हास्य व्यंग्य

 

हक़ीम नुसर की खुसर-पुसर
- महेशचंद्र द्विवेदी


रेल में बैठकर ताक-झाँक करना मेरा शौक भी है और मेरी मजबूरी भी, शौक इसलिए कि मेरा बचपन ऐसे गाँव में बीता है जहाँ से रेलवे स्टेशन इतनी दूर था कि रेल देख पाने का तो सवाल ही नहीं था - हाँ, गर्मी की दोपहरी के सन्नाटे में कभी-कभी रेल की आवाज़ सुनाई पड़ जाने पर मैं अपने मकान की छत पर चढ़ जाता था और उसके सारे आसमाँ को घेर लेने वाले धुएँ की झलक पाकर मेरा मन बाग-बाग हो जाता था और मजबूरी इसलिए कि लगातार चुपचाप घंटों तक एक जगह पर बैठे रहना मेरी फ़ितरत और कुव्वत दोनों से बाहर की चीज़ है। आज साठ की उम्र पार करने के बाद भी मैं रेल के सफ़र के दौरान बीच-बीच में ए.सी.कोच में बाहर गैलरी में आकर दरवाज़ा खोलकर पीछे को भागते खेत-खलिहान और चाँद सितारे देखा करता हूँ - और कभी-कभी इतनी देर तक खड़ा रहता हूँ कि कोच अटेंडेंट मुझे शक की नज़र से देखने लगता है कि बूढ़ा कहीं किसी क्रॉनिक बीमारी से तंग आकर रेल से कूदकर जान देने की हिम्मत तो नहीं जुटा रहा है।

मेरा निजी ख़याल है कि जिसने रेल के सफ़र में गेट पर खड़े होकर तेज़ी से बदलते नज़ारों को नहीं देखा, उसने ज़िंदगी में तो बहुत कुछ खोया ही - साथ में टिकट के कीमती पैसे भी बरबाद किए। ये नज़ारे सिर्फ़ पेड़-पौधे, जंगल-पहाड़ के ही नहीं होते हैं बल्कि आदमी की ज़िंदगी की मजबूरियों, उसके दिमाग़ के फ़ितूरों, कारस्तानियों और करामातों के भी होते हैं। अब अगर आप रेलगाड़ी में सबेरे-सबेरे खिड़की पर खड़े होकर उगते सूरज की लालिमा पर फ़िदा हो रहे हैं और तभी किसी कस्बे का स्टेशन आने वाला होता है तो सामने किसी खेत में दस-ग्यारह आदमी एक साथ ऐसे फ़ारिग होते हुए दिखाई पड़ जाएँगे जैसे उनमें किसी को पता ही न हो कि उसी खेत में नौ-दस और लोग उसी नाजुक हालत में बैठे हुए हैं। मैं समझता हूँ कि इस मामले में औरतें ज़्यादा सामाजिक होतीं हैं क्योंकि वे इस सामूहिक काम के लिए रेल की पटरी के किनारे उगी झाड़ियों के पास एक दूसरे के ज़्यादा पास-पास बैठतीं हैं और उस वक्त उनके चेहरे को देखने से ऐसा लगता है कि वे रेलगाड़ी के आ जाने से रुक गई आपसी बातचीत फिर से शुरू कर देने के लिए सिर्फ़ रेलगाड़ी के गुज़र जाने का इंतज़ार कर रहीं हैं।

शहरों और कस्बों के किनारे के खेतों के अलावा वहाँ बने मकानों की दीवालों का मंज़र भी अपने में अनोखा होता है। इनका कितना कारगर, मुफ़ीद और दिलकश इस्तेमाल विज्ञापन एजेंसियों द्वारा किया जाता है इसको बिना दमड़ी ख़र्च किए, कम वक्त में, इत्मीनान से देखने-समझने का मौका मिलता है सिर्फ़ रेलगाड़ी की खिड़की पर खड़े होकर मुआइना करने पर। ये मकान अक्सर छुटभैय्यों के होते हैं जो न तो इनकी दीवालों पर प्लास्टर करवाने की हैसियत रखते हैं और न इन्हें रंगवाने पुतवाने की, इसलिए जब विज्ञापन की एजेंसियाँ इन पर बड़े-बड़े लाल नीले हरूफ़ों में 'दनादन दंतमंजन', 'अनासिन' की दर्दनिवारक गोलियाँ, बवासीर के शर्तिया इलाज, 'मुर्गा' छाप यूरिया खाद, 'चाँद' छाप बीड़ी या 'एस्कोर्टस' ट्रैक्टर का विज्ञापन पेंट करती हैं तो मकान मालिक सोचता है कि चलो मुफ़्त में दीवाल की खूबसूरती में चार-चाँद लग गए और विज्ञापन एजेंसियाँ सोचती हैं कि हींग लगी न फिटकरी और विज्ञापन का स्थान मिल गया चोखा। इसके अलावा मुझ जैसे रेलगाड़ी की खिड़की से नज़ारा देखने वालों को गंदी दीवालों की जगह दिलकश पेंटिंग तो देखने को मिलती ही है, साथ में इस मुल्क में उपलब्ध नए-नए प्रोडक्टस की जानकारी भी बिना कोई ज़हमत उठाए हासिल होती रहती है।

मैं जानता हूँ कि यह मेरा दिमाग़ी फ़ितूर ही होगा, पर मुझे लगता है कि विज्ञापन एजेंसियों को जैसे मुझसे खुसूसी उन्सियत रही है, क्योंकि वे मेरे बचपन से जवानी और फिर बुढ़ापे तक मेरी उम्र के हिसाब से दिलकश या फ़ायदेमंद विज्ञापन इन दीवालों में पेंट करते रहे हैं। मैं जब हाई स्कूल-इंटरमीडियेट में पढ़ने रेलवे लाइन के किनारे बसे एक कस्बे में पहुँचा, तो उन दिनों कस्बे के किनारे की दीवालों पर जेमिनी सर्कस, गुलाबबाई की नौटंकी, बीना राय की अनारकली, कैमिल इंक, जी-निब, बंदरछाप मंजन आदि के विज्ञापन अधिक दिखाई देते थे, जो मेरे जैसे गँवार लड़के को प्रभावित एवं आकर्षित करने के लिए पूरी तरह मौजूँ थे। फिर जब मैं यूनिवर्सिटी में पहुँचा और जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुका था तो जगह-जगह शादी के मतलब वाले 'रिश्ते ही रिश्ते - हर तरह की लड़की लड़के के लिए श्री अरोरा, 28, रैगरपुरा, दिल्ली से मिलें' विज्ञापनों ने रेलवे लाइन के किनारे की आधी से ज़्यादा दीवालों पर कब्ज़ा ज़मा लिया। हालाँकि मेरी शादी के लिए अरोरा साहब का सहारा मेरे माँ-बाप ने नहीं लिया, फिर भी उन दिनों रेल के सफ़र के दौरान ये विज्ञापन इतनी बार मेरे ज़हन में गुदगुदी पैदा कर जाते थे कि आज तक उनका एक-एक हरूफ़ और नुक्ता मुझे वैसा ही साफ़ साफ़ याद है जैसा मैं तब देखा करता था।

ख़ैर मेरी शादी हो गई और खुदा के करम से बिना किसी हारी-बीमारी के ठीकठाक चलने भी लगी, पर उन्हीं दिनों मुरादाबाद जिले के संभल, अमरोहा आदि कस्बों के कुछ ख़ानदानी हकीमों को पता नहीं क्या सूझी कि उन्हें हिंदुस्तान के सारे मर्दों में मर्दाना कमज़ोरी और गोनोरिहा, सिफलिस जैसी गुप्त बीमारियाँ नज़र आने लगीं और औरतों में बाँझपन नज़र आने लगा; मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इन हकीमों के इस ग्रेट न्यू आइडिया में मेरा कोई कंट्रीब्यूशन नहीं था क्योंकि मैंने अपने को कभी इस मामले में उन्हें दिखाया ही नहीं था। मैं तो इसे हिंदुस्तान में बल्क-मेडिकल-सर्विस हेतु हाईटेक आइडियाज़ की शुरुआत कहूँगा। अब चूँकि बीमार अनगिनत थे और इन सब को सेहत अता करना उन हकीमों का हकीमी फ़र्ज़ बनता था, इसलिए इन हकीमों ने अपने लड़के-दामाद, नाती-पोते, दोस्त-मुलाकाती, और ज़रूरत पड़ने पर कुत्ते-बिल्ली को भी हकीम बना दिया। बल्क-सर्विस में कामयाबी हासिल करने हेतु बल्क-प्रपोगंडा की ज़रूरत होना लाज़मी है, इसलिए हकीमों ने दिल्ली को मरकज़ बनाकर हर रेल-लाइन के किनारे पर बने मकानों की दीवालों का मुफ़्त-सौंदर्यीकरण अभियान चालू करवा दिया - पहले दौर में दिल्ली से बरेली और दिल्ली से आगरा तक के मकान लिए गए। शायद इसलिए कि आगरा और बरेली ग़ैर-मामूल-दिमाग़ के लोगों के पनाहगाह होने के लिए मशहूर हैं और हकीम लोग जानते थे कि ग़ैर-मामूल-दिमाग़ वाले लोग ही उनके बिछाए जाल में पहले फँसेंगे।

हमारे रूहानी इल्म की ऊँचाइयों वाले मुल्क में सेक्स जैसी दुनियावी चीज़ के बारे में बात करना बेअदबी, बत्तमीज़ी, बदसलूकी, बदइल्मी और बदगुमानी समझा जाता है, इसलिए लगभग सौ फ़ीसदी जवाँ लोग कभी न कभी इस शक में ज़रूर मुब्तिला होते हैं कि हो न हो उन्हें कोई गुप्त रोग है - और कुछ तो हमारे इन वैद्य-हकीमों की बदनियती की वजह से ताज़िंदगी इस शक को पाले रहते हैं। इन वजूहात से आगरा और बरेली वाले रूटों पर इन हक़ीम साहिबान की पौपुलैरिटी बढ़ने में वक्त नहीं लगा, और फिर उन्होंने बिना वक्त जाया किए दिल्ली-पटना, दिल्ली-अजमेर, दिल्ली-सहारनपुर, दिल्ली-भोपाल और दिल्ली-पठानकोट वाले रूटों को भी कवर कर लिया। इस जाल को बढ़ाने में उन ज़िलों का ख़ास ख़याल रखा गया जिनमें हक़ीमों के अपने मज़हब के लोग ज़्यादा तादाद में बसे हुए हैं, क्योंकि एक तो उनमें शिक्षा की कमी की वजह से गुप्त-रोगों का शक ज़्यादा होता है और दूसरे हमारे मुल्क के तमाम लोगों की तरह हक़ीम साहिबान भी 'चैरिटी बिगिन्स ऐट होम' की जगह 'ठगी बिगिन्स ऐट होम' में ज़्यादा यकीन रखते हैं।

आज आलम यह है कि खुदा-न-ख़ास्ता आप को कभी ग़मगीन माहौल में कहीं जाने के लिए रेलगाड़ी पर सफ़र करना पड़े और इस दौरान आप गुप्त रोगों के इन हकीमी विज्ञापनों को देखने से बचना चाहें, तो आप के पास एक ही रास्ता बचता है कि किसी सुनसान जंगल के आते ही रेलगाड़ी से छलाँग लगा दें। अगर आप लखनऊ से कानपुर होते हुए दिल्ली जाने वाला रूट पकड़ें तो इन विज्ञापनों में आप पाएँगे कि हकीम रहमानी अगर कानपुर में गुप्त रोगियों पर इतवार को नज़रे इनायत अता कर रहे हैं तो इटावा में सोमवार को, शिकोहाबाद में मंगल को, फ़िरोज़ाबाद में बुध को, अलीगढ़ में जुमेरात को, खुर्जा में जुमा को और गाज़ियाबाद में शनिचर को। अगर आप मुरादाबाद वाला रूट पकडें तो हक़ीम उस्मानी गुप्त रोगियों से इतवार को लखनऊ में, सोमवार को शाहजहाँपुर में, मंगल को बरेली में, बुध को रामपुर में, जुमेरात को मुरादाबाद में, जुमा को गजरौला में और शनिवार को हापुड़ में मिलने को बेकरार होंगे। इस तरह उत्तर और मध्य भारत के सभी शहर और कस्बों में हफ़्ते में कम से कम एक दिन हक़ीम रहमानी, उस्मानी, सुलेमानी, लुकमानी, नुसर, हुसर आदि में किसी न किसी की खुसर-पुसर सेवा आप को बिला नागा मिल जाएगी - यह बात अलग है कि यह सेवा पाकर आपका हशर न जाने क्या हो।

जहाँ गुड़ होता है वहाँ चींटे भी आते हैं - यह खुसर-पुसर धंधा दिन दूना-रात चौगुना बढ़ता देखकर अब तमाम नए खिलाड़ी भी इस मैदान में कूद पड़े हैं। इनमें से कइयों ने सोचा कि हक़ीमों से बाज़ी मारने का एक तरीका है अपने को डाक्टर डिक्लेयर कर देना और इन दिनों हक़ीम लुकमानी, किरमानी आदि के विज्ञापनों के अलावा गुप्त-रोगियों को डा.अरोरा, डा.खन्ना या लेडी डॉ. फातिमा मसीह जैसी 'मशहूर' हस्तियों से मिलने की सलाह भी पढ़ने को मिलती है। ये डाक्टर एम.बी.बी.एस (मियाँ बीवी बच्चे सहित) से लेकर आर.एम.पी(रजिस्टर्ड महापागल) तक कुछ भी हो सकते हैं। अब भई कोई गुप्त रोगी डा. साहब से उनकी डिग्री दिखाने की माँग करने की हिमाक़त तो करेगा नहीं और अगर कोई कर भी बैठे तो डिग्रियाँ तो भागलपुर में मूँगफली के भाव बिकतीं हैं।

अब चूँकि खुला ज़माना आ गया है, इसलिए रेल लाइन के किनारे की दीवालों पर ज़्यादातर विज्ञापन 'कामसूत्र', 'मस्ती', 'कोहिनूर' या 'घोड़ा छाप क्रीम' के होते हैं - मुझे लगता है कि विज्ञापन एजेंसियों ने मेरी उम्र का ख़याल करके ही अपने प्रोडक्टस में ज़रूरी तब्दीली की है।