हास्य व्यंग्य

गोलगप्पे में शराब
-मनोहर पुरी


'हाऊ स्वीट' उसने एक करारा गोल गप्पा मसालेदार पानी सहित गटकते हुए अपने होठों को चटकारे की मुद्रा में रगडते हुए कहा। एक लंबी-सी हिचकी का मधुर संगीत वातावरण में फैल गया। हिचकी से उसके होंठ खुल गए। जैसे दो प्रेमियों के सार्वजनिक आलिंगन को भारत में रहने वाला ज़ालिम ज़माना स्वीकार नहीं करता, वैसे ही मसाले और लिपस्टिक से रचे बसे होठों के इस नमकीन मिलन को हिचकी ने पसंद नहीं किया। हिचकी रूपी भयंकर गोले की भारी आवाज़ जब उसके नाजुक गले से निकली तो मैंने घबरा कर उसकी ओर देखा।

हिचकी के झटके से झटका खा कर जब उसकी सुराहीदार गर्दन ऊपर उठी तो गोल गप्पे का मटमैला पानी उसके हलक से नीचे उतरता दिखाई दिया। मैं समझ गया कि बेगम नूरजहाँ के गले से शर्बत का रंग कैसे बाहर दिखाई देता होगा। गोल गप्पे के कमाल से उसकी आँखों में गुलाबी डोरे तैरने लगे थे। गंगा यमुना अपना बाँध तोड़ कर बह निकलने वाली ही थीं। उसने अपना मुँह थोड़ा-सा घुमा कर मेरी नज़रों से दूर कर लिया। लगा तेज़ मसाले से उसके कानों में अवश्य ही सनसनाहट हो रही होगी क्योंकि उसके हीरे जड़ित कुंडल किसी बेचैन पंछी की तरह से फड़फड़ा रहे थे।

उसने धीरे से सिसकारी भरते हुए गोल गप्पे खिलाने वाले को कहा, भैया! सोंठ थोड़ा ज़्यादा भरना, ज़रा मसाला भी थोड़ा-सा और तेज़ करना। भारतीय मसालों के तीखेपन पर मैं वाह कह उठता, कि मुझे फिर से "हाऊ स्वीट" सुनाई दिया।
अनायास ही मेरे मुँह से निकला, "मैडम यह तीखे, नमकीन अथवा खट्टे तो हो सकते हैं, 'स्वीट' तो हरगिज़ नहीं। बार-बार आपका 'हाऊ स्वीट' कहना कम से कम अपने गले से तो नहीं उतरा। वैसे भी आपकी पतली हालत देख कर यह तो कतई नहीं लगता कि मामला कहीं कुछ मीठा-मीठा भी है।" मैंने अपनी मिष्ठान प्रिय जिह्वा को अपने रुखे-सूखे होंठों पर फिराते हुए कहा।
"आप नहीं समझेंगे भाई साहब," उसने आँखों में एक विशेष चमक पैदा करते हुए कहा, "मैं 'इंडियन' नारी न होती तो 'यूरेका' 'यूरेका' चिल्लाती हुई-गोल गप्पे का यह पात्र हाथ में लिए हुए भाग लेती यहाँ से वाणिज्य मंत्रालय तक।"
मैं सिर से पाँव तक प्रश्न चिह्न बन गया।
मेरी इस पतली हालत पर दया करते हुए वह बोली, "आप नहीं जानते कि 'इंडियन साल्टीज़' का कितना बड़ा बाज़ार है 'फोरेन' में और कितनी 'बिग' संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं इस छोटे से नन्हें-मुन्ने और प्यारे से गोल गप्पे में। इसे आप मामूली गोल गप्पा न समझें, पूरी दुनिया में धूम मचाने की क्षमता है आपके इस भारतीय 'पेय-दए-खाद्य' पदार्थ में। 'आई मिन ड्रिंक-दए-फूड़' आप समझे ना।" उसने झेंपते हुए कहा, "कभी-कभी न चाहते हुए भी यह 'इंडियन' भाषा हिंदी मुँह पर आ जाती है। 'आय एम सॉरी'। हाँ तो मैं यह कह रही थी की यह इस देश का 'मोनोपली आईटम' है। 'मल्टीनेशनल प्रोडक्ट' बनने की पूरी-पूरी संभावनाएँ हैं इसमें।"
फिर बोली, "कितने शर्म की बात है कि आज तक यह बात किसी के दिमाग़ में नहीं आई। 'वट ऐ नेशनल शेम' आई भी तो मेरे इस ठस्स 'माइंड' में। इसी को कहते हैं भाग्य का सितारा चमकना-इसका 'क्रेडिट' मुझे ही मिलना था न। भाग्य का 'डोर' क्या कहते हैं दरवाज़ा मुझ पर ही खुलना था न।"

मैं अवाक उसके नाक से बहते हुए पानी को देख रहा था जिसे वह अपनी अत्यंत नाजुक उँगलियों में लपेटे हुए नन्हें से रुमाल द्वारा बार-बार साफ़ कर रही थी। नाक का नुकीला भाग तोते की चोंच की तरह से लाल हो उठा था। मुझे लगा जैसे किसी ने लाल मिर्च को उसके होठों के ऊपरी हिस्से पर चिपका दिया हो। या फिर उसने लिपस्टिक को होंठों की बजाय नाक पर लगा लिया हो।
अपनी ही धुन में मगन वह जैसे स्वयं से बात कर रही थी। मेरी हस्ती तक को भुला दिया था जैसे उसने।
बोली, "धूम मच जाएगी, जब गोल गप्पा 'पारलर्स' की 'चेन' मैं अमरीका और यूरोप के नगर-नगर में खुलवा दूँगी। वाह! कैसा नज़ारा होगा जब बड़ी-बड़ी मोटर गाड़ियों की कतारें मेरे द्वारा स्थापित गोल गप्पों के 'स्टालों' के बाहर लगी अपनी बारी आने का इंतज़ार करेंगीं। पर्यटकों को इस भारतीय व्यंजन का दर्शन करवाने के लिए पर्यटन विभाग द्वारा टिकट लगाई जाएगी। पर्यटकों से भरी बसों की लाइन लग जाएगी। भारत की तरह पश्चिमी देशों में लाइन तोड़ना गौरव की बात नहीं समझी जाती जिसका मुझे भरपूर लाभ मिलेगा। लंबी लाइनों की लंबाई नापना भी काफ़ी सरल होगा। गोल गप्पों के लिए लगी लंबी-लंबी लाइनें सहज ही मेरा नाम 'गिनिज़ बुक आफ वर्ल्ड रिकाडर्स' में दर्ज कराने में सक्षम होंगीं। इस बात के सर्वेक्षण कराए जाएँगे कि रार्ष्ट्रीय राजमार्गों की तुलना में ये लाइनें कितनी अधिक लंबी रहीं। सभी स्थानों की लंबाई का कुल योग किसी भी देश की सड़कों की लंबाई से अधिक होगा ही इसमें तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं है। भारत की तो गिनती ही क्या है जहाँ राजमार्गों के नाम पर नक्शों में दो चार पगडंडियों को दिखा दिया जाता है।"
"यदि मेरी योजना की प्रगति में कोई अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र आड़े नहीं आया तो शीघ्र ही दुनिया की सड़कों पर 'ड्राईव इन गोल गप्पा मोटल्स' दिखाई देने लगेगें तब आप को पता लगेगा कि इस पेय-कम-खाद्य का क्या महत्व है। इस गोल और खोखली चीज़ में कितना ठोस तत्व है।" वह अपनी ही धुन में मगन हो गई थी जैसे।
मुझे कुछ बोलने का अवसर दिए बिना ही उस सुंदरी ने अपने नयन चारों ओर घुमाए और बोली, "इसमें कितनी संभावनाएँ छिपीं हैं जिन्हें हमारे पूर्वजों ने बेकार ही जाने दिया। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपनी प्रतिभा को पहचानते ही नहीं। पहचान लें तो मानते नहीं। जैसे भारतीय डाक्टरों ने अपनी विद्वता की धूम पूरे 'वर्ल्ड' में मचा दी है, वैसे ही ये गोल गप्पे अपने स्वाद का सिक्का जमा देगें। निश्चित रूप से आदत न होने के कारण इनसे कुछ रूढ़िवादी विदेशियों का गला ख़राब हो सकता है। परंतु अपना तो उसमें भी लाभ ही लाभ है। गोल गप्पों से उत्पन्न बीमारियों के विशेषज्ञ स्वाभाविक रूप से भारतीय डाक्टर ही होंगे। इससे उनकी जमी जमाई 'प्रैक्टिस' में चार-चाँद लग जाएँगे। किसी भी अमीर व्यक्ति के 'केस' को 'इंडिया रैफर' किया जाएगा। भारतीय हस्पतालों में पश्चिमी देशों से आए हुए मरीज़ वैसे ही दिखाई देंगे जैसे लंदन के 'एयरपोर्ट' के फ़र्श पर सोये हुए 'एशियन'। कितना ज़ोरदार धंधा जम जाएगा 'मेडिकल कन्सलटेंसी' का। विदेशी मुद्रा से हमारे देश के बैंकों की बोरियाँ भर जाएँगीं। कई नेताओं की हर्षद के सहारे पीढ़ियाँ तर जाएँगे।

'लहर' वालों ने बीकानेरी भुजिया के निर्यात की योजना कोई यों ही नहीं बना ली-बहुत समझ बूझ कर और 'मार्किट सर्वे' करने के बाद ही बनाई है। भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उनका ध्यान गोल गप्पों की तरफ़ नहीं गया, नहीं तो 'सैमी ड्रिंक' के इस अछूते क्षेत्र में उनका मुक़ाबला करना मेरे लिए ज़रा कठिन ही पड़ता। अमरीका वाले भी न जाने किस मिट्टी के बने हैं। कंबख़्त नीम, तुलसी, हल्दी और बासमती तक का 'पेटेंट' करवा रहे हैं। गोल गप्पों का करवा लेते तो मैं क्या करती, तब-इस मसालेदार पानी को किस पात्र में भरती।"
मैंने कहा, ''परंतु अभी तक मीठे गोल गप्पे अर्थात 'हाऊ स्वीट' वाली बात तो मेरी गंजी खोपड़ी के ऊपर से फिसलती चली जा रही है, थोड़ी चाशनी मिलाओ तो बात बने, बिना बाँस का तंबू कहीं तो थोड़ा बहुत तने।''
'हैं न पापा बुद्धू' के अंदाज़ में वह बोली, आप भी भाई साहब निरे बुद्धू हैं, आयात निर्यात के क्षेत्र में सिर्फ़ कद्दू हैं। ये तो मैंने अपने भीतर छिपी 'हैप्पीनेस' का इज़हार किया था, कुछ-कुछ वातावरण को अपने मन के मुताबिक़ तैयार किया था। वास्तव में मैं मन ही मन गोल गप्पों के भारी निर्यात के आर्डरों का लेखा-जोखा लगा रही थी, सोच रही थी दुनिया तेज़ी के साथ इक्कीसवीं सदी में पहुँच गई है, 'पैकिंग' के क्षेत्र में नई-नई खोजों से क्रांति आ रही है। सभी जगह महसूस की जा रही है काग़ज़ की कमी, पर्यावरण से उड़ती जा रही है कुदरती नमी। प्लास्टिक के कूड़े से हर विकसित देश बुरी तरह से परेशान है। विकासशील देशों की भले ही आज भी प्लास्टिक ही शान है। ऐसी अवस्था में यदि व्हिस्की को गोल गप्पों में भर कर 'सर्व' किया जाए तो विश्व के शराबखानों और 'पबों' में एक ऐसी मसालेदार क्रांति आ जाएगी जो 'हरित' और 'श्वेत' क्रांति के छक्के छुड़ा देगी और मुझे करोड़पति ही नहीं अरबपति बना देगी।
आख़िर इसी तर्ज़ पर ही तो 'साफ्टी कोन' का प्रचलन हुआ था। काग़ज़ तथा प्लास्टिक के कप में आईसक्रीम भरने का झंझट समाप्त करने को ही हुआ था इसका प्रयास, गोल गप्पे से मुझे उससे कहीं अधिक है आस। जब मेरे 'पार्लर्स' में गोल गप्पों में भर-भर कर बेची जाएगी शराब, तो विश्व बंधुत्व और लड़ाई का कहाँ रह जाएगा हिसाब। अंतर्राष्ट्रीय सदभावना की एक अनोखी मिसाल होगी, मेरा मतलब है 'इंटरनेशनल को-आर्डिनेशन' का तैयार माल होगी। भारतीय संस्कृति के प्रतीक गोल गप्पे और पश्चिमी सभ्यता की निशानी शराब-दो संस्कृतियों का अदभुत मिश्रण होगा लाजवाब। अंतर्राष्ट्रीय सदभावना के लिए मुझे मिलेंगे ढेरों ढेर ईनाम, दुनिया के कोने-कोने में होगा मेरा नाम। हो सकता है नोबल ही आ गिरे झोली में, भारत रत्न तो मिला ही समझो सिर्फ़ ठिठोली में।

गोल गप्पे के कसे बदन में लहराती इठलाती शराब, सुरा सुंदरी के रूप में जब व्यक्ति के मुँह में प्रवेश करेगी जनाब, तो बदन कैसा सनसनाएगा, उसका अनुमान आप सरीखा मिष्ठान्न प्रेमी पोंगा पंडित कौन-सा लड्डू खाकर लगाएगा। आप तो आज तक चाट पकौड़ी से आगे जाकर जी नहीं सके, गोल गप्पे में कोका कोला तक भर कर पी नहीं सके।''
''विदेशों में शराब के साथ 'साल्टीज़' की कितनी माँग है, यह आप तब जानेगें जब मेरा यह 'टू-टू-वन' धूम मचा देगा, घर-घर को अपना दीवाना बना देगा। शाम होते ही जैसे हमारे देश के महानगरों की युवतियाँ चाट की दुकानों के बाहर मधु की मक्खियों की तरह से भिनभिनाने लगती हैं, बिना पिये ही डगमगाने लगती हैं। वैसे ही 'गोल गप्पा बार' लोगों को बिना आवाज़ के बुलाएँगे और हर विदेशी को मदमस्त बनाएँगे। भारतीय 'पोटेटो', पटेल्स और मोटल्स की पंक्ति में गोल गप्पों यानी 'गोपल्स' का नाम भी जुड़ जाएगा, विदेशी नमकीन का हर रंग उड़ जाएगा। विदेशी बाज़ारों में भारतीय गोल गप्पों की 'सेल' के जब होंगे बड़े-बड़े अनुबंध, कैंब्रिज और आक्सफोर्ड में लिखे जाएँगे इस पर शोध प्रबंध। तब आप जानेगें मैंने इसे क्यों चाहा था, मिर्च से जल रहे मुख से हाउ स्वीट कैसे कहा था।''
''इस समय भले ही मसालों से सनसनाते मेरे आँख कान भट्ठी की जगह भट्टे हो रहे हैं, इसकी खटाई से दाँत खट्टे हो रहे हैं। छाती जल-जल कर भी कुछ तौल रही है, अपने दिल से कुछ और ही बोल बोल रही है। भविष्य की कल्पना की मिठाई मेरे मुँह में मिश्री-सी घोल रही है। उपभोक्ता उद्योग के क्षेत्र में गोल गप्पे का उज्ज्वल भविष्य मैं सामने दीवार पर पढ़ रही हूँ, 'आई मिन राईटिंग ऑन द वाल' की सुखद सीढ़ियाँ चढ़ रही हूँ। विश्व अर्थ व्यवस्था का केंद्र बनकर ये करेगा कमाल, इसका हर चहेता इसी सदी में होगा माला-माल। अभी तो लगता है ये छोटा सा गोल गप्पा, बाद में हर विदेशी नोट पर इसी का होगा ठप्पा।''

उसने अपना वाक्य किया पूरा, फिर थोड़ा-सा मुझे घूरा। भविष्य की ओर टकटकी लगाए एक गोल गप्पा मुझे थमाया, और दूसरा होंठों के भीतर मुँह में दबाया। बोली, ''चाहते हो यदि इक्कीसवीं सदी में जाना तो समझ लो वह होगा गोल गप्पों का ज़माना। अभी से 'पेटेंट' की अर्ज़ी लगवाऊँगी, मेरा साथ दोगे तो एक 'सोल एजेंसी' आपके नाम भी करवाऊँगी। जो दिया है वह गोल गप्पा खाओ, फिर मुझसे 'पार्टनर' वाला हाथ मिलाओ। दोनों मिलकर करेंगे मोटा धंधा, ज़माना कल भी था और आगे भी रहेगा अंधा। जो इसका लाभ उठाता है, वही कुछ धन दौलत कमाता है।''
उसने अपना सारा आर्थिक दर्शन मुझे संक्षेप में समझाया और हमने चीयर्स के स्थान पर 'हाऊ स्वीट' कहकर एक-एक और गोल गप्पा मुख द्वार की ओर बढ़ाया।

1 दिसंबर 2006