हास्य व्यंग्य

 

प से पोटो प से पोटा
- महेशचंद्र द्विवेदी


बड़ी पशोपेश और जद्दोजहद के बाद पोटो (प्रिवेंशन आफ टेररिज़्म और्डिनेंस) का बिल पार्लियामेंट में पेश कर पास करा लिया गया और वह पोटा (प्रिवेंशन ऑफ टेररिज़्म ऐक्ट) बन गया। पशोपेश सत्ताधारी पार्टियों में से कुछ का अंदरूनी मामला था परंतु जद्दोजहद उन पार्टियों के कारण पैदा हुई जो पोटो की पैदाइशी विरोधी हैं और उसे पार्लियामेंट में पास न होने देने के लिए नारा लगा रही थीं और प्रदर्शन कर रहीं थीं।

पब्लिक यह बात पचाने में परेशान थी कि कोई पार्टी पोटा का विरोध कर सकती है, जबकि सभी जानते हैं कि पार्टियों का प्रभुत्व उनके जनता को पोटाने की पटुता पर निर्भर करता है - जाति के नाम पर पटाओ, धर्म के नाम पर पटाओ, भाषा के नाम पर पटाओ, क्षेत्र के नाम पर पटाओ, दारू के नाम पर पटाओ, दौलत के नाम पर पटाओ, और फिर भी न पटे तो दादाओं के बल पर पटाओ। पर पब्लिक यह पहचान रही थी कि पोटा का विरोध वे पार्टियाँ ही कर रहीं थीं जो पिछले चुनाव में पब्लिक को पटाने में असफल होने के कारण पद नहीं प्राप्त कर सकीं थीं - जब पब्लिक उनके पोटने में नहीं आई तो वे पोटा में क्यों आएँ?

देखा गया है कि पर्फेक्ट पोलिटिशियन वही हो सकता है जो पोटने की प्रेक्टिस बचपन से करता रहा हो। पोलिटिक्स के पैदाइशी गुण होना ही इस प्रोफ़ेशन में प्रगति हेतु पर्याप्त नहीं हैं, वरन छोटे से ही बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। पेड़े खाने के लिए पैसे माँगने पर अगर पिता कह दे कि क्या पेट ख़राब करना है, तो जिन बच्चों में पोलिटिशियन बनने के जर्म होते हैं वे पटापट आँसू बहाकर माँ को पोट लेते हैं और उनके भी न पटने पर पिता की पैंट की पाकेट से पैसे पार कर देते हैं और फिर उनकी निगाह के पीछे प्रेम से पेड़े उड़ाते हैं।

प्राय: दूसरों की पत्नियों को पोटने की कला तो पोलिटिशियन्स का पहला गुण होता है, जैसे पोलिटिशियन अगर किसी कुसुम को पोटना चाहे तो उसके पति को कोई पद देकर उसकी पत्नी को पोटे जाने की राय प्राप्त कर लेता है, या किसी अन्य पोलिटिशियन को किसी अमिता को पोटना हो और उसका पति पोटने में न आ रहा हो तो पिस्टल से उसे परलोक प्रस्थान करवाकर पोटने की परेशानी उठाने का झंझट ही समाप्त कर देता है। पोलिटिशियंस के पोटने का खड़ा खेल फरक्काबादी तो तब देखने को मिलता है जब चुनाव में किसी एक पार्टी को गवर्नमेंट बनाने हेतु पर्याप्त सीट्स नहीं प्राप्त होतीं हैं - फिर प्रारंभ होता है दूसरी पार्टी के चुने सदस्यों को पोटने का असली खेल।

अब इस खेल में कौन कितना पाता है, अथवा कौन-सा पद प्राप्त कर पाता है, यह उसकी पटुता पर निर्भर करता है - परंतु वे दिन लद गए जब हमारे माननीय प्रतिनिधि लाख दो लाख में पट जाते थे, अब पच्चीस लाख के नीचे बात प्रारंभ ही नहीं होती है और प्राय: मंत्री पद प्रदान किए बिना पूर्ण नहीं होती है। इस प्रक्रिया से प्राय: माननीय मंत्री गणों की संख्या सेंचुरी के निकट पहुँच जाती है और तब इस देश की क्रिकेट प्रेमी जनता दिल थाम कर उस शाट की प्रतीक्षा करने लगती है, कि कब सेंचुरी पूरी हो।

पोटो पार्लियामेंट में पास होकर पोटा बन गया है और उसका प्रयोग भी प्रारंभ हो गया है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि पोटा का प्रथम प्रयोग पार्लियामेंट पर हमला करने वालों पर ही हुआ है। इसके अतिरिक्त उन प्रदेशों में भी इसका प्रयोग किया गया है जिनमें पुरुषों के स्थान पर महिला प्रमुख हैं - अब अगर बेलन उनके हाथ में दोगे तो पीठ पर पड़ेंगे ही। इन प्रदेशों की कई पोलिटिकल पार्टियाँ खुलकर पोटा-पीड़ितों के पक्ष में आ गई है। मेरी उनको नेक सलाह है कि दूसरे की पीठ बचाने से पहले अपनी पीठ पोढ़ी कर लें क्योंकि ऐसा पाया गया है कि पत्नी बेलन फेंकती पति पर हैं, वह पड़ता पड़ोसी पर है।