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हास्य व्यंग्य

 

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हमारी साहित्य गोष्ठियाँ
—विजय ठाकुर


हाल ही में दिल्ली में मिलिनियम पार्क में हुई गोष्ठी में हुई एक साहित्य गोष्ठी में किसी कवि महोदय का धूप का चश्मा उड़ा दिया गया। हो सकता है कि उन्होंने खुद ही उसे कहीं छोड़ दिया हो। बात जो भी हो, बकौल उनके जहाँ इतने (सभ्य) कवियों की गोष्ठी हो रही हो वहाँ ऐसी घटना का होना बहुत अफ़सोस और शर्म की बात है। उन्होंने बकायदा पत्र लिखकर सबसे कहा है कि अगर चोर चश्मा लौटा दे, तो चोर जो भी हो उनका नाम गुप्त रखा जाएगा। भई चोर का नाम तो पहले से ही गुप्त है वो आपको क्यों बताने लगा। मैं तो कहूँगा कि कवि महोदय ठंड रखें, और जनाब चश्मा ही तो खोया है आपने, कोई दुनिया नहीं लुट गई आपकी।

बात इस गोष्ठी के बहाने निकली है तो हम अपने ज़माने की गोष्ठियों के बारे में बता दें। जब हम दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हुआ करते थे, उन दिनों वहाँ कवि सम्मेलनों का काफ़ी ज़ोर हुआ करता था। आजकल सुना है एकआध ख़ास मौकों पर ही ऐसा होता है। हाँ तो इन्हीं सम्मेलनों को सुन-सुनकर हम दो चार युवाओं ने, जो उस ज़माने से ही खुद को बड़े कवि मान बैठे थे लेकिन श्रोताओं की कमी से बुरी तरह परेशान रहा करते थे, कहा यार कुछ करना चाहिए हमारी अपनी मासिक गोष्ठी होनी चाहिए जिसमें हमलोग एक दूसरे की कविताएँ सुनेंगे तथा उसकी आलोचना करेंगे। प्रस्ताव का रखा जाना था कि हाथों हाथ लपक लिया गया। तय हुआ कि मासिक नहीं हम माह में दो बार मिला करेंगे और गोष्ठी अंत में हफ़्तेवार होना तय हुआ।

हमारे बीच के एक कवि सुधांशु जी थे जो छात्रावास में बराबर हूट कर दिए जाते थे। एक बार इन्होंने एक कविता पढ़ी 'मेरी कलम को तेरी कलम से प्यार हो गया', इसके बाद उन्हें कभी कविताई का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने इसका आयोजन अपने ज़िम्मे लिया। बड़े खीझे हुए थे बोले, 'यार बड़ी नासमझ जनता है हमारे छात्रावास में किसी को कविता की कोई समझ ही नहीं। रस की पहचान नहीं है। उनको ढाँढस बँधाया एक दूसरे जाँबाज़ कवि मोहम्मद अशफ़ाक "देशप्रेमी" ने। उनकी तारीफ़ यही है कि बिल्कुल लंबे चौड़े डील डौल के मालिक थे, बाहों की मछलियाँ कुर्ते की बहियाँ फाड़कर बाहर झाँका करती थी, आजमगढ़ की धरती की पैदाइश। इन जनाब को हूट करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। ये जब भी छात्रावास के कॉमन रूम में बैठकर अपनी वतनपरस्ती के कलाम पढ़ने शुरू करते थे तो बस पूछिए मत इनकी आँखें और फड़कती भुजाएँ देखकर ही सब भारत माता की जय करने लगते थे। गोष्ठी के लिए तीसरे कवि का भी जुगाड़ हो ही गया। वो तो बल्कि आते ही नहीं थे बड़ी ही शर्मीली फ़ितरत पाई थी इन्होंने। लेकिन देशप्रेमी की तरह उपनाम का पुछल्ला इन्होंने भी लगा रखा था। अपने अच्छे ख़ासे नाम रविशेखर वर्मा से इन्हें सख़्त चिढ़ थी। इनका मानना था कि सबसे पहले कवि का नाम ज़बर्दस्त होना चाहिए ऐसा कि लोग नाम सुनते ही दाद देना शुरू कर दें। इन्होंने अपना नाम रखा था भ्रमरमणि 'रसिक' वैसे लोग इन्हें कविचूड़ामणि कहा करते थे। अब आप नाम से ही समझ गए होंगे कि प्रेमी प्रजाति के कवि थे, प्रेम रस से पगी इनकी कविताएँ हुआ करती थीं और चौथा बचा मैं तो भाई अपनी तारीफ़ मैं खुद नहीं करूँगा। तीन दिग्गजों के बारे में बता ही चुका हूँ अब कुछ तो अंदाज़ा आप लगा ही सकते हैं।

हमारे सुधांशु जी के कमरे में महफ़िल सजनी शुरू हुई। विशाल काया वाले देशप्रेमी जी के प्रताप से छात्रावास के मेस से कुछ नमकीन और चाय नियत समय पर पहुँचने लगे। लेकिन तीन ही गोष्ठियों में रसिक जी विद्रोह कर बैठे उनका मानना था कि शेरो शायरी और कविता के लिए माहौल अच्छा होना चाहिए और सुधांशु जी के गंधाते से कमरे में अब और नहीं मिला जा सकता। इस चक्कर में चौथी गोष्ठी मुल्तवी हो गई। सुधांशु जी बड़े चिंतित हुए, होते हवाते तय हुआ कि अगली बार से कुदसिया पार्क में महफ़िल सजा करेगी। बाद में पता चला असली विद्रोह की वजह थी रसिक जी की लड़की दोस्त मेरा मतलब है गर्ल फ्रेंड। उनकी ये मित्राणी भी महफ़िल में शामिल होना चाहती थीं और रसिक जी छात्रावास के पवित्र चालचलन की वजह से कोई जोखिम उठाने के तैयार न थे। अब शिल्पा जी यानी की हमारे रसिक जी के लड़की दोस्त के बारे में किसी ने शिगूफा छोड़ दिया कि मोहतरमा बहुत पहुँची हुई कवयित्री हैं, हालाँकि ये बात सही थी कि इन स्वनामधन्य कवियों में उनका ग्राफ़ सबसे उपर था, दो एक पत्रिका में कुछ छपाई भी हो गई थी। बात जैसे ही फैली कि गोष्ठी में एक कवयित्री भी आती हैं तो न केवल सदस्य कवियों की संख्या दूनी हो गई बल्कि कुछ विशुद्ध श्रोताओं का भी जमघट होने लगा।

गोष्ठी में कई चीज़ें बड़े मार्के की हुआ करती। कुछेक चीज़ें मैं आपको बता दूँ, पहले दो तीन गोष्ठी में यह हुआ कि देशप्रेमी जी ही छाए रहे। उनका कविता पाठ शुरू होता तो रुकने का नाम ही नहीं लेता। खाँसने खखारने के बावजूद उनके भेजे में यह कभी नहीं आता कि भैया अब बहुत हो गया और ऐसी काया देखकर सीधे-सीधे बोलने का जोखिम कोई नहीं उठा सकता था। इसका समाधान बाद में निकाला गया कि देशप्रेमी जी की बारी सबसे अंत में रखी जाने लगी और जबतक वे दूसरा कलाम शुरू करते लोगों का खिसकना शुरू हो जाता। एक बार मुझे किसी रिश्तेदार से एक अस्पताल में मिलना था, मैं इसी जुगत में था कि अब निकला जाए, देशप्रेमी जी अड़ गए, मैंने सोचा इससे अच्छा कि कोई पहुँचा वगैरह पकड़े भलाई इसी में है कि रिश्तेदार से कल मिल लिया जाए।

नए आए कवियों में से एक कवि रामलोचन साहू 'क्षुब्ध' थे। गोष्ठी में इनकी गणना घोर प्रगतिवादी कवियों में से होती थी। व्यवस्था से क्षुब्ध होकर उन्होंने अपना ये उपनाम चुना था। उन्होंने दिल्ली में सबसे प्रचलित एक गाली जो आम तौर पर बस कंडक्टरों या रिक्शेवालों से लेकर बड़े-बड़े लोगों के मुख को अक्सर शोभायमान करती है उसका प्रयोग अपनी एक कविता में जमकर किया था, उनका मानना था कि कविता में आम जीवन और लोकभाषा की झलक होनी चाहिए। उन्होंने कुछ ज़्यादा ही छूट ले ली। कविता पाठ करते समय उन्होंने पाँचवी बार ही उस सुंदर पद का इस्तेमाल किया होगा कि श्रोतागण में से एक ने उनकी जमकर पिटाई कर दी। शिल्पा जी को इंप्रेस करने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था। वो तो अच्छा हुआ पुलिस का मामला बनते-बनते बचा।

एक दूसरे कवि किसी जगराता मंडली के सदस्य थे, पहले तो अकेले आकर माता के भजन सुनाया करते बाद में उनकी मंडली के और भी सदस्य आने लगे। दो तीन हफ़्ते उनकी इतनी दहशत रही कि उनसे छुटकारा पाने के उपाय सोचे जाने लगे और अंत में उनको बिना बताए हमें दो हफ़्ते लगातार उस पार्क में न जाकर तीस हज़ारी के पास वाले पार्क में जाना पड़ा।

गोष्ठी के बाद बस अड्डे में कुछ चाय वाय हुआ करती, चाय वाले ने जल्दी ही बड़ा बेदर्द होकर हमसे मुँह फेर लिया (बाद में हमने नया मुर्गा फाँसा), बात होती यह थी कि एक तो हम उसे इस हफ़्ते के पैसे उस हफ़्ते दिया करते, दूसरे हम एक ही चाय के तीन-तीन और कभी-कभी छ:-छ: हिस्से करवाते, ऐसे में वो हमें खिसियाकर एक गिलास चाय और पाँच खाली गिलास दे दिया करता और कहता, "बाउजी खुदहिं बाँट लियो।"

बाद में धीरे-धीरे लोगों की नौकरी वगैरह लगनी शुरू हुई या नहीं लगी तो तलाश शुरू हुई और लोग एक-एक कर खिसकने लगे। शिल्पा जी की शादी हो गई (दुर्भाग्यवश रसिक जी से न होकर किसी और से) तो गोष्ठी का आकर्षण ही जाता रहा और गोष्ठी वीरगति को प्राप्त हुई।

अरे हाँ बात चोरी से शुरू हुई थी, तो अंत भी उसी से करता चलूँ। चोरी हमारी गोष्ठी में भी हुआ करती थी लेकिन ये तो बिल्कुल अनोखी चोरी थी, हमारी गोष्ठी में से शिल्पा जी का रूमाल अमूमन हर हफ़्ते ग़ायब हो जाता। पहले कुछेक हफ़्ते उन्होंने कुछ भला बुरा भी कहा लेकिन धीरे-धीरे शायद 'अनुकूलित' हो गईं। बाद में इन्हीं कवियों में से एक के घर मैंने लगभग नौ रूमाल बड़े जतन से रखे हुए देखे, रूमाल किसके थे यह बात बताने की ज़रूरत नहीं। जनाब शिल्पा जी से तो कभी कुछ नहीं कह पाए लेकिन आज भी उन्हीं रूमालों के हर रेशे को बड़ी शिद्दत से महसूस किया करते हैं और मुझे याद आती है वे गोष्ठियाँ।

1 अप्रैल 2005  

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