हास्य व्यंग्य

फ़ैशन शो में गिरते परिधान
- शास्त्री नित्यगोपाल कटारे


मैंने हमेशा की तरह बिना किसी काम के विपन्नबुद्धि को फ़ोन किया तो उसने यह कहकर फ़ोन रख दिया कि मैं इस समय अत्यंत व्यस्त हूँ। मेरी चतुर बुद्धि चकराई। मुझे अच्छी तरह मालूम था कि विपन्नबुद्धि पिछले तीन महीनों से नौकरी से सस्पेंड है। घर के लोग उसे किसी काम का नहीं मानते, मुझे छोड़कर और कोई उससे बात भी नहीं करना चाहता। फिर आख़िर यह व्यस्त किस काम में है? वह तो हमेशा से नालायक होने का सुख भोगता रहा है और आज अचानक इतना व्यस्त कि बात करने की भी फ़ुरसत नहीं? मुझसे रहा नहीं गया, सोचा -हो सकता है पत्नी ने खाना बनाने या बरतन माँजने की ज़िम्मेदारी डाल दी हो, या फिर सचमुच ही कोई चमत्कार हो गया हो, जो इतना मन लगाकर कोई रचनात्मक कार्य करने लगा हो।

जो भी हो उसे घर जाकर रंगे हाँथों ही पकड़ना चाहिए। मैंने आव देखा न ताव पहुँच गया उसके घर। वहाँ विपन्नबुद्धि टी.वी.पर प्रसारित होन वाला फ़ैशन शो देख रहा था। यही उसकी व्यस्तता का कारण था। स्क्रीन पर बारी-बारी से सुंदरियाँ नहीं के बराबर वस्त्रों से आवृत एक-एक करके दुस्साहसी अंदाज़ में निकली जा रहीं थीं। उनके चेहरे पर बड़ी ही संतुष्टि के भाव थे जैसे वे कोई बहुत बड़ा राष्ट्रीय कार्य संपन्न कर रहीं हों। मैंने इतनी तन्मयता से किसी दृश्य को देखते हुए विपन्नबुद्धि को पहली बार देखा था।

मैंने कहा, "विपन्नबुद्धि! क्या तुम भी ऐसे नए फ़ैशन के कपड़े पहिनने का विचार कर रहे हो? या कि अपनी पुत्री के लिए ये वस्त्र ख़रीदना चाहते हो?"
विपन्नबुद्धि सुनकर एकदम भड़क उठा, "कैसी वाहियात बात करते हो? भला इतनी अजीब ड्रेस कोई शरीफ़ आदमी पहन सकता है? और कोई भला बाप अपनी बेटी को यह वेशभूषा खऱीद सकता है? तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बात कहते हुए?"
मैंने अपना बचाव करते हुए विपन्नबुद्धि को समझाया, "भाई! ऐसी बात नहीं है। वह तो तुम्हें इस फ़ैशन शो को इतने ध्यान से देखने के कारण सोचा - हो सकता है तुम्हें भी नए ज़माने के प्रगतिवादी वस्त्रों की हवा लग गई हो, तभी तो तुम सब काम छोड़कर इस शो को ऐसे देख रहे हो जैसे वैज्ञानिक लोग अंतरिक्ष शटल का सफल परीक्षण कंप्यूटर पर देखते हैं।"
"नहीं यार! मैं तो इसलिए इतने ध्यान से देख रहा था कि पिछले दिनों ऐसे ही शो में एक सुंदरी के वस्त्र ही रास्ते में गिर गए थे, जिसे टी.वी. वाले बार-बार दिखा रहे हैं। अब तो मैं ही क्या देश के सभी लोग आँख गड़ा कर इस चैनल को देख रहे हैं। सिर्फ़ परिधान को धारण करना ही कोई विशेष बात नहीं, उसको पहनना, उतारना और गिराना भी एक कला है।" विपन्नबुद्धि ने टी.वी. देखने के औचित्य को सिद्ध करते हुए कहा।
हमने कहा, "वह तो एक दुर्घटना मात्र थी, जो एक बार घट गई। अब बार-बार थोड़े ही ऐसे वस्त्र गिरेंगे? अब तो और सावधानी से पहने जाएँगे। सभी माडल सुंदरियाँ और सतर्क हो जाएँगी। अब तो यह संभावना बिल्कुल ही नगण्य हो जाएगी।"
"अरे नहीं साहब! कहाँ की बात कर रहे है? यह घटना कोई अप्रत्याशित थोड़े ही थी। यह तो सब सोची समझी रणनीति है। आजकल यही तो आधुनिक व्यवसायिक तकनीक है। आप बिज़नेस क्या समझें? अब बिना ऐसी दुर्घटना के ये शो चल ही नहीं सकते। पहले भी इस तरह की घटनाएँ घटती रही हैं। जिनके साथ ये घटनाएँ घटी वे सब अभिनेत्रियाँ बन चुकी हैं। रातों रात माडलिंग की दुनिया में उनकी कीमत आसमान छूने लगी है और आयोजकों की तो जैसे चाँदी हो गई है।
"इन घटनाओं से उनका नाम एकाएक चमक गया है। अब तो इतनी सुंदर दुर्घटनाओं के अवसर तलाश किए जाएँगे। अब तो लोग डिज़ायनरों से पूछेंगे-क्यों जी? कैसी ड्रेस बनाते हो जो कभी गिरती ही नहीं? इस तरह के फ़ैशन शो नगरों-नगरों में आयोजित किए जाएँगे और किसके कपड़े कितने और किस तरह से गिरते हैं यही उनकी उत्कृष्टता की पहचान होगी। आप देखते तो जाइए।" विपन्नबुद्धि ने हमें समझाया।
मैंने कहा- "वह तो ठीक है विपन्नबुद्धि! पर मुझे तो डर है कहीं यह जागरूक मीडिया और तुम जैसे जागृत दर्शक मिलकर ऐसी दुर्घटनाओं को इतना महिमा-मंडित मत कर देना कि ये फ़ैशन शो सड़कों पर आ जाएँ और जगह-जगह ये तथाकथित दुर्घटनाएँ घटित होना आम बात हो जाए। तब ये फ़ैशन हमारी संस्कृति को रसातल में ले जाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए समझो और त्यागो इन चैनलों का मोह और बचा लो अपने बच्चों को गड्ढे में गिरने से। नहीं तो फिर पछताने अलावा कुछ हाथ में नहीं रहेगा।"

1 मई 2006