्‌ढ़ी नाल।"
मैंने सब कुछ बता दिया। सरदार साहब भरे गले से बोले, "रब्ब दे खेल निराले। अग्गे–पिच्छे, सबदा नंबर लग्गा होया है। पर त्योहार दे दिन मन गिल्ला नई होणा चाईदा। यह होली–दीवाली, ईद–बिसाखी क्या मेरी–तेरी है? अगणे हिस्से दे अनार छोड़ लिए। हुण (अब) सब बच्चयाँ दा है।"

मिर्ज़ा भी जाने किस कोने से बरामद हो गए। टोपी में चार गुब्बारे बँधे थे। बोले, "भई माफ़ करना, छुटी हुई फुलझड़ी का डब्बा हमने भी देख लिया। कालेज में क़यामत रही होगी। इसी पर एक शेर हुआ है – 'बुढ़ापे में ज़बानी से भी ज़्यादा जोश होता है, भड़कता है चिराग़े सहरी जब ख़ामोश होता है' (चिराग़े सहरी–सुबह का दीपक)।
मैंने पूछा, "ये गुब्बारे?"

बोले, "लेना मत, एक भी। तुम्हारी भाभी के लिए हैं। तीज–त्योहार बच्ची गुब्बारे फोड़ती हैं।" सरदार उन्हें डाँटने ही जा रहे थे कि मिर्ज़ा बोला, "ख़ामोश! सिर झुकाकर अदब से हो जा। तेरा एटम बम आ रहा है।"
सचमुच ढढ्‌ढानी कई पैकेट लादे–फादे चली आ रही थीं। बोली, "ये तीन निकम्मे इत्थे कौन से छोले पका रहे हैं?" फिर मुझसे बोलीं, "वीरजी (भाई) मैं शम्मी (शाम को) आ रईयाँ। बहू दे वास्ते साड़ी लाई हूँ।" मेरी आँखें भर आईं। कहा, "भाभी इस फुज़ूलखर्ची –"
सारी पावर लगाकर ढ्‌ढ्‌ढ़ानी बमक गईं, "क्या कहा, फुज़ूलखर्चीं?"
मिर्ज़ा ने समझाया, "भाभी, ज़ाहिलों के मूँ नहीं लगते। इसे खुद बाँधनी आती होती तो लपक लेता। ईद पर आप मेरी नाज़नीन बुड्‌ढ़ी का सलवार सूट लाईं। मैं बोला?"

ढढ्‌ढ़ानी ने मुझे समझाया, "वीर जी मैंने तो दारदी ते स्वर्ग दी रिज़र्व बैंक विच खाते नहीं खोलने। मेरे कुड़ी–पुत्तर लाएँ, पहने बस। कल दिवाली दी शाम मेरी बहू अपनी चाई जी (चाची) दी साड़ी दा गिफ्ट पहनेगी, मन खुश होगा।"
"बस भैनजी, इन छोटी–छोटी हमदर्दियों की खुशबू ही मेरी इस उम्र की दीवाली हैं। क्या यह कम हैं कि कल बहू को ढढ्‌ढ़ानी चाई जी की बदौलत अपनी सास की कमी नहीं खलेगी? मगर बदलते वक्त के साथ ये हमदर्दियाँ कब तक? दीपावली शुभ हो, भैना!"

१ नवंबर २००२