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हास्य व्यंग्य

 

हास्य व्यंग्य

आज के चमचे
विनोद कुमार सिनंदी


प्राचीन काल में राजाओं के दरबार में चाटुकार और विदूषक होते थे। चाटुकार राजा के हर अच्छे-बुरे काम की प्रशंसा करते थे। यहाँ तक कि राजा की प्रशंसा कर राजा का प्रिय बने रहने के लिए वो अन्य दरबारियों का भी अपमान करने से नहीं चूकते थे। राजा भी ऐसे दरबारियों से अक्सर खुश रहा करते थे। भाँड़, राजा के दरबार में तरह-तरह के करतब दिखा कर राजा को खुश करते थे और नगर-नगर, गाँव-गाँव जाकर, गीत गा-गा कर राजा की प्रशंसा किया करते थे। भांडों और चाटुकारों का बिगड़ा हुआ रूप है, आज के चमचे। चमचा मतलब 'चरणामृत चाखू' या 'चरण मक्खन चाटू'।

यों तो रसोई में तरह-तरह के चमचे होते हैं, जैसे छोटा चमचा, बड़ा चमचा -
खाना परोसने का चमचा, खाने का चमचा, मीठा खाने का चमचा, चाय में चीनी मिलाने का चमचा आदि आदि... रसोई में इन चमचों की उपयोगिता एक गृहिणी ही बेहतर जान सकती है। इसी तरह समाज में भी तरह-तरह के चमचों से आपका सामना हो सकता है। यहाँ चमचों के भी चमचे होते हैं। ये बात सौलह आने सच है कि रसोई में चमचे जितने श्रेष्ठ हैं, समाज में ये चमचे उतने ही पथभ्रष्ठ हैं।

आज के चमचों की ख़ासियत ये है कि समाज में अपना बरतन ये स्वयं ढूँढ़ते हैं, और ये उस बरतन के लिए कितने उपयोगी हो सकते है, ये भी स्वयं ही बताते हैं। जैसे ही इन्हें अपनी पसंद का बरतन मिलता है ये उसकी पैंदी से जौक की तरह चिपक जाते हैं। ये चमचे ऐसा बरतन ढूँढ़ते हैं जिसमें इनकी पाँचो उँगलियाँ घी में रहें और मुँह दुध मलाई में। चरण चुबंन में इनकी बहुत श्रद्धा है। चमचे आप को हर जगह मिलेंगे, दफ़्तर, व्यापार, सरकार हर जगह। समाज का कोई कोना इनसे बचा नही है।

'संस्था हो या संस्थान, दफ़्तर ही इनका प्रमुख स्थान जहाँ से ये कभी नहीं करते प्रस्थान'

चमचे वो 'कैक्टस' हैं जो कहीं भी फल-फूल जाते हैं, पर अपने आसपास के फूलों की खुशबू निचोड़ कर उन्हें रंग और गंधहीन बना देते हैं। कर्म से इन्हें कोई मतलब नहीं होता। इनकी निगाह तो बस निशाना बींधने पर ही रहती हैं। काम कैसे होना है, किस तरह होना है से इन्हें कोई मतलब नहीं, काम होना चाहिए उसके लिए कोई भी हद इनके लिए बहुत मामुली होती है।

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कर्म नहीं, धर्म नहीं और कोई ईमान नहीं मूलमंत्र है एक 'या चमचागिरी तेरा ही आसरा'

चमचों की विशेषताओं को या तो वह जान सकता है जिसको चमचों के बिना नींद भी नहीं आती या फिर एक चमचा ही जान सकता है, हम जैसे मूर्ख अज्ञानियों को उनकी उपयोगिता का अंदाज़ नहीं हो सकता। हम जैसे लोग तो बस इनकी बुराई करते रह जाते हैं, पर ये अपने समय और संबंधों का पुरा सदुपयोग कर अपना हर काम निकाल लेते हैं।

नेता का हो या अभिनेता का, या हो अफ़सर का चहेता
मन में इसके ज़हर भरा, बातों से शहद टपकता
है ये बिन पेंदी का लोटा, कभी इधर लुढ़कता कभी उधर लुढ़कता
चमड़ी का इतना मोटा, इस पर किसी बात का असर ना होता।

ये पहले भी थे, आज भी हैं, आगे भी रहेंगे। रंग बदलते है, रुप बदलते हैं, बदलते रहेंगे। इनके कद्रदान इन्हें हमेशा प्रश्रय देते रहेंगे। और ये ऐसे ही फलते फूलते रहेंगे। ये तो शायद आरंभ ही है समापन नहीं।

24 अक्तूबर 2007

 

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