हास्य व्यंग्य

जिसे मुर्दा पीटे उसे कौन बचाए
—महेशचंद्र द्विवेदी


इस मसले पर लंबी बहस की जा सकती है कि पिटना एक आर्ट है या एक साइंस। हमारे सूबे के तालिबइल्मों का इस ओर बढ़ता रुझान देखकर मेरा मानना है कि कम से कम मौजूदा सरकार को 'पिटाई' सब्जेक्ट को पढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश की सभी युनिवर्सिटीज़ में एक डिपार्टमेंट खोल देना चाहिए।

यह ज़रूर है कि इस नए सब्जेक्ट को अपने यहाँ रखे जाने के लिए शुरू में आर्टस फ़ैकल्टी और साइंस फैकल्टी के डीन में मुड़फुटौअल होगी, पर उनकी इस मुड़फुटौअल का नतीजा ही यह मसला सही ढंग से हल कर पाएगा कि यह एक आर्ट है या साइंस। जहाँ तक पीटने का सवाल है, इस बात पर शायद ही कोई बहस करे कि पीटना एक ऐसा हुनर है, जिसमें महारत पाने के लिए अपने को मज़बूत और मोटी खाल का बनाना पड़ता है।

इससे सब सहमत होंगे कि पिटना कई तरह का होता है। जैसे माँ से पिटकर गाल लाल करवा लेना, गुंडे से पिटकर हाथ पैर तुड़वा लेना, हमदर्दी के वोट हासिल करने के लिए चुनाव से पहले अपने चमचों से पिटकर टिंक्चर के रंग की पट्टियाँ बदन पर लपेट लेना, चुनाव में पिटकर खिलाफ़ पार्टी पर बूथ-कैप्चरिंग की तोहमत लगाने लगना, 'होनहार' किस्म के तालिबइल्मों से पिटकर और सरकार के तालिबइल्मों से हिकमतअमली से निबटने की नसीहत सुनकर मुदर्रिस का मुँह छिपाए-छिपाए घूमना, पुलिस से पिटकर हिरासत में लिए गए बशर का झूठा-सच इकबाले-जुर्म कर लेना, और मरीज़ों से पिटकर डाक्टरों द्वारा हड़ताल पर चले जाना, वगैरह, वगैरह।

हालाँकि हर पेशे के इंसान की पिटाई के अपने अलग तरीके और सलीके होते है, लेकिन डाक्टरों की पिटाई के एक से ज़्यादा वजूहात और तरीके पाए गए हैं। मैंने अपनी पुलिस की नौकरी के दौरान इनकी अफ़सोसनाक और पुरलुत्फ़ दोनों किस्म की पिटाई देखी है। डाक्टरों का पेशा ऐसा है कि नर्सों से उनका चोली दामन का साथ रहता है। अब अगर दामन दामन की जगह रहे और चोली चोली की जगह, तब तो ठीक है, लेकिन इंसान की फ़ितरत ऐसी है कि कभी-कभी दामन अपनी जगह से उठकर चोली तक पहुँच जाता है। एक जिले में मेरी तैनाती के दौरान ऐसे ही एक नाज़ुक मौके पर एक ख़ूबसूरत-सी नर्स ने एक डाक्टर साहब की अपनी पुरानी चप्पल से पिटाई कर दी थी। मुझे लगता है कि डाक्टर साहब को उन नाज़ुक हाथों से पीटे जाने पर कोई ख़ास अफ़सोस नहीं था और शायद वह उस दौरान मन ही मन मजनू बन जाने का मज़ा भी ले रहे थे, क्योंकि बिना कुछ बोले, बिना शोर मचाए, और बिना कोई बवाल किए वह चुपचाप वहाँ से खिसक लिए थे। पर गाज गिरे इश्क के दुश्मनों पर कि तभी उन्होंने पाया कि एक वार्ड ब्वाय ने वह पुरलुत्फ़ नज़ारा देख लिया। तब वह अकड़कर खड़े हो गए थे ओर बोले थे, 'यह नर्स बड़ी बददिमाग़ हो गई है। अगर इसको डिसमिस न करा दिया तो मेरा नाम 'पिटे डाक्टर' नहीं। फिर उन्होंने सी. एम. ओ. के नाम एक शिकायती ख़त लिखा था जिसमें उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि नर्स ने उन्हें पुरानी चप्पल से मारा- उन्होंने 'पुरानी' लफ़्ज़ को ख़ास तौर से लाल रौशनाई से लिखा था।

जब मैं बरेली में एस. एस, पी. था तो एक सुबह टेलीफ़ोन आया कि सरकारी अस्पताल के एक डाक्टर साहब को एम. एल. ए. साहब और उनके चमचे अस्पताल में पीट रहे हैं। हालाँकि आजकल हर सरकार एम. एल. ए. साहब, उनके गनर और चमचों का यह पैदाइशी हक मानती है कि कभी-कभी सरकारी कर्मचारियों की ठुकाई करते रहें, लेकिन आज से तीस साल पहले की सरकारों में इतनी ज़्यादा समझदारी नहीं आई थी। इसलिए मैंने हिम्मत जुटाकर पुलिस भेज दी और एम. एल. ए. साहब और उनके साथियों को गिरफ़्तार करवा दिया। उस दिन डाक्टर साहब की इतनी 'ख़ुशनुमा' बोहनी करने का सबब पूछने पर एम. एल. ए. साहब ने पुलिसवालों को शेर की निगाह से घूरते हुए बताया, 'मैंने अपने पैड़ पर दस बारह दवाओं के नाम व तादाद लिखकर अपने आदमी को डाक्टर साहब के पास भेजा था कि जाकर दवाएँ ले आओ। मेरा पैड़ देखने के बावजूद गुस्ताख़ डाक्टर ने यह कहते हुए दवाएँ देने से मना कर दिया, 'एम. एल. ए. साहब आ जाएँ, मैं उनकी सेहत का मुआइना करने के बाद ही दवा दूँगा।'

दूसरे दिन मुझ जैसे कूढ़मगज़ की समझ में भी आ गया था कि डाक्टर ने एम. एल. ए. के पैड़ पर लिखीं दवाएँ न देकर और मैंने उनकी गिरफ्तारी कराकर एम. एल. ए. साहब की शान में कुछ न कुछ गुस्ताख़ी तो ज़रूर कर दी थी, क्योंकि एम. एल. ए. साहब की गिरफ्तारी को उनकी बेइज़्ज़ती बताकर असेंबली में सवाल उठा दिया गया था और मुझे जवाब के साथ फ़ौरन से पेश्तर लखनऊ में हाज़िर होने का हुक्म मिला था। लखनऊ में मंत्री जी ने मेरी बात से पूरी तरह नाइत्तफ़ाकी तो नहीं जताई, ताहम इतना ज़रूर कहा कि मैंने गिरफ्तारी कराने में जल्दबाज़ी कर दी थी। तब मेरे मसख़रे मन मे ख़याल आया था कि शायद मंत्री जी का मतलब था कि उनसे पूछकर एम. एल. ए. की गिरफ्तारी होनी चाहिए थी जिससे इस बीच डाक्टर साहब की खूब धुनाई हो चुकती। ख़ैर जो भी हो, मैं मंत्री जी का शुक्रगुज़ार हूँ कि उसके बाद मामला मंत्री जी ने संभाल लिया था।

आजकल के पुलिस अफ़सर इस वाकये के बारे में बताने पर यह जानकर हैरान रह जाते हैं कि एम. एल. ए. की गिरफ्तारी के बाद न तो मेरा मुअत्तिली का आर्डर आया और न तबादले का। वैसे आजकल ऐसा वाकया हो ही नहीं सकता है क्योंकि आजकल के 'होशियार' डाक्टर ऐसा मौका आने ही नहीं देते हैं कि एम. एल. ए. साहब को दवाओं की पर्ची लिखकर भेजने की तकलीफ़ उठानी पड़े- वे उनके ख़ुद के, उनके बाल-बच्चों के, उनके दोस्तों और चमचों के, उनके दोस्तों और चमचों के दोस्तों और चमचों के असली और ख़्वाबी मर्ज़ों की पूरी लिस्ट जेब में रखते हैं और महीनों की दवाई एडवांस मे मुहैया कराते रहते हैं और अगर किसी नवसिखिये डाक्टर की बचकाना हरकत से ऐसा मौका आ भी जाए, तो पुलिस वाले एम. एल. ए. साहब के बजाए डाक्टर को बदअमनी फैलाने के जुर्म में बंद कर देना ज़्यादा महफ़ूज़ समझते हैं।

फिर जब मैं एस. एस. पी. लखनऊ था, तो एक दिन कंट्रोल रूम से फ़ोन आया कि मेडिकल कालेज के सभी ज्युनियर डाक्टर हड़ताल पर चले गए हैं और तोड़-फोड़ पर आमादा हैं। मेडिकल कालेज पहुँचा तो ज्युनियर डाक्टरों को सचमुच तैश में पाया- उनका तैश ख़ास तौर से अपने सीनियरों के खिलाफ़ था। उनका कहना था, 'वार्ड में एक मरीज़ की मौत हो जाने पर उसके साथियों ने डयूटी पर मौजूद ज्युनियर डाक्टर की पिटाई कर दी है- बेचारा ज्युनियर डाक्टर क्या करता, उसे जितना आता था उसने किया? सीनियर डाक्टर प्राइवेट प्रेक्टिस में इतने मसरूफ़ रहते हैं कि वार्ड के मरीज़ों पर तवज्जो ही नहीं देते हैं।' उस वक्त उनकी हिफ़ाज़त का बंदोबस्त करने की झूठी-सच्ची तसल्ली देकर मैंने मामला निबटा दिया था, लेकिन बाद में हुआ यह कि मेडिकल कालेज मे पुलिस का बेहतर इंतज़ाम हो जाने से सीनियर डाक्टर और बेफ़िक्री से प्रायवेट प्रेक्टिस में मुब्तिला हो गए और ज्युनियर डाक्टरों से अपनी हिफ़ाज़त का बहाना लेकर ख़ुद के साथ पुलिस लगाने की माँग करने लगे।

पर डाक्टरों की पिटाई के ये सब तो हिंदुस्तानी वाकये हैं- दूसरे तमाम मसायल की तरह इस मसले में भी फिरंगियों का स्टाइल कुछ अपना ही है। कुछ दिन पहले का रोमानिया का वाकया तो जितना पुरलुत्फ़ है उतना ही हैरतअंगेज़ भी। हुआ यों कि एक दिन एक मरीज़, जो दिल की बीमारी की वजह से एक अस्पताल में भर्ती था, का दिल धड़कना बंद हो गया और डाक्टरों की लाख कोशिशों के बावजूद उसमें हरकत न हुई। नाउम्मीद होकर डाक्टरों ने उस मरीज़ को मरा कहकर तब तक के लिए मुर्दाघर में भेज दिया, जब तक घरवाले उसे दफ़नाने का इंतज़ाम न कर लें। कुछ घंटे बाद एक डाक्टर साहब किसी काम से मुर्दाघर में गए, तो यह देखकर हैरान रह गए कि एक मुर्दा के हाथ में कुछ हरकत हो रही थी। वह उसका मुआइना करने जैसे ही उस पर झुके, उस मुर्दे ने उसी हाथ से उनके मुँह पर ऐसा ठूँसा मारा कि उन्हें दिन में तारे नज़र आने लगे। फिर वह मुर्दा उठ बैठा। डाक्टर साहब की कराह सुनकर जब और लोग अंदर आ गए तो 'मुर्दे' ने बताया, 'जब वह होश में आ रहा था तो उसे दिखाई पड़ा कि सफ़ेद चोगा पहने एक भूत उसके ऊपर झुक रहा है, तब घबराकर उसने उस 'भूत' के मुँह पर भरपूर ठूँसा जड़ दिया था, उसे क्या पता था कि वह एक डाक्टर हैं?'
अब भाई जिसे मुर्दा पीटे, उसे कौन बचाए?

24 अगस्त 2005