हास्य व्यंग्य

रहस्य राम के वनवास का!
- जवाहर चौधरी


महल के बाहर रिटायर हो चुके लक्ष्मण बैठे सोच रहे थे कि दिन में तारे क्यों दिखाई नहीं देते हैं! कल और परसों भी वे यही सोच रह थे। आदमी अकेला हो और बैठे रहने को विवश हो तो सोचने के अलावा कर भी क्या सकता है। यहाँ राजधानी में, सीमेंट के घने जंगल में बहुत से संत-महंत, ज्ञानी-ध्यानी, चिंतक-विद्वान वगैरह हैं जिनसे फ़ोन पर चर्चा कर ली जाए तो इस तरह के किसी भी प्रश्न का उत्तर मिल सकता है। लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं। अगर इसका उत्तर मिल गया तो आगे के दिनों में टाइमपास की भयानक समस्या खड़ी हो जाएगी। प्रश्न प्राय: पत्थर की तरह होते हैं जिन पर बैठ कर बड़े-बड़े विद्वान आसानी से जीवन गुज़ार देते हैं। विद्वानों ने भाषा और साहित्य के प्रश्न-पत्थरों से आलीशान कोठियाँ बनावाईं और खूब बनवाईं। यह बात अलग है कि अब भी ये कोठियाँ एक प्रश्न हैं। किसी विधा की धूप खिले या किसी शैली की हवा चले, अपनी कोठी का वास्तु ठीक करा कर सुख-समृद्धि को वे अपने पक्ष में किए रहते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि नींव में लगे प्रश्न-पत्थर वहीं बन रहें। प्रश्न कोठी का रॉ-मटेरियल हैं। प्रश्न कोठी का अस्तित्व हैं। इनकी धुलाई-पोंछाई हो सकती है, रंग-रोगन हो सकता है लेकिन उत्तर नहीं ढूंढ़े जा सकते। उत्तर प्रश्न के लिए 'पॉयज़न' है। इस समय भी प्रश्न लक्ष्मण के लिए समय काटने का प्रिय औज़ार हैं।

"इस्क्यूज़ मी सर।" लक्ष्मण ने पलट कर देखा, एक सुंदरी सामने है। अचानक एक कौंध-सी हुई और दिन में तारे न दिखने का प्रश्न ग़ायब हो गया। प्रश्न के विकल्प में दूसरा सुंदर प्रश्न सामने था। चौंकते हुए लक्ष्मण अतीत में खो गए -"सुंदरी! क्या तुम सूर्पणखा हो?"
"नहीं सर, मैं एक विदेशी कंपनी की देशी प्रतिनिधि हूँ। वैसे मुझे विश्वास है कि अब तक आपकी नाक-कान काटने की आदत ख़त्म हो चुकी होगी?" कहते हुए सुंदरी ने अपने होंठ फैला दिए।
"उस दिन तो अकेलेपन के कारण मुझे खीझ हो गई थी सूर्पणखे। अ़ब तो प्रजातंत्र है, मानवाधिकार है, महिला आयोग है, मीडिया वाले हैं, तैंतीस प्रतिशत आरक्षण की भी चर्चा है। आओ, डरो नहीं, पास बैठ जाओ प्रिय सूर्पणखे।"
"सर, मैं सूर्पणखा नहीं विदेशी कंपनी की।"
"सूर्पणखा भी तो विदेशी थी, तुम निश्चिंत रहो अब हमारा वो आचरण नहीं होगा।" लक्ष्मण ने आश्वस्त किया। "हाँ, आजकल विदेशी कंपनियों की बाढ़-सी आई हुई है!"
"रामराज्य है, रामभरोसे सरकार है, आप कहें तो राम-वंदना गाऊँ? क्या आप पसंद करेंगे?"

सुंदरी ने एम टीवी की वीजे की तरह भयानक अदा के साथ गाने के लिए मुँह खोला और अपनी दाढ़ें दिखाईं।
"नहीं नहीं, रहने दो। सूर्पणखे, ये बताओ कि क्या तुम मुझे विवाह का प्रस्ताव देना चाहती हो?" लगा जैसे लक्ष्मण अपनी पुरानी भूल सुधारने का मन बना रहे हों।
"मेरे सर्विस कांट्रेक्ट में ऐसा कुछ नहीं है, सर!"
"यदि किसी तरह कांट्रेक्ट हो जाए तो क्या तुम विवाह कर सकती हो?"
"हाँ, अगर आदमी काफ़ी 'रिच' हो तो सोचा जा सकता है। लेकिन आप! आप विवाह क्यों करना चाहते हैं?"
"समय नहीं कट रहा सूर्पणखे। तुम्हें नहीं मालूम सिर्फ़ यादों और प्रश्नों के सहारे समय काटना कितना कठिन है। किस्मत! इन दिनों तो मैं 'रिच' भी नहीं हूँ।" लक्ष्मण विगलित हो गए।
"ऐसा है तो आप कुछ करते क्यों नहीं? मेरे पास ऐसे बहुत से प्रस्ताव हैं जिससे आपका समय कटेगा और आप काफ़ी सारा कमा भी लेंगे बैठे-बैठे।" सुंदरी ने विवाह के प्रस्ताव को डस्टबिन में डालते हुए कहा।

लक्ष्मण समझे नहीं कि यहाँ, सीमेंट के जंगल में बैठे-बैठे वे कौन-सा काम कर सकते हैं! मैथ्स में शुरू से कमज़ोर थे, हिस्ट्री याद होती नहीं, अंग्रेज़ी में 'ए' से ही प्राब्लम शुरू हो जाती है। ज़माना ऐसा आ गया है कि आदमी अंगूठा छाप हो या फिर खूब पढ़ा-लिखा, बीच वाले हमेशा दुखी रहते हैं। नीचे रह नहीं पाते, ऊपर पहुँचते नहीं। युद्ध में क्रोधित होने और तीर आदि चलाने के अलावा कुछ आता नहीं था। सकुचाते हुए उन्होंने पूछा, "मैं क्या काम कर सकता हूँ?"
"आप राजमहल के अंदर की बातें हमें बता सकते हैं देखिए मंथरा जबरन में मारी गई। उस दलित का कोई दोष नहीं था। आप राम के वनवास का असली रहस्य उजागर कर सकते हैं राजा दशरथ की मौत पर से परदा भी उठा सकते हैं। ऐसे बहुत से काम हैं जो आप कर सकते हैं।"

सुंदरी की स्किन टाइट जीन्स और लो नेक टॉप के बावजूद लक्ष्मण प्रश्न सुनकर चौंके, "ये कैसा काम है? इसे काम कहते हैं? राम जी के वनवास का कारण जगजाहिर है और पिताश्री राजा दशरथ के देवलोकगमन का कोई रहस्य नहीं है। बच्चा-बच्चा व गाँव-गाँव इस बात को जानता है। तुम्हारा मतलब क्या है सूर्पणखे? तनिक समझा कर कहो।"
"चौंकिए मत मिस्टर लछमना। सत्ता के आसपास जो भी घटित होता है उसमें रहस्य अनिवार्य रूप से होता है।"
"चलो माना, लेकिन उन रहस्यों का तुम क्या करोगी?"
"हमारा काम है रहस्यों को उजागर करना।"
"लेकिन रहस्य हो तो उजागर करोगी ना?"
"नहीं हो तो रहस्य बनाना भी हमारा काम है।" सुंदरी ने अपने लो-नेक को सफ़ाई से थोड़ा और 'लो' कर दिया।
लक्ष्मण को शंका हुई, "कहीं तुम मीडिया वाली तो नहीं हो सूर्पणखे?"
"सिर्फ़ मीडिया वाली नहीं, टीवी मीडिया वाली कहो' वैसे हमारे और भी बहुत से काम हैं।"
"तुम विवाह कर आराम से टाइम पास क्यों नहीं करती। इतना सारा काम. . .! अकेले. . .।"
"अकेले नहीं, हमारे बॉस हैं, वे भी काम करते हैं।"
"तुम्हारे बॉस! रावण?" लक्ष्मण की आँखें विस्मय से गोल हो गईं।
"रावण नहीं हैं। हाँ, रावण की तरह विद्वान ज़रूर हैं। आपने ईश्वर बावला का नाम सुना होगा?"
"ईश्वर बावला! वो चैनल वाला बावला? रावण के कारण तो सिर्फ़ लंका जली थी लेकिन इस बावले के कारण तो पूरा देश जल सकता है! त़ुम मुझे क्षमा करो सूर्पणखे। अगर विवाह करने का इरादा नहीं हो तो चली जाओ, चली जाओ।" नाक कान काटने वाले लक्ष्मण ने हाथ जोड़ दिए।

दूसरे दिन टीवी चैनल चीख रहा था, "लक्ष्मण ने राजमहल के रहस्यों को बताने से किया साफ़ इंकार। राम के वनवास से राजपरिवार की कलह हुई उजागर। दशरथ की मौत का रहस्य और गहराया। साज़िश में लक्ष्मण के शामिल होने की आशंका हुई प्रबल। राम और लक्ष्मण के समर्थकों में भारी तनाव, घमासान की तैयारियाँ शुरू शेयर मार्केट में चिंता, संघ-परिषद-दल हुए नाराज़, देखते रहिए मौत तक।

१ अक्तूबर २००६