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पहला विज़िटिंग कार्ड
- भारत भूषण तिवारी


कहीं पढ़ा था कि मनुष्य के जीवन में पहले प्यार का बड़ा महत्त्व होता है। पहला प्यार भुलाए नहीं भूलता, भले ही उसके बाद प्रेम करने में आपका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में क्यों न दर्ज़ हो जाए।
मगर प्रेम जैसी 'एब्सट्रेक्ट' चीज़ें हमारी बहस का मुद्दा नहीं हैं क्योंकि हम 'मटेरियल' में विश्वास रखते हैं। प्रेम `एबस्ट्रेक्ट' है मगर प्रेमिका 'मटेरियल'। प्रेमिका के संबंध में मेरा सामान्य ज्ञान सौंदर्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेनेवाली बालाओं के स्तर का है। हाँ, मगर मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि खुली अर्थव्यवस्था में 'एब्सट्रेक्ट' वस्तुएँ भी ब्रांडेड होनी चाहिए। सादे काग़ज़ पर या केवल मौखिक रूप से दिए गए बधाई संदेश दुर्भावनाग्रस्त होते हैं। शुभकामनाएँ केवल तभी असर करती हैं अगर वे किसी ग्रीटिंग कार्ड बनानेवाली मशहूर कंपनी के चमकीले काग़ज़ पर छपे लच्छेदार अंग्रेज़ी संदेश के रूप में भेजी गई हों। इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि भेजनेवाला और पानेवाला दोनों उसका मतलब न समझ पाएँ।

ख़ैर जो भी हो आज मेरे जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि मैंने आज अपनी पहचान पा ली है। कंपीटीशन के ज़माने में ज़रूरी है कि आपकी कोई निश्चित पहचान हो। कुछ तो ऐसा हो जिसके बल पर आप ठसके से कह सकें कि यह मेरी पहचान है।
किसी के यह कह देने से कि खचाखच भरी बस में भी वह अपने हाथ पाँव सिकोड़े रखता है या इंटरनेट पर केवल ज्ञानवर्धक साइटें देखता है यह कैसे मान लिया जाए कि उसका चरित्र अच्छा है। भई. . .कैरेक्टर सर्टिफिकेट भी कोई चीज़ है। अरे वो ग़रीब ही कैसा जिसके पास बी. पी. एल. (टी वी नहीं सर्टिफिकेट) ही न हो। संभव है कि वह खुले आसमान के नीचे सोता हो और यह भी हो सकता है कि किसी मशहूर समाचार पत्रिका में भुखमरी पर छपी रिपोर्ट में उसकी रंगीन तस्वीर छपी हो। यह बातें किसी को ग़रीब मान लेने हेतु पर्याप्त तो नहीं।

ज़माना 'स्टैंडर्ड्स एंड प्रोसेसेज़' का है। हर जगह बारीकी से ध्यान रखा जाता है कि नियत मापदंडों एवं प्रक्रियाओं का पालन किया गया है या नहीं। मेरा एक इंजीनियर मित्र कहता है कि अब 'आइ एस ओ 9000' की कोई पूछ नहीं रही अब तो 'आइ एस ओ 14000' का ज़माना है। सॉफ्टवेअर में भी 'सी. एम. एम. लेवल 5' की जगह 'सी. एम. एम. लेवल आइ' ने ले ली है।
मुझे लगता है कि भविष्य में सभी चीज़ों के लिए 'स्टैंडंर्डस एंड प्रोसेसेज़' निर्धारित कर दी जाएँगी। अगर आपको दंगे करवाने हैं तो ''9000 ''चुनें या ''14000''। रिश्वतखोरी, बलात्कार, दलबदल, बूथ कैप्चरिंग के लिए लेवल फोर या लेवल फ़ाइव, जैसा आप चाहें। मुझे पूरा विश्वास है कि प्रत्येक चीज़ का 'स्टैंडर्डाइज़ेशन' हो जाएगा।

ख़ैर, बात चल रही थी पहचान की। आज जब कंपनी के फैसिलिटी अफ़सर के करकमलों से प्लास्टिक की चौकोर डिबिया ली तो दिल बल्लियों उछलने लगा। काँपते हुए हाथों से डिबिया खोली। खोलते ही नज़र पड़ी नीली स्याही से छपे मेरे नाम के सुंदर अक्षरों पर। स्वयं के छपे हुए नाम को निहारने से प्राप्त आनंद अवर्णनीय है और अगर नाम अंग्रेज़ी में हुआ तो सोने पर सुहागा। उस मनोहारी काग़ज़ के टुकड़े को निहारते हुए मेरी तो जैसे समाधि लग गई। प्राचीनकाल में विज़िटिंग कार्ड या कहें छपाई का आविष्कार हो गया होता तो ऋषि मुनि प्राणायाम और ध्यान साधना में समय नष्ट न करते। निश्चित ही वे अपना विज़िटिंग कार्ड सामने रखकर त्राटक करते।

छात्र अवस्था से ही अपना नाम छपवाने हेतु मैं काफ़ी क्रियाशील रहा हूँ। सातवीं कक्षा में था तब एक समाचारपत्र की रविवारीय कथा पहेली का उत्तर भेजा था। उस समय पहली बार मेरा नाम छपे हुए रूप में अवतरित हुआ था। तब प्रथमतः मैंने इस स्वर्गीय सुख का आनंद लिया था। उस कतरन को मैंने आज तक संभालकर रखा है। सोचता हूँ अपने बच्चों को दिखाकर कहूँगा कि देखो त़ुम्हारा बाप कितना प्रतिभाशाली था। पर समस्या यह है कि उस कतरन में मेरे अलावा कुछ पाँच-छः सौ नाम और हैं। चाहता तो मैं भी था कि बाकी के नामों से अलग अपना नाम कटवा कर रख लूँ। लेकिन अख़बार वालों ने कुछ ऐसी जगह नाम छापा है कि यह बड़ा ही मुश्किल कार्य है।
उसके बाद भी मेरा नाम एक दो मौकों पर 'संपादक के नाम' कॉलम में आया है और मैंने हर कतरन बड़े करीने से सँभालकर रखी है। अब भी जब कभी मन करता है अलमारी से निकालकर एक नज़र डाल लिया करता हूँ। दिल को बड़ा सुकून-सा मिलता है। पर आज अपना विज़िटिंग कार्ड देखकर असीम संतुष्टि का अनुभव हो रहा है।

बहुत समय हो गया था बटुए में दूसरों के विज़िटिंग कार्ड ढोते-ढोते। बेरोज़गारी के दिनों में जिस किसी नए व्यक्ति से मिलता वह दो-चार बातों में ही झट अपना विज़िटिंग कार्ड आगे कर देता। मैं मन मसोसकर ले लेता क्योंकि मेरे पास देने के लिए था ही क्या? मगर अब खेल बराबरी का हो गया है। अब 'गिव एंड टेक रिलेशनशिप' है। मैं विज़िटिंग कार्ड लेनेवालों की श्रेणी से देनेवालों की श्रेणी में आ गया हूँ।

पुरानी अर्थव्यवस्था में जो महत्व राशन कार्ड को प्राप्त था वह इस अर्थव्यवस्था में विज़िटिंग कार्ड को प्राप्त हो गया है। यह छोटा-सा काग़ज़ का टुकड़ा कितना शक्तिशाली है। स्वयं के विज्ञापन का इससे अच्छा माध्यम क्या हो सकता है। नाम भी कितना सुंदर है। अहा विज़िटिंग कार्ड। मैं सोचने लगता हूँ कि इसका हिंदी अनुवाद क्या हो सकता है। 'भेंटपत्र' नहीं। विज़िटिंग कार्ड शब्द में जो माधुर्य है वह भेंटपत्र में आ ही नहीं सकता। फिर भी मैं इस किस्म की बेवकूफ़ियाँ करता रहता हूँ।

मुझे यकीन है कि विप्र सुदामा अगर इस युग में पैदा हुए होते तो निश्चित ही अपना विज़िटिंग कार्ड लेकर द्वारकापुरी जाते और उन्हें द्वारपालों के उपहास का पात्र न बनना पड़ता। प्रभु रामचंद्र हनुमान जी के हाथों सीता मैया के लिए मुद्रिका नहीं अपना विज़िटिंग कार्ड भिजवाते।
वह दिन दूर नहीं जब भिखारी भी भीख लेते ही अपना विज़िटिंग कार्ड थमा दिया करेंगे। चोर उचक्के तो पहले ही अपने विज़िटिंग कार्ड छपवा चुके हैं। और तो और जीव जंतु भी विज़िटिंग कार्ड रखने लगेंगे। कुत्ता काटते ही अपना विज़िटिंग कार्ड बढ़ा दिया करेगा 'सेवा का एक और अवसर प्रदान करें।'

विज़िटिंग कार्ड पाने के बाद मुझे मोक्ष की प्राप्ति का अनुभव हो रहा है। मगर नहीं, यह मोक्ष नहीं है। मोक्ष के भी अलग-अलग लेबल होते हैं। दूसरों के विज़िटिंग कार्ड पर कम से कम चार टेलिफ़ोन नंबर तीन मोबाइल नंबर दो फैक्स नंबर और एकाध ईमेल एड्रेस तो होते ही हैं। मोक्ष की यह थोड़ी ऊँची अवस्था है। थोड़ी और ऊँची अवस्था में नाम के साथ डिग्रियाँ भी जुड़ी होती हैं और उससे भी ऊँची अनस्था में वेबसाइट या होमपेज का पता होता है।

हाय! मेरा मोक्ष तो बहुत निचले स्तर का है। हे प्रभु मुझे मोक्ष की सबसे ऊँची अवस्था तक पहुँचने में समर्थ बना।

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