हास्य व्यंग्य

 

मानवाधिकार
 —नरेंद्र कोहली


"दिल्ली में महिलाएँ तनिक भी सुरक्षित नहीं हैं। उनके विरुद्ध अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं।" वे बोले।
"कारण?" मैंने पूछा।
"अपराधी को दंड नहीं मिलता तो उसका साहस बढ़ जाता है, और फिर उसको देख कर और अपराधी पैदा होने लगते हैं।"
"समाधान क्या है?"
"कठोर दंड।"
"अर्थात?"
"बलात्कारी को मृत्युदंड दिया जाए।" वे बोले।
"जब धनंजय चक्रवर्ती को मृत्युदंड दिया जा रहा था तो आप भी मोमबत्तियाँ लिए, रात भर सरकार के विरुद्ध नारे लगाते रहे थे- यह सरकार अपराधियों को सुधारती नहीं, उन्हें फाँसी पर चढ़ा देती है, इत्यादि-इत्यादि। सरकार की बहुत हाय-हाय की थी आपने।"
"वह मानवाधिकार का मामला था।" वे बोले, "प्रत्येक मानव को जीने का अधिकार है। आप उसका कोई भी दंड दे सकते हैं पर उसका जीवन नहीं छीन सकते। जब आप किसी को जीवन दे नहीं सकते तो किसी का जीवन छीन कैसे सकते हैं?"
"तो बलात्कारी और हत्यारों के भी मानवाधिकार हैं?" मैंने पूछा।
"क्यों नहीं। वे मनुष्य नहीं है क्या?"
"नहीं! वे दरिंदे हैं। हिंस्त्र पशु हैं।" मैंने कहा, "यह बताओ कि जिस बालिका, किशोरी, युवती अथवा प्रौढ़ा के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या की जाती है, उसके कोई मानवाधिकार है या नहीं है? उसे जीने का अधिकार है या नहीं?"
"है। है क्यों नहीं?"
"तो जिस बलात्कारी हत्यारे ने उसका सम्मान और जीवन छीना, उसे क्या अधिकार था कि वह किसी दूसरे का जीवन छीने? यदि देश की सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह बलात्कार और हत्या जैसे अपराध करने वाले से उसका जीवन छीन सके, तो एक अपराधी को यह अधिकार कैसे दिया जा सकता है कि वह किसी के भी प्राण ले ले?"
"नहीं! उसको यह अधिकार नहीं है।"
"तो तुम उस सारी रात क्या बकवास करते रहे थे?"
"वह बकवास थी?"
"तो और क्या था? तुम सरकार को धमकियाँ और गालियाँ देते रहे थे और मुझे लग रहा था कि तुम देश के सारे शांतिप्रिय नागरिकों को धमका रहे हो। राक्षस कहीं के।"
"नहीं! ऐसा कुछ तो नहीं था।"
"तुम शांतिप्रिय नागरिकों के पक्ष में हो या बलात्कारी हत्यारों के?"
"तुम मुझसे ऐसा अनर्गल प्रश्न कैसे कर सकते हो।" वे बिफ़र गए। "मैं हत्यारों और बलात्कारियों के पक्ष में कैसे हो सकता हूँ। मैं तो केवल मानवाधिकारों. . .।"
"तो तुम चाहते हो कि मनेंद्रसिंह कोहली को मृत्युदंड मिले क्योंकि उसने भी वही अपराध किया है।"
"हाँ! वहाँ की सरकार चाहे तो मृत्युदंड दे। मुझे क्या कहना है?"
"तो धनंजय चक्रवर्ती में ऐसा क्या था कि तुम चाहते थे कि उसे मृत्युदंड न दिया जाए?"
"उसके माता पिता को देखो, कैसे वृद्ध और निर्धन हैं। उनपर तो दया की जानी चाहिए थी।" वे अब भी अपनी बात पर दृढ़ थे।
"तो वृद्ध और निर्धन माता पिता के पुत्रों को अधिकार है कि वे दूसरों की पुत्रियों के साथ बलात्कार कर उनकी हत्या कर दें।"
"मैंने यह नहीं कहा।"
"कह तो तुम यही रहे हो, किंतु तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।"
"मैं मानवाधिकार के पक्ष में. . .।"
"तुम राक्षसाधिकार के पक्ष में प्रदर्शन करते रहे थे।"
"मैं तो केवल यह कह रहा हूँ जब हम किसी को जीवन दे नहीं सकते तो हमें किसी का जीवन लेने का क्या अधिकार है। संसार के बड़े-बड़े चिंतकों ने यही कहा है।"
"उन बड़े-बड़े चिंतकों की बेटियों के साथ किसी ने बलात्कार नहीं किया था और न ही किसी ने उनकी हत्या की थी।" मैंने उनको टोक दिया।

वे चुप हो कर मेरी ओर देखने लगे।
"हमें किसी के प्राण लेने का अधिकार नहीं है?"
"नहीं।" वे बोले।
"चाहे वह हमारे प्राण ले ले।"
"हमें आत्मरक्षा का अधिकार है।"
"आत्मरक्षा तभी तक होती है, जब तक हम जीवित और समर्थ हैं।"
"तभी तक करो।"
"और यदि कोई किसी की हत्या करने आए या हत्या कर जाए तो उसे प्राणदान दिया जाए।"
"हाँ! उसे कोई और दंड दिया जा सकता है।"
"हम सेना क्यों रखते हैं?" मैंने पूछा।
"देश की रक्षा के लिए।"
"मैं कहूँगा, उन लोगों के प्राण लेने के लिए जो हमारे देश पर आक्रमण करते हैं, हमारी भूमि छीनते हैं। हमारे नागरिकों को मारते अथवा बंदी बनाते हैं। हमारे देश को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं।"
"हाँ! ऐसा ही है।" वे सहमत हो गए।
"तो सेना के रूप में सरकार को अधिकार है कि वह किसी के प्राण ले किंतु न्यायाधिकरण के रूप में नहीं है?"
"वह देश के शत्रुओं के लिए है।"
"और समाज के शत्रुओं के लिए नहीं है?"
"हम उनके प्राण नहीं ले सकते। मानवाधिकार की बात है।"
"मानवाधिकार प्रत्येक मानव का है- देश के शत्रुओं का भी। कल को तुम कहोगे कि हमें विदेशी आक्रमणकारियों के प्राण लेने का भी अधिकार नहीं है।"
"ऐसा हम क्यों कहेंगे? पागल हैं क्या?"
"इसका उत्तर तो शायद तुम भी नहीं दे सकते क्योंकि धनंजय चटर्जी के समर्थन का भी कोई तर्क नहीं है।"
"तो तुम कहते हो कि धनंजय को फाँसी देना उचित था?" उन्होंने चकित हो कर पूछा।
"उस छह वर्षों की बच्ची के माता पिता से पूछो, जिसकी हत्या कर एक राक्षस ने उसकी टाँगे काट कर उससे दुष्कर्म किया।" मैं कुछ आवेश में था, "और तुमने भी तो बातचीत के आरंभ में बलात्कारी के लिए मृत्युदंड प्रस्तावित किया था।"
"ओह!" उन्होंने अपना सिर खुजलाया, "मैं जब महिला संगठनों के साथ काम करता हूँ तो बलात्कारियों को मृत्युदंड दिए जाने का समर्थन करता हूँ और जब मानवाधिकार संगठनों के साथ काम करता हूँ तो बलात्कारियों ही नहीं, हत्यारों को भी मृत्युदंड से बचाने के लिए नारे लगाता हूँ। पता नहीं मैं क्या करता रहता हूँ।"
"मैं बताऊँ, तुम क्या करते रहते हो।" मैंने कहा, "तुम प्रदर्शन करने और नारे लगाने वाली एक मशीन हो, जिसके बटन दूसरों के हाथों में हैं। वे बटन दबाते हैं और तुम कठपुतली के समान उनकी आज्ञाओं का पालन करने लगते हो।"

1 जून 2005