हास्य व्यंग्य

सपनों का होम-रूम-थिएटर
—अशोक चक्रधर


सपने होते हैं टू टाइप्स के। एक ओपन आईज़ के, दूसरे क्लोज़्ड आईज़ के। ओपन आईज़ के सपने ज़्यादा ओपन किस्म के नहीं होते, क्लोज़्ड आईज़ के ज़्यादा ओपन होते हैं और ज़्यादा गोपन होते हैं। रात को सपने में जो कुछ हुआ, आप उसका पूरा बखान नहीं कर सकते, लेकिन खुली आँखों के सपने आप तत्काल बढ़ा–चढ़ा कर बता सकते हैं।
जो सोवत है सो सपना खोवत है,
जो जागत है सो सपना पावत है।

बंद आँखों के सपने थोड़ी देर याद रहते हैं, खुली आँखों वाले सपने ज़्यादा देर याद रहते हैं। बंद आँखों के सपनों के पीछे हमारे दिमाग़ का अचेतन ज़्यादा एक्टिव रहता है और खुली आँखों के सपनों में अवचेतन। चेतन मस्तिष्क चौंकन्ना रहता है वहाँ सपने आसानी से नहीं घुस पाते।
सवाल सवा रुपए का : चेतन क्या है?
जवाब चवन्नी वाला : ये चेतन कोई क्रिकेट का चेतन शर्मा नहीं है और न चेतन आनंद है सिनेमा वाला और न ही किसी फ़िल्म का छोटा चेतन है। ये चेतन वो बड़ा चेतन है जो हर आदमी के पास उसकी चेतना के साथ होता है।

सवाल एक रुपया तीस पैसे का : अवचेतन क्या है?
जवाब तीस पैसे वाला : अवचेतन है एक दलाल, बाहर की ज़िंदगी और इंसान की तमन्नाओं के बीच। अवचेतन है एक मलाल, कामनाओं और अतृप्ति की झंझाओं के बीच। अवचेतन है एक कमाल, सिकुड़े हुए यथार्थ और फैलती हुई कल्पनाओं के बीच। यही सचाई के भ्रम क्रिएट करता है जिन्हें सपने कहते हैं।. . .ये नहीं पूछोगे कि अचेतन क्या है! पैसे ख़त्म हो गए क्या?

सवाल एक रुपया इकत्तीस पैसे का : चलो बताओ अचेतन क्या है?
जवाब इकत्तीस पैसे वाला : अचेतन एक बिना छोर का जंगल है, अचेतन हमारी बर्बर आदिम इच्छाओं का खुला दंगल है, अचेतन अपनी नंगई में एक भूखा भाखड़ा–नंगल है, इसके फाटक न खुलें इसी में मंगल है।

सवाल महँगे होते हैं जवाब उनसे एक रुपया सस्ते क्योंकि प्रश्नकर्ता उत्तर से प्राय: पूर्ण संतुष्ट नहीं होते। सपने हमारी कामनाओं के प्रश्नों का उत्तर बनकर आते हैं। हम अपने सपनों से पूर्ण संतुष्ट नहीं होते, उन्हें पूरा करना चाहते हैं।
कई बार आदमी इतने सपने देखता है कि उनको पूरा करने के लिए कभी दाएँ भागता है कभी बाएँ, कभी आगे भागता है कभी पीछे। सपने बहुतायत में होते हैं लेकिन एक भी पकड़ में नहीं आता। फिर वे सपने चकनाचूर होने लगते हैं। ऐसी हालत में ज़रूरी ये है कि थोड़ा आराम कर ले भइया! एक साथ सारे के सारे पूरे नहीं हो सकते।

तेरे सपनों में मौसम ने खज़ाने किस कदर खोले,
अभी गर्मी, अभी सर्दी, अभी बारिश, अभी ओले।
खुली आँखों से सपने छलछला कर गिर नहीं जाएँ,
तू सपनों की हिफाज़त के लिए कुछ देर तो सो ले।

सपने मौसम के मुताबिक नहीं चलते। गर्मी में सर्दी के आते हैं, सर्दी में गर्मी के। बुढ़ापे में जवानी के आते हैं और जवानी में बुढ़ापे के। जवान फ़ौरन बूढ़ा हो जाना चाहता है ताकि लोग उनकी बात मानें। बूढ़े चाहते हैं कि किसी तरह से जवानी वापस हासिल हो जाए। च्यवनप्राश खाते हैं, टहलने जाते हैं, टहलते–टहलते सपने देखते हैं और सपने उनसे टहल जाते हैं।

कहते हैं कि सपने अतृप्त इच्छाओं से आते हैं। कोई चीज़ इच्छाओं में चुभ जाए तो कसकती है। फिर वह चीज़ आपके दिमाग़ के होमरूम थिएटर में कभी कलर्ड कभी ब्लैक एंड व्हाइट, कभी मोनो कभी मल्टिपल साउंड में, कभी एकायामी कभी थ्री डाइमेंनशल रूपों में आती है। दिल के ज़रिए दिमाग़ तीन सौ साठ डिग्री की स्क्रीन पर सपने दिखाता है। सपने ब्रह्मांड के पार जाने की क्षमता रखते हैं लेकिन ये नहीं मानना चाहिए कि सपनों के सिर–पैर नहीं होते। वे जड़–मूल विहीन नहीं होते। हाँ, ये मुमकिन है कि सपने के बीज से जो पेड़ निकले उसकी एक शाखा पर कुछ और लगा हो और दूसरी शाखा पर कुछ और—

दिल दिमाग़ में पड़ गया, इक सपने का बीज,
पेड़ उगा तो वहाँ थीं, तरह–तरह की चीज़।
एक शाख भिंडी लगी, दूजी पर अमरूद,
मोबाइल बंदर बने, वहाँ रहे थे कूद।
रिंग टोन हर फ़ोन की अलग सुनाई देय,
एक डाल डंडा पकड़, मुर्गा अंडा सेय।
मुर्गा गांधी बन गया, अंडा बन गया साँप,
फन को फैला देख कर, गांधी जी गए काँप।
एक शाख चौड़ी हुई, फैल गई अतिकाय,
सड़क बनी वह डाल फिर, बढ़त जाय बल खाय,
फ्रिज सोफा पहिये लगे, हुई भयंकर रेस,
चलते एक मकान से निकला सुंदर फेस।
तभी सामने से दिखे, बुलडोज़र के दाँत,
खून मकानों से बहा, बाहर निकलीं आँत।
दाँतों के आतंक ने, ऐसी मारी रेड़,
सपने के उस बीज में, लुप्त हो गया पेड़।

कवि सपने ही तो देखता है। अपने सपनों को शब्दों में रूपांतरित कर देता है तो कविता बन जाती है। फिर अपनी कविता से वह समाज को भी सपने दिखाता है। कोई कवि बिना सपनों के जीवित नहीं रह सकता। पाश ने कहा भी था कि सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना। साकार होने का इंतज़ार करने वाले सपने सदैव भविष्य के लिए होते हैं लेकिन अतीत से सबक लेकर अस्तित्व में आते हैं। यथार्थ नसीहत देता है कि आइंदा ऐसा मत करना वैसा मत करना, सपने राहत देते हैं –

ये मत करना वो मत करना,
आहत हुआ नसीहत से
भूतकाल के आईने में,
खड़ा हुआ आइंदा हूँ।
क्या बतलाऊँ सुविधाओं में
कैसे–कैसे ज़िंदा हूँ।
गुलदस्ते में फूल सजा कर
फूलों से शर्मिंदा हूँ।

कई बार हम अपने किए हुए कामों पर पाए हुए पुरस्कारों का या मिली दुत्कारों का विश्लेषण करते हुए आत्मालोचन करते हैं। हमने क्या किया, क्या लिया और क्या दिया। मुक्तिबोध कहते हैं – 'लिया बहुत ज़्यादा, दिया बहुत कम, मर गया देश अरे जीवित रह गए तुम।' ऐसी हालत में सिर्फ़ अपने लिए देखे हुए सुनहरी सपनों का ख़ास महत्व नहीं है। आप अपने सपनों को सहेज–सँवार कर रखें और उनमें दूसरों को भी शरीक करें मुहब्बत के साथ। अकेले का सपना कोई सपना नहीं होता, वो एक ढेले का सपना है। सपना वो अच्छा जो मेले का सपना हो, जिसमें सब इन्वॉल्व हों, जिसमें चरक चक्की चलें, गुब्बारे फूटें और खाने को कैंडी मिले। सपनों का पाट ज़्यादा चौड़ा हो।

इस माथे पर शिकनें लाखों, कुछ अपनी कुछ दुनिया की,
जिसके दोनों ओर नदी हों, उस तट का बाशिंदा हूँ।

बड़ा मुश्किल होता है कि दो नदियाँ दूर तक समानांतर बहें। आगे चलकर देर–सवेर संगम हो ही जाता है। लेकिन कोई ऐसा व्यक्ति हो जो दो निरंतर नदियों के बीच तट पर खड़ा हो। अंदर और बाहर की दो नदियों के बीच, व्याकुल। उसके सामने प्रतीक्षा की चुनौती होती है कि संगम कहाँ होगा, कैसे होगा, कब होगा। संगम के लिए व्याकुल एक सपना और एक सपनी, बातें कर रहे थे अपनी–अपनी -

एक सपना एक सपनी,
बातें करें अपनी–अपनी।
सपना अपनी सपनी को
यहाँ–वहाँ चूमे,
सपनी भी मदमाती सपने में झूमे।
अंग–प्रत्यंग उसका
सुबह की धूप के धान–सा
कभी आलाप कभी तान–सा
सा रे गा मा पा धा नी तक
निखर गया,
लेकिन अत्यधिक आकुल–व्याकुल सपना
स्वरों के आरोह–अवरोह की
रस–निष्पत्ति में
पहले ही बिखर गया।

सपनी अपने सपने को संजोए, सपना अपनी सपनी को न खोए। प्यार की डोर बनी रहे और प्रेम की पतंग तनी रहे। लेकिन, लेकिन, लेकिन, प्रेम तो जी अंधा होता है। होता है, फिर भी सपने सबसे ज़्यादा देखता है। जागृति में भी नींद की अवस्था रहती है। दिवास्वप्न रात्रि के सपने का–सा मज़ा देते हैं।

एक नौजवान सपने की हालत में खंभे से टकरा गया। हड़बड़ी में खंभे से बोला– सॉरी–सॉरी सर! माफ़ करना! चोट तो नहीं आई?. . .और खंभा मुस्करा दिया। बोला– जा बेटा जा! तेरा सपना मुझसे ज़्यादा मज़बूत है ज़्यादा लंबा है ज़्यादा ऊँचा है। तू अपनी पर अड़ा है और मैं धरती में गड़ा हूँ। चलता जा और भी खंभे मिलेंगे, कमज़ोर हैं बेचारे। उनकी सेहत का ध्यान रखकर टकराना, लेकिन मसालेदार सपनों के चक्कर में मेहनत के कसाले को मत भूल जाना। असली कसाले सच–सच!
नौजवान खंभे से बोला– थैंक्यू वैरी मच!

कहा सपने ने सपनी से– तू मेरी है, तू अपनी है,
मुझे ताउम्र तेरे नाम की ही माला जपनी है।
कहा सपनी ने– ओ! सपने, मुझे मत नाप माला से,
देख मिलजुल के अपनी ज़िंदगी कर्मों से– नपनी है।
सपन में गर तपन है ही नहीं, साकार क्या होगा,
सपन की उष्मा से ये तेरी सपनी भी तपनी है। सच!

नौजवान सपना अपनी सपनी से बोला– थैंक्यू वैरी मच!

16 मार्च 2006