हास्य व्यंग्य

भोंपू
नरेंद्र कोहली 


वह मेरे घर के सामने के बिजली के खंभे पर चढ़ा हुआ भोंपू बाँध रहा था। मेरी आत्मा काँप गई। अब ये सात दिनों तक न चैन से रहने देंगे और न रात को सोने देंगे।
"ऐ क्या कर रहे हो ?" मैंने पुकार कर कहा।
उसने उपेक्षा से मुझे देखा और हँसा, "अंधे हो। देख नहीं रहे भोंपू बाँध रहा हूँ।"
"भोंपू तो बाँध रहे हो किंतु यहाँ क्यों बाँध रहे हो?"
"क्योंकि भोंपू को खंभे पर बँधना है और खंभा यहाँ है।"

मैंने बहुत प्रयत्नपूर्वक, भागदौड़ कर के बिजली का यह खंभा यहाँ लगवाया था, ताकि मेरे घर के सामने प्रकाश रहे और चोर-उठाईगीरे दूर रहें। मैं क्या जानता था कि खंभे पर बिजली का लट्टू ही नहीं भोपू भी सुशोभित होता है।
"तुम मेरे घर के सामने इसे नहीं बाँध सकते।"
"क्यों? इस खंभे पर तेरे घर की छत टिकी है या यह सड़क तेरे बाप की है?"
"खंभा बिजली का है और सड़क नगर निगम की है। इस भोंपू के बाप की नहीं है।" मैंने भी उसी की शैली में उत्तर दिया, "इसको यहाँ बाँधने से शोर होगा और उससे मुझे असुविधा होगी।"
"तेरी असुविधा के भय से क्या देश भर में धर्मप्रचार बंद हो जाएगा।" उसने मुझ पर अपनी कृपादृष्टि डाली, "आजकल धर्म और विज्ञान में संधि हो गई है। अब इस भोंपू से शोर नहीं होता, प्रवचन होता है। तेरे कानों में पवित्र शब्द पड़ेंगे। तेरी आत्मा पवित्र होगी।"
"नहीं। इससे मैं रात भर सो नहीं सकूँगा।"
"तेरा सोना बहुत ज़रूरी है?" उसने घूर कर मुझे देखा, "अब तक सोता ही तो रहा है। और किया ही क्या है? अब जाग भी जा। उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई। अब रैन कहाँ जो सोवत है। अपने प्रभु को भी थोड़ा याद कर ले।"
मैंने प्रभु के उस ऑफ़िसर ऑन स्पेशल डयूटी को घूर कर देखा, "मेरा बच्चा याद करना चाहता है। प्रभु को नहीं, स्कूल में पढ़ाए गए अपने पाठ को। तुम्हारे इस भोंपू के मारे वह कुछ पढ़ नहीं पाएगा। फेल हो जाएगा।"
"पास हो गया तो कौनसे आकाश के तारे तोड़ लाएगा। कहीं क्लर्क ही तो बनेगा। बी. ए. पास तो मैं भी हूँ। देख लो सड़कों पर भोंपू बाँधने का काम कर रहा हूँ।" उसने कहा, "भोंपू तो यहीं लगेगा।"
"किसका है?" मैंने पूछा।
"धर्मस्थल का।"
"लगा जाओ। मैं अभी इसकी तार काट दूँगा।"
"मैं तो कुछ नहीं कहूँगा। पर धर्मस्थल के लठैत आ जाएँगे।" वह बोला, "तेरी भी दो चार तारें काट जाएँगे।"
"मैं पुलिस बुला लूँगा।"
"बुला ले। क्या कर लेगी पुलिस। यह सेकुलर देश है।" वह बोला, "यह भोंपू यहीं बँधेगा। पुलिस के संरक्षण में रहेगा, और सरकारी बिजली से बजेगा। धर्म के सामने पुलिस कुछ नहीं कर सकती।"
"कैसे नहीं कर सकती।" मैंने कहा, "उच्चतम न्यायालय का आदेश है कि अप्रैल के महीने में रात तो रात, आप दिन में भी सार्वजनिक स्थान पर लाऊडस्पीकर नहीं लगा सकते। इस महीने में बच्चों की परीक्षाएँ होती हैं।"
"उच्चतम न्यायालय, वह जो मथुरा रोड़ पर है।" उसने मेरी ओर देखा, "तू फ़िल्में नहीं देखता क्या?"
"देखता हूँ। क्यों?"
"तो बहरा है क्या? या हॉल में जाकर सो जाता है?"
"क्या मतलब?"
"सारी फ़िल्मों में यह संवाद होता है - 'इस अदालत से भी ऊपर एक अदालत है।' तू ने कभी यह संवाद नहीं सुना?"
"सुना है।"
"हम उसी अदालत से स्टे आर्डर ले कर आए हैं। तुम्हारा उच्चतम न्यायालय हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हमारे पास उस आसमानी सरकार का आदेश है कि हम जब चाहेंगे, जहाँ चाहेंगे, लाऊडस्पीकर लगाएँगे। चिल्लाएँगे। जो कर सकता है कर ले।"

मैं चुप हो गया। उस ऊपर वाली सरकार के सारे वकील तो धर्मस्थल के ही अधीन थे। मैं तो यह मुकदमा ही नहीं लड़ सकता था।

9 जुलाई 2006