हास्य व्यंग्य

 

मुक्त-मुक्त का दौर
-डॉ नवीन चंद लोहनी


यह मुक्त-मुक्त खेलने का दौर है।
हम भारत के लोग भारत को मुक्त कराने का खेल खेल रहे हैं। अर्थव्यवस्था मुक्त हुई तो बागडोर वित्त मंत्री के बजाए अपने हर्षद जी के हाथों में खेलने लगी। थाम-पकड़कर अब अपने एन. आर. आईज. बंधु सरकार को उसकी अर्थ-व्यवस्था दे रहे हैं, क्योंकि अपने सभी मंत्री-संत्री विदेश जाकर एन. आर. आईज. को न्यौत रहे हैं, जीमन को, अपने भारत देश को याद करो। ठीक वैसे ही जैसे अस्त-पस्त बूढ़ा बाप बेटे को घर की याद दिला रहा हो- बेटा तू पल-बढ़कर विदेश चला गया तो मनीऑर्डर ही भेज दे, पर गाँव की व्यवस्था को सुधार। भूले बेटे कुछ धन भेज रहे हैं बाप को। ऐलान है सरकार का, देखो उनके रुपयों से हमारी साख बढ़ रही है। उधार के कपड़े पर अपनी सफ़ेदी की चमकार की डुगडुगी पिट रही है।

शिक्षा व्यवस्था मुक्त हो गई। कुछ स्कूल-कॉलेज पिक्चर हॉल में लगने लगे हैं तो बची खुची मुक्ति विश्वविद्यालय के दरवाज़े से बाहर निकल रही है, एक लिफ़ाफ़े में बंद कुछ नोट्स के रूप में, कुछ टी. वी. के ज़रिए। शिक्षा संस्थान जहाँ बंद रहने के दिन खुलने के दिनों से अधिक है, वहाँ से भी शिक्षा मुक्त हो गई है, गेस-मॉडल पेपर व्यवस्था ज़िंदाबाद।

कभी शरीर को सौंदर्य प्रदान करने में अलंकारों की तरह वस्त्र पहनने का रिवाज़ था। अब कम से कम वस्त्र पहन कर बदन दिखाने का रिवाज़ आया है। "अगर हमारे पास हैं तो दिखाएँ क्यों नहीं।" अभिनेत्री बोलती है। वस्त्रमुक्त होने का समय है, आख़िर क्या हमारे पूर्वज वस्त्र पहनते थे? तब ऋषि कन्याओं के सौंदर्य को कालिदास भी दाल-भात की तरह पेश करते थे। अब क्यों आजकल की उर्वशियाँ, मेनकाएँ पीछे रहें। गीत चलता है "तू चीज़ बड़ी हो मस्त-मस्त, तू चीज बड़ी है. . .।" लड़की चीज़ हो गई है और लड़का मस्त-मस्त गाता मुक्ति का अनुभव कर रहा है। सीमाओं को तोड़ने का ऐलान करता हुआ और नैतिकता के कथित नए मूल्यों की स्थापना करता हुआ।

समाज इक्कीसवीं शताब्दी में जब भी पहुँचे, देश जब तक पहुँचने की सोचे, अपने प्रजातंत्र रक्षक नेताओं की टोली बाईसवीं सदी में पहुँचने की तैयारी कर रही है। उसने नैतिकता, राष्ट्रभक्ति, सामाजिक तथा मानवीय मूल्यों को शेयर घोटाले पर संसदीय समिति की रिपोर्ट की मानिंद अव्यवहारिक तथा तथ्यरहित बता दिया है। उनके लिए तथ्य का मतलब मुद्रा अर्जन से है। वह सूटकेस द्वारा दिया जाए या स्विस बैंक के खातों में पड़ जाए। वही तथ्य तथा सत्य है। उसके लिए कुर्सी के साथ धन की युक्ति जुटाने की सर्वोच्च परंपरा है, इसमें सपरिवार जुटकर वे देश से पहले इक्कीसवीं सदी में पहुँच गए हैं और बाईसवीं की तैयारी में हैं। यह परम मुक्ति का आनंद क्षण है।

नेतागणों ने सामाजिक मूल्यों के साथ भाषा को भी नए मुहावरे दिए हैं। अब वे एक दूसरे को ठेठ गाली देकर प्रेम जताते हैं, जनता यह नहीं समझ पाती है कि वह किन बातों का क्या मतलब समझे। सो इधर मुक्त-मुक्त का राग कुछ अधिक तीव्र है। कल जो गाली दी थी उसका मतलब प्रेम को गहरे लगाव से जताने की मंशा थी, नेता कहते हैं और हम हैं कि लल्लुओं की मायाओं को काशी विश्वनाथ की तरह मानपूज रहे हैं।

मुक्ति के इस दौर में गाँव अपने मूल-भूत प्रेम-सौहार्द्र सहानुभूति के स्वरों से मुक्त हो गए हैं। वहाँ के रीति रिवाज़, परंपराओं पर शहरी चकाचौंध की चमचमाहट है। इस मुक्ति के मौसम में गाँवों को कस्बाई, कस्बों को शहरी और शहरों को महानगरीय आपाधापी लील रही है और हम मुक्त-मुक्त अनुभव कर रहे हैं। फूलों के बजाए कैक्टस सौंदर्य बोध का नया प्रतीक बनकर ड्राइंगरूम में सज रहा है और हम परंपरा से मोक्ष्य पाकर आधुनिकता को जाम की तरह पीने के नाम पर पश्चिमी देशों की दौड़ में गुम हैं, समझते हैं मुक्त हो रहे हैं।

संगीत, कला, साहित्य के क्षेत्रों में मुक्तिवाद चल रहा है। शास्त्रीय संगीत, भारतीय कलाएँ, रैप के जैसे पीछे हैं। साहित्य में उपभोक्तावाद हावी है। बिकने के लिए लिखो और लिखने के लिए बिको।

छायावाद-प्रगतिवाद, प्रयोगवाद नहीं बिकेगा, जनवाद बेचो। आधुनिकतावाद न सही उत्तर-आधुनिकतावाद बिकेगा। बाज़ार में आकर्षक पैकिंग व ज़ोरदार विज्ञापन चलाओ, ज़रूर बिकेगा। बिको-बेचो और मुक्त रहो किसी भी दायित्व से।

सर्वत्र मुक्त-मुक्ति का शोर है, पर आदमी अपने भीतर के दानव से मुक्त नहीं है, वह उसके भीतर से जब तब मुक्त होकर बाहर उछल आता है और हम मुक्त होने का झूठा अहसास ढोते आनंदित हो रहे हैं।

16 मई 2005