हास्य व्यंग्य

  फंदा
—डॉ नरेंद्र कोहली


"यह कैसा है?" पत्नी ने मुझे एक फ्रिज दिखाया।
"अच्छा है।" मैंने कहा।
प्रसन्नता हुई कि पत्नी को कुछ तो पसंद आया। ख़रीदना समस्या नहीं है। समस्या तो पसंद की है, "दाम पूछूँ?"
"पूछो।"
मैंने दुकानदार को बुलाया और पूछा, "यह फ्रिज कैसा है?"
"यह तो चमत्कार ही है।" वह बोला, "यह वह करेगा, जो आज तक आपके किसी फ्रिज ने नहीं किया होगा।"
"अर्थात?"
"ख़रीद कर देखिए। याद कीजिएगा हमें कि कैसी चीज़ दी।"
"कितने का है?"
"सत्ताइस हज़ार।"
मैं चौंका, "क्यों? इतना महँगा क्यों?"
"विदेशी है।" वह अकड़ कर बोला, "दाम तो अधिक होगा ही।"
"विदेशी है तो सस्ता होना चाहिए।" मैं बोला, "बाहर से आकर हमारे देश में बिके और हमारे फ्रिजों से महँगा बिके। यह तो कोई बात न हुई।" मैंने कहा, "कोई देशी सस्ते फ्रिज छोड़ कर महँगा विदेशी फ्रिज क्यों लेगा। देश से द्रोह भी करें और पैसा भी अधिक दें। कौन लेगा इसे?"
"आप लेंगे।" वह कुछ इस भंगिमा में बोला, जैसे कह रहा हो कि तुम से बड़ा मूर्ख और कौन होगा, तुम लोगे।
"पर क्यों?"
"मल्टी नैशनल कंपनी है। कमाई करने आई है, डुबोने तो आई नहीं।"
"पर महँगा क्यों हैं?"
"क्योंकि उनको अपने देश की मुद्रा में पैसा कमाना है। उनकी मुद्रा हमारे स्र्पए के मुकाबले महंगी है अर्थात मज़बूत है। जो महँगा होता है, वह मज़बूत होता है।" उसने मुझे अर्थशास्त्र पढ़ाया, "हम दुकानदारों को भी अधिक लाभ देना है। अपने कर्मचारियों को भी अधिक वेतन देना है, नहीं तो उनके लिए काम कौन करेगा।"

उसका तर्क मुझे जँच गया। बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों की यह मजबूरी तो मुझे पहले समझ में ही नहीं आई थी। बेचारे हमारा घर नहीं लूटेंगे तो अपना घर कैसे भरेंगे।

मैंने फ्रिज ख़रीद लिया। फ्रिज घर में आया तो पहली बार खोल कर देखा, विदेशी चीज़ थी, दुकान पर उसका दरवाज़ा खोलने का साहस नहीं हुआ था। कहीं दुकानदार टोक देता कि विदेशी फ्रिज कभी देखा भी है। फ्रिज ख़रीदने गए थे, अपनी नाक कटवाने तो गए नहीं थे।
"इसका शीतक इतना बड़ा क्यों है?" मैंने पूछा।
"क्या बड़ा है?" इंजीनियर नामक जंतु ने पूछा।
"शीतक।" मैंने संकेत से उसे समझाया।
"यह फ्रीजर है।" वह बोला, "यह शीतक फीतक क्या होता है।"
"तुम जिसको अंग्रेज़ी में कह रहे हो, उसे ही मैं हिंदी में कह रहा हूँ।"
"विदेशी फ्रिज ख़रीदोगे तो हिंदी नहीं चलेगी, अंग्रेज़ी में बोलना होगा।" उसने जैसे आदेश दिया।
"विदेशी फ्रिज ख़रीदेंगे तो अपनी भाषा भी छोड़नी पड़ेगी?" मैंने चकित हो कर पूछा।
"नहीं तो उनके दास कैसे बनोगे?"
"पर मैं उनका दास बनना नहीं चाहता।" मैं चिल्लाया।
"तो विदेशी फ्रिज ख़रीदने के लिए तुम्हें देवगुरु बृहस्पति ने कहा था क्या?" उसने मुझे डाँट दिया।
मैं सहम गया, "चलो फ्रीजर ही सही। पर यह इतना बड़ा क्यों है?"
"ताकि तुम इसमें दुनिया भर की मछली-मांस इत्यादि रख सको। महीनों रख सको, बासी मांस खा सको।"
"मैं तो शाकाहारी हूँ।"
"तो अब मांसाहारी हो जाओ।" उसका स्वर और भी कठोर हो गया, "ख़रीदोगे विदेशी फ्रिज और रहोगे शाकाहारी। कोई तमाशा है क्या? शाक सब्ज़ी डाल कर फ्रिज का अपमान किया तो देखना कंपनी मुकदमा चला देगी।"

मैं तो बुरी तरह फँस गया था। विदेशी फ्रिज क्या ख़रीद लिया, सब ओर से घिर गया। पहले अपनी भाषा छोड़ने की बात थी, अब अपना आहार भी बदलना होगा।
"इसमें तो दूध का बड़ा पतीला रखने का स्थान ही नहीं है।" मैंने फ्रिज का दूसरा दरवाज़ा खोला, "हम दूध कैसे रखेंगे?"
"दूध के पतीले भूल जाओ।" वह बोला, "बोतलों और कैन इत्यादि में दूध रखो। पतीला रख कर इस विदेशी फ्रिज का अपमान करने का साहस करोगे तो भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाएँगे। विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी का फ्रिज है। कोई मज़ाक नहीं है कि हर ऐरा-गैरा नत्थुखैरा इसे ख़रीद ले और अपने ढंग से इसका दुरुपयोग करे।"
"पर बोतलों और कैन में दूध गर्म कैसे होगा, उसके लिए तो पतीला ही चाहिए।"
"भूल जाओ, दूध को गर्म करना। जैसा फ्रिज से निकले, पी लो।"
"पर हमारे देश की जलवायु में।"
"अपने देश की जलवायु को बदल डालो।" उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी, "बदल नहीं सकते तो उसे भूल जाओ। यह मत कहना कि उससे तुम अस्वस्थ होगे। होंगे तो अच्छा है। तब हम अपनी औषधियों की कंपनी भी यहाँ ले आएँगे। तुम्हें अपनी महँगी औषधियाँ खिलाएँगे और तुम्हारी मृत्यु दर बढ़ाएँगे।"

मैं तो उसके फंदे में वैसे ही फंस गया था, जैसे भारतीय शासक इस्ट इंडिया कंपनी के फंदे में फंस गए थे। चुपचाप अपमान का घूँट पी कर रह गया।
सहसा मेरा हाथ फ्रिज के दरवाज़े पर पड़ा, "अरे यह इतना गऱ्म क्यों है?"
"यह ऐसे ही रहता है।" वह बोला, "भीतर की गर्मी बाहर निकालेगा, तो ही तो भीतर से ठंडा होगा।"

मैं उससे तर्क करने की स्थिति में नहीं था। चुपचाप उसे विदा कर दिया।
अभी अपने गली मुहल्ले वालों तथा रिश्तेदारों पर अपने दो द्वारों वाले, बड़े विदेशी फ्रिज का रौब भी पूरी तरह जमा नहीं पाए थे कि फ्रिज ने काम करना बंद कर दिया।

मैंने दुकानदार को फ़ोन किया, "भैया! यह कैसा फ्रिज दे दिया। वह तो छह महीने में ही चीं बोल गया। हमारे भारतीय फ्रिज तो दस पंद्रह साल छींकते भी नहीं।"
"आप को कहा नहीं था कि आप हमें याद करेंगे कि कैसी चीज़ दे दी। ऐसा चमत्कार किसी और फ्रिज ने किया था क्या?"
"तो तुम्हारा मतलब यह था?" मैंने पूछा।
"आपने क्या समझा था।"
अब मैं उसे क्या बताता कि मैंने क्या समझा था।
"अब करना क्या है?"
"कंपनी को फ़ोन कीजिए।"
"आप कुछ नहीं कर सकते?"
"हमें जो करना था, हमने कर दिया। आपसे पैसे ले लिए और अपना अंश अपने पास रख, उनके पैसे उन्हें दे दिए।"

मैंने कंपनी में फ़ोन किया। पता चला कंपनी बहादुर का फ़ोन मिलना, भारत के प्रधान मंत्री के मिलने से भी कठिन था। कई बार तो लगा कि कहीं इन का फ़ोन कोरिया में ही तो नहीं है? नंबर डायल करने में आधी अंगुली घिसा कर जब नंबर मिला तो उन्होंने पूछा, "क्या है?"
"फ्रिज काम नहीं कर रहा।"
"आपको कैसे मालूम है कि काम नहीं कर रहा।" उसने मुझे डाँटा, "विदेशी फ्रिज है, दिखाई यही देता है कि वह काम नहीं कर रहा, जबकि वह काम कर रहा होता है। कोई विदेशी एजेंसी खुल कर काम नहीं करती। सब ढके छिपे ही काम करती हैं।"
"कैसे पता चलेगा कि वह काम कर रहा है?" मैंने ढीठ होकर पूछा।
"उसका बल्ब जल रहा है या नहीं?"
"जल रहा है।"
"तो वह काम कर रहा है।"
"हमने बल्ब जलाने के लिए फ्रिज नहीं ख़रीदा था।" मैंने कहा, "बर्फ़ ज़माने के लिए ख़रीदा था और उसमें बर्फ़ नहीं जम रही है।"
"इस फ्रिज में बर्फ़ गर्मियों में जमती है।" उसने कहा, "विदेशी फ्रिज ले लेते हो और उसके विषय में जानते कुछ भी नहीं।"
"गर्मियाँ ही तो हैं।" मैंने कहा, "कोरिया में अच्छा मौसम है इन दिनों। फ्रिज वहाँ बना है तो उनकी ऋतुओं से ही तो चलेगा। वहाँ गर्मियाँ आरंभ होंगी तो अपने आप बर्फ़ जमने लगेगी आपके फ्रिज में।"
"हमें मूर्ख बनाने की कोशिश मत करो। फ्रिज ख़राब हो गया है।" मैंने कहा, "अभी इसकी गारंटी की अवधि समाप्त नहीं हुई है। चुपचाप फ्रिज उठाओ और ठीक कर के लौटाओ। नहीं तो।"
"नहीं तो क्या करोगे?"
"मुकदमा।"
"हम कल ही फ्रिज उठा लेंगे और ठीक होने के लिए कोरिया भेज देंगे। ठीक होकर आ जाएगा तो तुम्हें लौटा देंगे।"
"जहाँ मन आए भेजो। पर मुझे फ्रिज ठीक कर के दो।"
"फ्रिज पहले तो माल गाड़ी से मुंबई जाएगा। फिर किसी जलपोत में कोरिया जाएगा। ठीक हो कर लौटेगा तो आप की गारंटी की अवधि समाप्त हो चुकी होंगी।" उसने मुझे समझाया, "इसलिए आपको उसका भुगतान करना पड़ेगा। मरम्मत का बिल फ्रिज के दाम से भी अधिक होगा, क्योंकि वहाँ मज़दूरी बहुत महँगी है। इसलिए मेरे भाई! ठीक होता है तो यहीं अपने मुहल्ले का मिस्त्री बुला कर उसे ठीक करा लो। क्यों झंझट में पड़ते हो। देशी तरीके छोड़ो और बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों से मुकदमे में मत उलझो।"

मेरी समझ में उसकी बात आ गई। मैंने अपने मुहल्ले का राजू मिस्त्री बुला लिया। अब देखें, वह क्या चमत्कार करता है।

1 मई 2005