हास्य व्यंग्य

कहाँ रहती हो तुम जाना
-समीर लाल 


आज सबेरे जब टहल कर लौटा तो वो नदारत थी।
बड़ी कोफ़्त होती है, जब मन किया आ गई, जब मन किया-ग़ायब। अभी कुछ साल पहले की ही बात है, हरदम घर में रहती थी। कभी-कभार कहीं जाना भी हुआ तो थोड़ी देर को गई और लौट आई, उस पर भी, अधिकतर तो बता कर ही जाती थी। चुलबुली शुरू से थी मगर बस आँख मिचौली टाइप शरारत करती थी। इधर कुछ सालों से व्यवहार एकदम बदल-सा गया है। एकदम उदंड, लापरवाह और आवारगी की हद तक स्वच्छंदता। पूरे-पूरे दिन ग़ायब रहना। फिर कुछ देर को आ गई और जब तक हम कुछ पूछे-ताछे, फिर ग़ायब। ना बच्चों की चिंता, ना उनकी पढ़ाई की फ़िक्र।

उसके इस स्वभाव से कभी भी आना और फिर कभी भी चले जाना-उस पर भी जाना अधिक और आना कम, हमने उसका नामकरण ही 'जाना' कर दिया है। वो इसे प्यार वाला 'जानू' टाइप समझती है और खुश होती है। ख़ैर वो क्या समझे उससे मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता है।

टहल कर लौटता हूँ थका हारा तो लगता है उसकी कमी ज़्यादा खलती है। खैऱ, वो नदारत थी और कोई मैसेज भी नहीं था कि कब तक आएगी, सो खिड़की, दरवाज़े खोल कर बैठ गया। बाहर किरण खड़ी थी। दरवाज़ा खुलते ही मुस्कराई और घर के अंदर आ गई। किरण बहुत अच्छी लगती है मुझे। दिन भर साथ बिताता हूँ। बच्चों का भी खूब ख़याल रखती है। उनके नहाने से ले कर खाने और पढ़ने तक साथ-साथ रहती है। सुबह-सुबह अपने बापू के साथ आ जाती है और शाम को जब उसके बापू अपने काम निपटा कर लौटते हैं, तो वो भी साथ वापस। यही उसका रोज़ नित का नियम है। कभी भी बापू के जाने के बाद तक नहीं रुकी। उसके बापू तो बहुत व्यस्त रहते और वो अपना सारा समय मेरे साथ बिताती। इस बीच कभी-कभी जाना अगर कुछ देर को आ भी जाती, तो भी वो किरण के रहने का बुरा नहीं मानती। अब मानती भी क्यों। उसका सारा दायित्व तो लगभग किरण ही निभा रही थी, कम से कम दिन में तो।

इधर मैं देख रहा था कि गर्मियों मे तो जाना ज़्यादा ही ग़ायब रहने लगी है। कभी-कभी तो दो-दो तीन-तीन दिन तक लगातार। लोकलाज के डर से रिश्तेदारों से भी कुछ कह नहीं सकते और ना ही उन्हें अपने घर आने की दावत दे सकते हैं कि कहीं वो भी जाना के इस रवैये को ना जान जाएँ। इसी के चलते सबसे कटते चले जा रहा हूँ।
आज मौसम में बदली छाई थी। जाना तो कल रात से ही नदारत थी। मैं सुबह जल्दी उठ गया था। किरण का इंतज़ार मन में लग गया था मगर आज तो वो भी देर से आई। कुछ बुझी-बुझी-सी थी। बदली जब आकाश में छाती है, तो मैंने देखा है अक्सर किरण उदास सी दिखने लगती है, ना वो हमेशा वाला तेज ना चंचलता। बस आई और धीरे से बरामदे में बैठ गई। मैंने दरवाज़ा खोला फिर भी अंदर ना आई। अब उसके सानिध्य का लोभ संवरण मेरे लिए संभव ना था तो मैं भी वहीं कुर्सी खिसका कर उसके पास बैठ गया। वो उदास बैठी रही, मैंने भी कारण जानने के लिए कुरेदना अच्छा नहीं समझा। सोचा वक्त के साथ मन हल्का हो जाएगा तो खुद ही ठीक हो जाएगी। सामने चाय की गुमटी वाला ट्रांज़िस्टर पर एक गाना फुल स्पीड में बजाये हुए है।
"पंछी बनो उड़ते फिरो, मस्त पवन में"
मुझे लगा कि जैसे जाना के बारे में जान गया है और मुझे चिड़ा रहा है। मैं वैसे भी शांत स्वभाव का आदमी हूँ ख़ास तौर पर छोटे लोगों से जो गाली-गलौज पर उतर आते हैं या फिर जो हमसे ताकतवर होते हैं। मैंने चाय वाले को आवाज़ लगाई और चाय और मंगोडे मँगवा लिए। किरण ने कुछ नहीं खाया और कुछ घंटे वहीं बरामदे में बिताने के बाद आज रोज़ की अपेक्षा जल्दी लौट गई। मैं भी भीतर लौट आया। मौसम में उमस होने लगी थी, जाना अब भी ग़ायब थी, रात घिर आई और मैं छत पर आकर टहलने लगा। फिर वही दरी बिछा कर लेट गया और ना जाने कब नींद लग गई। एकाएक आधी रात गए नींद खुली तो नीचे जाना आ चुकी थी। मैं आख़िर पूछ ही उठा कि कहाँ नदारत थी इतने समय तक। कहने लगी सोनिया जी आई थीं, उन्हीं की सेवा में लगी थी और अभी वापस गईं हैं सो थोड़ी देर को आ गई हूँ फिर जाना है, कल दुपहर तक तो मुख्य मंत्री जी वगैरह यहीं पर हैं, उन्हीं के साथ रहूँगी। मुझे इसके राजनीतिज्ञों के साथ संबंधो पर शुरू से ही नाराज़गी रहती थी सो गुस्से में मैं वापस छत पर आकर सो गया और जो होना था सो हुआ। सुबह उठा तो जाना जा चुकी थी। नेताओं से उसे विशेष लगाव है, ख़ास कर मंत्रियों से, वो जहाँ भी होते हैं, जाना ज़रूर साथ देती है, भले हम जैसे चाहने वाले उसके इंतज़ार में तड़पते रहें। ये मंत्री भी खुद की वाली तो घर छोड़ कर निकलते हैं, वो तो कहीं जाती नहीं है और हमारी वाली वो जहाँ जाएँ उनकी सेवा में लगी रहती हैं। शायद यही हमारी किस्मत है। हम भी चाहने वाले हैं, अक्सर गुनगुना उठते हैं :
'हम इंतज़ार करेंगे तेरा क़यामत तक,
खुदा करे कि क़यामत हो और तू आए।'

24 सितंबर 2006