हास्य व्यंग्य

हमारे नेताजी!
— भूपेंद्र सिंह कटारिया


'न दोष किसी के देखो, न पोल किसी की खोलो
स्वतंत्र देश के नौजवानों, गांधी जी की जय बोलो।'
ये सिद्धांत पंक्तियाँ हैं, जो हमारे नेता जी ने अपनी पार्टी के स्वर्गवासी और भावी स्वर्गवासी नेताओं की चौखटों के नीचे उकडू टाँग रखी है। नेताजी, मेरे बचपन के लंगोटिया यार है, इसलिए उनसे मेरा खुला याराना आज भी जारी है। छोटी-मोटी समस्या, मसलन रिज़र्वेशन, बच्चों का एडमिशन, बिजली-पानी की समस्या आदि-आदि को चुटकियों में हल कर देते हैं। हालाँकि आज उनकी और मेरी हैसियत में ज़मीन–आसमान का अंतर आ गया है। मैं, एम.ए. करके देश के वर्तमान जारी रिवाजानुसार चप्पलें घिस–घिसाकर किसी तरह से दोयम दरजे के समाचार–पत्र में छुटमैया पत्रकार बन पाया हूँ। वैसे भी आजकल देश में हर तरह की डिग्री मुद्रा खर्च करके मिल जाती है। लेकिन नेताजी हैं कि अनेक प्रयासों, स्पीड ब्रेकरों को पार करके दसवीं पास कर शहर की एक अच्छी हैसियतवाली शख़्सीयत बनने में कामयाब हो गए और अब तो इनके मंत्री बन जाने के भी कयास समाचारपत्रों की सुर्खियाँ बन रहे हैं।

किसी ने सही कहा है कि पुरुष के भाग्य का कुछ पता नहीं। हमारे नेताजी मिट्टी के तेल के डिपो, राशन की दुकान, जूस की दुकान, ठंडे पानी की रेहड़ियाँ, स्कूल के बच्चों की बस से सफ़र तय करते हुए आज पेट्रोल पंप का जुगाड़ कर अच्छा–ख़ासा व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा कर चुके हैं और शायद वह दिन भी दूर नहीं जब शहर की बागडोर उनके हाथों में होगी। राजनीति उनके खून में रच–बस गई है। हमारे नेताजी अवसर कहते हैं, "किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान।"

अरे हाँ, दो–चार दिन से परेशान हैं। उनकी पार्टी के सम्मुख चुनाव आ गए हैं। आठ–दस हज़ार की भीड़ तो वे एक घंटे के अलटीमेटम में जुटा लेते हैं। अनशन, धरना, तोड़फोड़ आदि विभिन्न राजनीतिक तिकड़मों में वे मास्टर हैं। अच्छे–से–अच्छे आडू व्यक्ति को भी वे 'काणा' कर डालते हैं, अर्थात अपने पक्ष में राजी कर लेते हैं। दावतों के दौर का महत्व मैंने उन्हीं से जाना। वे कहते हैं कि इससे आदमी को 'काणा' करने, अर्थात पिघलाने में सहूलियत हो जाती है।
वैसे भी मित्रों के साथ समय–समय पर मिलकर संबंधों को ताज़ा कर लेना चाहिए अन्यथा संबंध कटी पतंग की तरह हाथ से निकल जाते हैं। अपने यार नेताजी से, समय–समय पर संबंधों को ताज़ा करता रहता हूँ, वैसे भी आजकल दिल्ली जैसे संवेदनाहीन शहर में दोस्त दोस्त-सा नजर नहीं आता। लगता यही है कि दोस्ती शब्द धीरे–धीरे काल का ग्रास बनने जा रहा है। दिल्ली शहर में दलाल संस्कृति की पकड़ ज़्यादा मज़बूत होती जा रही है। अपनापन ख़तम होता जा रहा है। यहाँ कोई किसी के अस्तित्व को सहज ही स्वीकार नहीं करता। यह मात्र आक्रामक शहर बनकर रह गया है। इस शहर में आपको भ्रमित व कोंचनेवाले ज़्यादा मिलेंगे, बनिस्पत मंज़िल तक पहुँचनेवालों के।
आज 12 बजे का समय लेकर मैं उनके पास पहुँचा तो देखा आँगन में पेड़ के नीचे बीस–पच्चीस कार्यकर्ता चाय सुड़क रहे हैं। कुछ पत्ते खेल रहे हैं, कुछ रसोई के जूठे बरतनों से जहाँ-तहाँ पसरे हैं। कमरे में घुसा तो पाया एक कार्यकर्ता गांधी जी की तसवीर साफ़ कर रहा है। अभिवादन की औपचारिकता पूरी होने के बाद मैंने अपने नेता को ग़मगीन पाया। ऐसा लगा जैसे किसी शोक सागर में डूबे हों। मैंने होठों पर हलकी मुसकान लाते हुए पूछा, ''यार आज गांधी जी की क्या ज़रूरत आन पड़ी।''

नौकर को कुछ ठंडा–वंडा लाने का आदेश देने के बाद बोले, "अरे यार, तुम तो जानते ही हो, एलेक्शन सिर पर हैं, हो सकता है इस बार टिकट मिल जाए, जुगाड़ जारी है और फिर इस फ़ोटो की भी ज़रूरत पड़ेगी।" मैंने थोड़ा हैरानगी जताते हुए कहा, "क्यों गांधी जी वोट देने आएँगे या तुम्हारी कैंपेनिंग करेंगे।" मैं चाहता था कि बात को थोड़ा खिलने का मौका मिले। थोड़ा-सा अन्यमनस्क होकर बोले, "हमारे यहाँ वोटर के अनेक वर्ग हैं। अलग-अलग जाति, अलग-अलग सोच है। एक वर्ग ऐसा है जो बुद्धि के आधिक्य से पीड़ित है। सुख से ऊबा यह वर्ग बक-झक बहुत करता है लेकिन वोटिंग के दिन यह किसी फार्म हाउस में पिकनिक मना रहा होता है या अप्पू घर में होगा, नहीं तो ड्राइंग रूम में टी.वी. के आगे पसरा होगा। एक दूसरा बबुआ वर्ग है, उसे जिसे वोट देना है, देना है, इसे पिघलाना आसान नहीं। एक तीसरा वर्ग है नालों के पास कुकुरमुत्ते की तरह झोपड़–पट्टी के रूप में उग आया है।

''पिछले कुछ सालों से इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इस वर्ग को हमें हाथ से निकलने नहीं देना।" इतने में नौकर पेप्सी, मिठाई और नमकीन ले आया।
मुझे लगा कि हमारे नेताजी तो बुद्धिजीवी हैं और वह दिन दूर नहीं जब चारे से कुख्याती प्राप्त लोगों को भी पीछे छोड़ जाएँगे। सिगरेट का कश लगाते हुए बोले, "भई राजनीति है और राजनीति में सब कुछ जायज़ है। झोंपड़–पट्टी में रहनेवाले वर्ग के बिना नव–अभिजात वर्ग का काम नहीं चल सकता। ड्राइवर, स्वीपर, घरेलू नौकर, रोज़मर्रा के जीवन-सहायक आदि जिसके बिना इन कोठीवालों का जीवन दूभर हो जाएगा। यह वह वर्ग है जो वोट बैंक हैं। इनसे वोट झटकना आसान नहीं। हाल के वर्षों में आई सूचना–क्रांति ने इसे भी होशियार कर दिया है। इस वर्ग से वोट झटकना इतना आसान नहीं रहा। पिछली बार (धीरे से) लाखों रुपए खर्च दिए दारू. . . मुरगा. . . पर बमुश्किल अपना उम्मीदवार जीत पाया। इस वर्ग के 40 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए।" 
मैंने समझा कि अब बातचीत का थोड़ा रुख बदलना चाहिए। मैंने कहा, "तुम्हारी पार्टी में लोकतंत्र नहीं है, ज़मीन से जुड़े नेताओं को कोई नहीं पूछता। ऊपर से अभिनेता, ब्यूरोक्रेट नेता के रूप में लाद दिए जाते हैं। अब तुम अपना उदाहरण क्यों नहीं लेते, कितने वर्षों से पार्टी की सेवा कर रहे हो? तुम्हें कभी टिकट मिली?" थोड़ा मुसकराते हुए नेताजी बोले, "लोकतंत्र कहीं नहीं है। लोकतांत्रिक राजतंत्र है। पार्टी की सेवा करने में ही मुझे सुख मिलता है। मैं तो कर्म में विश्वास करता हूँ, फल में नहीं। मेरी जो उपलब्धियाँ हैं, तुमसे तो कुछ छिपी नहीं, सब सेवा–निष्ठा से ही प्राप्त हुई हैं। पार्टी के लिए भीड़ इकठ्ठी करना, धरने पर बैठने के लिए आदमियों का जुगाड़ करना, बवेला करना, झंडे–परचे छपवाना आदि के द्वारा आज मैं सफल जनसेवक तक तो पहुँचा हूँ, वह इसी बल पर पहुँचा हूँ। आज मकान, प्लाट, राशन की दुकान, पेट्रोल पंप सब इसी की बदौलत हैं। मैं एक श्रमजीवी चींटी की तरह पार्टी–संगठन को मज़बूत करने में ही अपनी सफलता समझता हूँ। ईश्वर ने चाहा तो किसी दिन एक अच्छे मुकाम पर भी पहुँच जाऊँगा।"

मैंने समझा कि आज इस विषय को यहीं बंद कर देना चाहिए। विषयांतर करने के उद्देश्य से मैंने कहा ''आज घर पर बहुत भीड़ है...कार्यकर्ताओं की बहुत भीड़ है, कुछ धरना-वरना है क्या?" थोड़ा हताश स्वर में, ''पार्टी पर थोड़ा संकट है। पार्टी के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ कुछ बागी नेता सिर उठा रहे हैं और अध्यक्षजी ने इस्तीफ़ा दे दिया है।" "इस्तीफ़े से तो पार्टी और संकट में फँस जाएगी," मैंने कहा। "नहीं बात ऐसी है कि अभी इस्तीफ़ा दिया है, मीडिया से अब उनके इस्तीफ़े की पब्लिसिटी हो रही है। हमें आठ–दस दिन तक. . . एलेक्शन तक इस पब्लिसिटी को जारी रखना है। थोड़ा प्रदर्शन, थोड़ा अनबन कर पार्टी हित में उनकी अपरिहार्यता को मज़बूत बनाकर उनकी छवि निखारनी है। फिर वो अनशन पर बैठे कार्यकर्ता को जूस पिलाएँगे और साथ ही उनके इस्तीफ़े को वापस लेने की घोषणा हो जाएगी।''
''भई ये सब कुछ राजनीति में ज़रूरी है। विरोधी पार्टी के लोग हमारी एकता में सेंध लगाना चाहते हैं।"

मैंने सोचा कि अब राजनीति के विषय को छोड़ना चाहिए। बात बदलने के लिए मैंने पूछा, "बिटुआ की पढ़ाई कैसी चल रही है?" कुछ हर्ष के साथ, "सिद्धार्थ की पढ़ाई अच्छी चल रही है, जब से उसे दिल्ली से बाहर होस्टल में डाला है। मेरा सारा दिन तो राजनीति में निकल जाता था। उसे हवा लग गई थी नए ज़माने की। इस साल उसका रिज़ल्ट अच्छा आया है।" बात को जारी रखते हुए, "तुम्हें बस फ़ोन करने ही वाला था. . . तुम खुद आ गए. . . अच्छा किया. . . चलो लगे हाथों तुम्हें भी थोड़ा काम दे दिया जाए। हाँ, पार्टी के लिए दो-चार अच्छे नारे लिख दो और कुछ भाषण।"

इतने में एक कार्यकर्ता ने आकर कहा, "साब. . . समय हो गया।" जिज्ञासावश मैंने पूछा, "कहीं जाना है?" "हाँ, एक कार्ड आया है, एक कार्यकर्ता की बहन की शादी है। नज़दीक ही नाले पर बसी झोपड़–पट्टी में। जाना ज़रूरी है। एलेक्शन सिर पर है। तुम भी साथ चलो।" इनकार करना तो असंभव-सा था। शादी में गए और हमारे नेताजी की वहाँ पर आवभगत हुई। फूलों की माला पहनाई गई। नेताजी ने भाषण दिया, "अगली बार इस कॉलोनी को पक्का कर दिया जाएगा। पीने के पानी और बिजली की व्यवस्था कर दी जाएगी। एलेक्शन नज़दीक हैं और पार्टी को बहुमत से जिताए बिना यह सब मुश्किल है।" इसके पश्चात दूसरे कार्यकर्ता भी थूक बिलौने लगे। थोड़ी देर में नेताजी ऊँघने लगे। मैंने थोड़ा झिंझोड़ा। घड़ी में रात के 11 बज गए थे। मैंने नेताजी से पूछा, "तुम इस दिखावे से ऊबते नहीं।" थोड़ा कमर सीधी करते हुए, "ये जीवन की सच्चाई है, ये राजनीति की सच्चाई है। यह सब चलता है. . . और नया दिन शुरू हो जाता है।"