हास्य व्यंग्य

लॉ एंड ऑर्डर
- महेशचंद्र द्विवेदी


प्रेसवाले ने एक पुलिस अधिकारी से पूछा,
"क्या ला ऐंड आर्डर दुरूस्त है?"
पुलिसवला झिझका, फिर बोला, "हाँ, फिफ्टी फिफ्टी।"
प्रेसवाले ने प्रतिप्रश्न किया, "क्या मतलब?"
पुलिसमैन ने प्रत्युत्तर दिया, "ला सुस्त है, आर्डर चुस्त है।"
प्रेसवाला चकित हो बोला, "दोनों शब्द तो बोले जाते एकमुश्त हैं?"
पुलिसवाला उसको नादान समझकर मुस्काया, फिर समझाया,
"हाँ, अंग्रेज़ी ज़माने में एकमुश्त थे - अब आज़ादी है, सो एक दूसरे से आज़ाद हो गए हैं।"
प्रेसवाला स्पष्ट अर्थ न समझा, फिर प्रश्न किया, "तो भी एक सुस्त और एक चुस्त कैसे?"
पुलिसवाले ने व्याख्या दी, "देश के नेताओं ने लॉ को अफ़ीम की लत लगा दी है - दिन रात खुमार में सोता है और जब जागता है तो लड़खड़ाते हुए चलता है। पर उन्होंने अपने आर्डर को सुपारी लेने जैसा बना दिया है,
''इधर सुपारी लो, उधर करो गर्दन खलास,
नहीं तो मत रखो कमाऊ पोस्टिंग की आस"

प्रेसवाले को लगा कि इस पर तो लंबी स्टोरी बन सकती है, इसलिए झिंझोड़ने के अंदाज़ में बोला,
"बात साफ़ नहीं हुई, ज़रा गुढ़ार्थ समझाइए।"
पुलिसवाला 'लुप्तप्राय' प्रजाति का संवेदनशील पुलिसमैन था, फूट पड़ा,
"लगता है आप ने किसी कारसाज़ दरोगा का इंटरव्यू नहीं लिया है, जो किसी को पकड़ते समय उससे कहता है कि पकड़ने हेतु ला की धारा तो हम फुर्सत में देखते हैं जब आदमी को सींखचों के अंदर डाल चुके होते हैं। आपका किसी सफल वकील से साबका नहीं पड़ा है, जो कहते हैं कि ला पढ़ने का क्या फ़ायदा, जब काम दलाली से ही होना है? आपने किसी अहलमद से डील नहीं किया है, जो कहता है कि खुश कर देने पर मैं अपराधियों की फ़ाइल तब तक गर्द में दबा सकता हूँ जब तक मु ई और गवाह दोनो अल्लाह के प्यारे न हो जाएँ?''
''हाँ, आर्डर आर्डर है - उसका पालन तो होना ही है,
चाहे कुसुम-सा कल्याणमय हो,
या मायामय सख़्त हो,
या फिर शिवमय मुलायम हो।''
हममें से अधिकतर जनसेवक आर्डर के पालन में लेशमात्र कोताही नहीं करते हैं -
आप बताएँ उस अधिकारी का नाम जिसने कालिदास-मार्ग पर प्राय: दिखाई पड़ने वाले कुसुम की राय को पूजा के पुष्प-सम सिरमाथे न लगाया हो और कल्याण-कोष की वृद्धि में अपना नाम न दर्ज़ कराया हो? सोचें कि सरकारी धन से बर्थडे मनाने और करोड़ों की बर्थडे गिफ्ट जुटाने के आदेश के पालन मे कौन-सा प्रशासक जी-जान से नहीं जुटा था? था ऐसा कोई अधिकारी जिसने आंबेडकर पार्कों के नाम पर ग़रीबों के खून-पसीने की कमाई से संचित राजकोष को उलीचने में कोताही की हो? और अकूत कमीशन खाया और खिलाया न हो? कितने थे पुलिस अधिकारी जिन्होंने सत्तर दिन में सत्तर प्रतिशत अपराध घटा देने के मायावी आदेश का पालन अपराधों के लिखे जाने पर रोक लगाकर न किया हो?

बताइए उस अधिकारी का नाम जिसने गत चुनाव में सत्तादल को जिताने के प्रयत्न में ढिलाई कर शासनादेश का उल्लंघन किया हो? या फिर शासनसंदेश के निष्ठापूर्वक अनुपालन में गुंडों को बूथ-कैप्चरिंग कराने में मदद न की हो? आदेश होने पर आजकल कौन पुलिस अधिकारी निर्दोष को बख़्शता है या अपराधी को पकड़ता है? आज राजा हमारे भैया हैं और डी.पी. की हमने बजा दी है पी.पी.। हम उस शासन के सेवक हैं जिसमें बाहुबलियों का है राज, फिर क्यों उनसे पंगा लेकर हम शासन को करें नाराज़? यही है फिफ्टी-फिफ्टी ला ऐंड आर्डर दुरुस्त होने का राज़।