हास्य व्यंग्य

 

कैसे कैसे शब्दजाल
-रविशंकर श्रीवास्तव
 



कभी-कभी आपके वो आप पर ज़रा ज़्यादा ही प्यार उंडेलने लगते हैं। और कुछ ऐसी प्रेम भरी बातें कहते हैं, जो आपने उनके मुख से कभी सुनी नहीं होती है। और आप सोचती हैं कि हाय! क्या सचमुच? पर क्या आपने सोचा है कि आपके वो जो कहते हैं, क्या वो वास्तव में वही कहना चाहते हैं? शायद हाँ और शायद ना। हो सकता है आपके वो जो कभी कुछ कहते हैं, वो वास्तव में कहना नहीं चाहते हो। और वो जो कहना चाहते हैं, वो नहीं कहते हो। अगर आप गंभीरता से सोचें तो वो जो कहते हैं, उनमें वो जो कहना चाहते हैं, वो छुपा रहता है। बस, ज़रा-सा आइडिया भिड़ाइए और देखिए कि उनके प्रेम भरे शब्द जाल के निहितार्थ भला क्या-क्या हो सकते हैं! कुछ ऐसे ही उदाहरण आपके सामने हैं।

जब वे कहते हैं,
"प्रिये, आज क्या मैं खाना बनाने में तुम्हारी मदद कर दूँ?" दरअसल वे कहना चाहते हैं-
"खाना आख़िरकार अभी तक क्यों नहीं बना?"
आपके किसी प्रश्न पर जब वो कहते हैं,
"यार इसके पीछे लंबी चौड़ी कहानी है।" दरअसल वे कहना चाहते हैं-
"मुझे इस बारे में कतई कुछ भी नहीं पता।"

जब वो कहते हैं,
"प्रिये, ज़रा आराम कर लो, ये क्या। दिन भर काम ही काम?" दरअसल वे कहना चाहते हैं-
"यार ज़रा अपनी सिलाई मशीन चलाना बंद करो, मैं अपने पसंदीदा टीवी प्रोग्राम का आनंद नहीं ले पा रहा हूँ।"

क्या आपने अंदाज़ा लगाया है कि आपकी किसी लंबी चर्चा पर जब वो यह कहते हैं कि
"वाह यार क्या मज़ेदार बात बताई।" दरअसल वे कहना चाहते हैं-
"यार अब बस बंद करो। मुझे ज़रा आज का अख़बार तो शांति से पढ़ लेने दो।"

किसी इमोशनल फ़िल्म के अंत में, आपके आँसुओं के बीच जब वो यह कहते हैं
"वाह क्या शानदार फ़िल्म थी।" तब अक्सर उसका यह मतलब होता है
"इस फ़िल्म ने मुझे अपने क्लब के होने जा रहे क्रिकेट मैच की तैयारियों के बारे में सोचने का ख़ासा मौका दे दिया।"

जब वो कहते हैं,
"माफ़ करना यार, मैं आजकल ज़रा ज़्यादा ही भूलने लगा हूँ।" तब इसका असली अर्थ क्या होता है यह आपको पता है? असल में वो ये कहना चाहते हैं-
"मैं अपने क्लब के मैच के दिन को नहीं भूलता, ब्रिज के पत्तों को नहीं भूलता, साली साहिबा के सालगिरह को नहीं भूलता पर तुम्हारे जन्म दिन को भूल जाता हूँ।"

"प्रिये, आज मैं तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था और देखो तुम्हारे लिए यह साड़ी ले आया।"
जब वे यह कहें, तो आप को उनकी ईमानदारी पर शक करने का कोई अधिकार नहीं है, मगर अक्सर ऐसे मौकों पर इसका अर्थ कुछ यों होता है-
"सुपर मार्केट में साड़ी दिखाने वाली सेल्स गर्ल क्या क़यामत थी। अब अगर मैं कुछ न लेता तो उसकी तो तौहीन थी ना।"

जब वो यह कहते हैं,
"कुछ ख़ास नहीं यार, बस ज़रा-सा कट लग गया।" तब इसका मतलब होता है,
"ककड़ी काटते-काटते ऐश्वर्या राय के बारे में दिवा स्वप्न देखने पर तो ऐसा होना ही है।"

किसी दिन ज़्यादा मेहरबान होकर जब वो ये कहते हैं,
"आज मैं घर के कामों में हाथ बटाता हूँ।" तब तो यह मानकर चलिए कि इसका अर्थ कुछ यों हो सकता है-
"आज किसी गेम, अख़बार, पत्रिका या टीवी शो में मन ही नहीं कर रहा है, लिहाज़ा टाइम पास कुछ काम ही कर लिया जाए।"

आपने उन्हें कितनी ही बार यह कहते सुना होगा-
"हाँ, मैं सुन रहा हूँ।" पर हर बार उनके कहने का यही मकसद रहा होगा-
"मुझे तुम्हारी मुहल्ले भर की इन कहानियों में कोई दिलचस्पी नहीं है, और न ही टाइम है। मुझे अभी बहुत से काम करने हैं जैसे पत्रिका पढ़ना, अख़बार चाटना, पत्ते खेलना और कल के आफ़िस के काम और व्यवसाय के बारे में सोचना।"

"ओह तुम तो बस इस लिबास में बहुत खूबसूरत लगोगी।"
जब-जब भी आपके उन्होंने आपसे यह कहा होगा, क्या आपने यह अंदाज़ा लगाया है कि उन्हें हर बार या तो जाने की जल्दी रही होगी या जाकर आने की जल्दी और वो वास्तव में यह कहना चाह रहे होंगे-
"मुझे वापस आकर ज़रा धंधे पानी की बातें निपटाना है यार।"

अबकी, जब आपसे आपके वो ये कहें -
"मुझे तेरी बहुत याद आई।" तब ज़रा ग़ौर फ़रमाइएगा। हो सकता है वे यह कहना चाहते हों
"यार वहाँ किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था। बहुत ज़ोर की भूख जो लग रही थी।"

जब वे कहते हैं-
"प्रिये मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ।" तब तो बिलकुल धोखा मत खाइए। ज़रा कोशिश करिए उनके हाथों से अख़बार या टीवी का रिमोट छीनने की। दरअसल उनका कहना होता है-
"मैं तुम्हें अपने अख़बार और टीवी जितना ही प्यार करता हूँ।"

"आओ ये काम हम मिलजुल कर करें।"
जब वह यह कहें तब तो आप किसी सहायता की उम्मीद किसी हाल मत बाँधिए। असल में बात यह होती है जो वह यह कहना चाहते हैं-
"मैं पसारा करूँगा तो उसे समेटने के लिए तुम्हारी ज़रूरत तो होगी ही ना।"

"मुझे किसी सहायता की ज़रूरत नहीं है।"
जब किसी उपकरण को ठीक करने के लिए वे उतारु हो जाएँ और आपके अनुरोध पर कि किसी मेकेनिक की सेवाएँ लेनी बेहतर होंगीं, वे ये शब्द कहें तब यकीन मानिए कि उनका कहना होता है
"जब मेरे रिपेयर की कोशिशों में यह पूरी तरह बेकार और ख़राब हो जाएगा तब ही मेकेनिक की सहायता लेने के बारे में सोचेंगे।"

अब जब आपको अपने प्रिय के कहे शब्दों के असली अर्थ कुछ-कुछ समझ में आने लगे हैं शायद, है ना?

24 सितंबर 2005