हास्य व्यंग्य

  एक महान व्यक्ति की आत्मकथा
 -मुरली मनोहर श्रीवास्तव 


मैंने देखा शर्मा जी बेचैन से इधर-उधर टहल रहे है तो मुझ से रहा नहीं गया। मैंने पूछ ही लिया, "क्या बात है शर्मा जी कैसे परेशान से घूम रहे हैं?"
वे बोले, "कुछ नहीं बस सोच रहा हू आत्मकथा लिख डालूँ।"
"यह तो बड़ा ही शुभ काम है इसमें सोचना क्या, उठाइए कलम और लिख डालिए, इससे आसान तो कुछ है ही नहीं।"
"यही तो समस्या है कि किसकी आत्मकथा लिखूँ, मधुबाला, सुरैया या गुरुदत्त की!"
मैं चौंका, "शर्मा जी आत्मकथा तो अपनी लिखी जाती है।"
"सो तो है पर मेरी आत्मकथा पढ़ेगा कौन?"
"तो ऐसा करिए, आप किसी शेरावत हाशमी या ग्रेट कार्पोरेट चेयर मैन की आत्मकथा लिख डालिए क्योंकि मधुबाला और गुरुदत्त को भी आज कोई नहीं पढ़ेगा।"
"यार बड़ी मुश्किल है, मैंने सोचा था मधुबाला या गुरुदत्त की आत्मकथा मैं सपने के सहारे पूरी कर लूँगा पर आज की वैंप कथा लिखने में मेरे पसीने छूट जाएँगे उसमें तो बहुत कुछ ऐसा-वैसा लिखना पड़ेगा और जीते जागते किसी इंसान की कथा लिखना ख़तरे से खाली नहीं है, क्या पता किस बात पर विवाद हो जाए।"
मैंने कहा, "शर्मा जी आत्मकथा में बेड रूम और वार रूम के अलावा पढ़ने के लिए होता ही क्या है? आजकल बिना विवाद के बिकता भी कुछ नहीं। आत्मकथा क्या, आज जितनी कथाएँ उठा कर देखिए, सब की सब विवादों से भरी हैं।
"अच्छा छोड़ो आत्मकथा लिखने के कुछ टिप्स बताओ।"
मैं हँसा, "विवाद पैदा करने के टिप्स बता देता हूँ, आप आत्मकथा पूरी कर लीजिएगा।"
यह सुन कर वे निर्विकार भाव से हँसने लगे।

मैं उनकी हँसी में छुपे अर्थ को पढ़ने में नाकाम रहा।
इसके बाद हम लोगों के बीच एक सन्नाटा भरा अंतराल गुज़रता है और एक दिन मैं मार्केट में शर्मा जी द्वारा लिखित एक महान व्यक्ति की आत्मकथा नामक पुस्तक देखता हूँ। उत्सुकतावश उसे हाथ लगाता हूँ पर पेपर बैक्स संस्करण को भी गोल्डेन पेपर में पैक पाता हूँ।
मैं किताब पलटता हूँ तो फ़ोटो मुझे शर्मा जी की ही दिखाई देती है।
मैं ख़रीदने के प्रयास मे दुकानदार की ओर देखता हूँ दुकानदार कभी मेरी हाथ की पुस्तक तो कभी मेरी औक़ात को देखता है। पुस्तक का मूल्य बीस डालर सुन कर मेरे हाथ काँप जाते हैं। समझ जाता हूँ कि किसी विदेशी प्रकाशक की मेहरबानी हुई है। ऐसी पुस्तकें भेंट में भी नहीं मिलती की बौद्धिक जुगाली हो जाए।

मैं शर्मा जी से संपर्क साधता हूँ लगता है अब वे मुझे पहचानने से इंकार कर देंगे। खैऱ बड़े प्रयास के बाद मैं उस पुस्तक के कुछ अंश प्रस्तुत करने मे सफल हो पाया हूँ। जैसा की आप जानते हैं स्वयं से इतर भी सार्वभौमिक आत्मकथाएँ लिखने का चलन बहुत पुराना है जैसे बाण भट्ट की आत्मकथा या फिर एक गधे की आत्मकथा।
मैं एक गधे की आत्मकथा से बहुत प्रभावित रहा हूँ। जो एक सेकेंड के भीतर ही अपनी सातवी पीढ़ी का नाम गधा बड़ी आसानी से बता देता है जब कि हम आदमी लोग आधा घंटा सोच कर भी अपनी तीसरी चौथी पीढ़ी तक का नाम नहीं बता पाते और अपने सुसंस्कृत होने का दंभ भरते हैं। यही बात मुझे प्रेरित करती है कि एक महान व्यक्ति की आत्मकथा के नाम से एक सार्वभौमिक आत्मकथा लिखी जाए।
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दूसरा अंश
विश्व में महान व्यक्तियों के विवादित होने पर विवाद हो सकता है परंतु विवादित व्यक्ति के महान होने पर कोई विवाद नहीं है। अनेक दृष्टांतों और उद्धरणों के बाद मेरी यह आत्मकथा जब एक विवादित व्यक्ति के भीतर झाँकती है तो पाती है कि उसका महान होना निर्विवाद सत्य है। यह ठीक वैसा ही सत्य है जैसा कि धरती का गोल होना और आकाश का खाली होना। विवादित व्यक्ति ने विवादित होने के लिए जो अथक परिश्रम किया है वह एक सामान्य आदमी नहीं कर सकता।

आज विश्व में कौन ऐसा महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं है जो विवादित हो कर महान नहीं बनना चाहता।
आप देखेंगे तो पाएँगे कला, साहित्य, संस्कृति, संगीत या अन्य किसी भी क्षेत्र में विवादित होने के लिए लोग क्या-क्या स्वांग नहीं रचते। अरे! लोग नाभी मे रिंग पहनने से ले कर महिला अंग वस्त्रों में फ़ोटो खिंचवाने तक सब करा डालने का टोटका अपनाते है। बालों को रंगने चोटी बनाने दाढ़ी आड़ी तिरछी कटवाने जैसे अनेक चोचले करते हैं। किसी भी विषय पर अनर्गल टिप्पणी करते है शब्दों के अनोखे जाल बुनते हैं पर क्या सभी विवादित हो पाते हैं?
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एक महान आदमी अपनी आत्मकथा में यह कहने की हिम्मत जुटा रहा है कि जब वह पावर में था तो व्यवस्था के दबाव में उसे वह सब कुछ करना पड़ा जो करने की गवाही पावर में न होने पर उसकी आत्मा कभी न देती। वह व्यवस्था और गोपनीयता की सौगंध से इस तरह बँधा था कि उसे विवशता पूर्वक चुप रहना पड़ा। आज वह सौगंध से बाहर है और अपनी विवशताओं को पुस्तक में रख रहा है। साथ ही अपनी आत्मा पर पड़ रहे बोझ से मुक्ति के लिए तब कुछ न कर पाने के लिए खेद प्रकट करता है। आगे अब वह चाहता है कि उसकी जगह आज जो पद पर बैठा है वह अपनी विवशता तोड़ कर वह कदम उठाए जो वह वहाँ रहते तब नहीं उठा सका था। क्योंकि आज वह इस पुस्तक में सब कुछ वह बड़ी साफ़गोयी से बयान कर रहा है।
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एक महान व्यक्ति का जीवन अपने चारों ओर एक ऐसा आकर्षक वातावरण तैयार करता है कि सुंदरियाँ उस आकर्षण में बँधी चली आती है। सुरा और सुंदरी के बिना यदि महान व्यक्ति इस वातावरण में जीवित रहने का प्रयास करेगा तो इसके दबाव को सह नहीं पाएगा। ऐसे अवसर पर सुरा महान व्यक्ति के भीतर कुछ करने का जोश भरती है और किसी भी तरह का निर्णय लेने की ताक़त पैदा करती है। किंतु आज इस आत्मकथा को लिखते हुए मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि हमारी आत्मा इतने अधिक अनैतिक कर्मों का बोझ नहीं सह सकती, ऐसे में वह हमारा साथ छोड़ कर कुछ दिनों के लिए चली जाती है। तब आत्मा के बिना जीवित रहते हुए उस महान आदमी से लिपट यह सुरा और सुंदरी उसे और विवादित बना देती है।
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इसके आगे बीस डालर खर्च कर के ही आप पूरी पुस्तक पढ़ सकेंगे। इस विवरण के बाद यदि हमारे पाठकों के भीतर पूरी पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा पैदा हो गई हो और वे स्वयं को छला हुआ या प्यासा महसूस कर रहें हों तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

24 अक्तूबर 2006