हास्य व्यंग्य

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भोलेनाथ की सरकार व्याख्या
शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
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कुछ दिनों से सरकार के विवादास्पद निर्णयों से क्षुब्ध होकर विपन्न बुद्धि सरकार की तलाश में गाँव से राजधानी तक जूते घिस आया, पर उसे सरकार नहीं मिली। वह चाहता था कि सरकार को अपना दुखड़ा सुनाऊँ। उसे समझाऊँ, पर जहाँ भी गया, वहाँ या तो सरकार के नौकर मिले, या फिर सरकार के प्रतिनिधि मिले, कहीं सरकार के सचिव मिले, कहीं सरकार के मंत्री मिले। यहाँ तक कि मेरी सरकार कहने वाले सरकार के मालिक भी मिले परंतु स्वयं सरकार के साक्षात दर्शन नहीं हो सके। सरकार की तलाश में भटकता हुआ थका हारा विपन्न बुद्धि हिमालय पर्वत पर भोलेनाथ शिवशंकर की शरण में जा पहुँचा और बोला,
''हे भोलेबाबा! आप भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों की बातें जानते हैं, आप सर्वज्ञ हैं। कृपया मेरी जिज्ञासा शांत करने की कृपा करें। हमारे देश में सरकार नाम की कोई वस्तु है अथवा नहीं? यदि है तो वह कहाँ रहती है? उसका स्वरूप क्या है? वह कैसे चलती है? कैसे काम करती है? क्या खाती है? कैसे सूँघती है? कैसे बोलती है?. . .कृपा करके विस्तार पूर्वक बताने का कष्ट करें।''

भोलेनाथ ने अपनी आँखें बंद कीं और गंभीर स्वर में बोले, ''वत्स! तुमने अत्यंत गूढ़ प्रश्न करके हमें संकट में डाल दिया। वर्तमान कालिक प्रजातांत्रिक भारत देश की सरकार को समझना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। यह इंद्रियों का विषय नहीं है। सरकार को प्रत्यक्ष पकड़ा नहीं जा सकता, देखा भी नहीं जा सकता और मारा पीटा भी नहीं जा सकता। इसीलिए वह 'परम स्वतंत्र न सिर पर कोई' के अनुसार स्वच्छंदता पूर्वक कार्य करती है। अब मैं तुम्हारे प्रश्नों का क्रमानुसार उत्तर दे रहा हूँ, ध्यान पूर्वक सुनो - तुम्हारा पहला प्रश्न है कि सरकार है या नहीं?''

सरकार है या नहीं

'सरकार के अस्तित्व के विषय में हमारे देश में तीन विचारधाराएँ प्रचलित हैं। एक वर्ग वह है जिसे नास्तिक कहा जा सकता है। वह सरकार के अस्तित्व का कतई स्वीकार नहीं करता। वह स्वयं अपने आप को संप्रभुता संपन्न मानता है, उसके पास अपना एक पूरा प्रशासनिक तंत्र है। अपनी सेना है, अपनी अदालत है। वह जब चाहे किसी गाँव को जलाकर राख कर दे। बस में से यात्रियों को उतार कर कतार में खड़ा करके गोली मार दे। किसी भी सभ्य नागरिक को घर से खदेड़ कर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दे। और तो और संतरी से लेकर मंत्री तक की गर्दन काटकर खुलेआम घूमने वाला यह वर्ग सरकार के अस्तित्व पर एक ज़बरदस्त प्रश्न चिह्न लगाता है उसका कहना है कि यदि सरकार होती तो हमारा कुछ बिगाड़ती। इस तरह नित्य नए अपराध करके यह वर्ग सरकार का न होना सिद्ध करता है।

दूसरा वह वर्ग है जिसे आस्तिक कहते हैं। वह वर्ग मानता है कि सरकार कहीं न कहीं है ज़रूर, बिना सरकार के इतना बड़ा देश चल नहीं सकता। यह वर्ग सरकार द्वारा किए गए अच्छे बुरे निर्णयों को अपने भाग्य से जोड़ता है। इस वर्ग को पूरा विश्वास है कि सरकार की बिना इच्छा के पत्ता भी नहीं हिल सकता। उनका मानना है कि हत्या, बलात्कार, हिंसा आदि भी उसी की इच्छा से होता है। यह अलग बात है कि तुम जैसे साधारण लोग इसका कारण नहीं समझ पाते। इस समूह के अधिकतर लोगों का विश्वास है कि सरकार जो भी करती है राष्ट्रीय हित में ही करती है।

तीसरा जो वर्ग है वह संदेहवादियों का समूह है। हमारे देश में यही सबसे बड़ा वर्ग है। यह वर्ग सरकार के समस्त कार्यों को संदेह की दृष्टि से देखता है। सरकार है या नहीं इसमें भी इसे संदेह बना रहता है।

सरकार का स्वरूप क्या है

दूसरा प्रश्न है 'सरकार का स्वरूप क्या है?' इस बारे में भी मतभेद हैं। कुछ लोग इसे निराकार मानते हैं। इसे इंद्रियों से ग्रहण नहीं किया जा सकता मात्र अनुभव किया जा सकता है। जो लोग श्रद्धा पूर्वक सरकारी मंदिरों के चक्कर लगाते हैं, वे सरकारी प्रसाद पाते हैं। कुछ लोग सरकार को ब्रह्म की तरह सर्व व्यापक मानते हैं। उनका कहना है कि शहर से लेकर गाँव तक सरकार ही सरकार व्याप्त है। केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार, जिला सरकार, ग्राम सरकार और आगे मुहल्ला सरकार, वार्ड सरकार आदि अनेक सरकारें ही सरकारें दिखाई दे रहीं हैं।

सरकार चलती कैसे है

अब सरकार चलती कैसे है? इस संबंध में गोस्वामी तुलसादास जी ने लिखा है -

बिनु पद चलै, सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करे विधि नाना।।
अर्थात सरकार बिना पैरों के चलती है, कभी-कभी गिर भी जाती है, फिर भी काम चलाऊ बनी रहूती है। कान न होते हुए भी अपने काम की बात सुन लेती है, किंतु उसे दीन दुखियों की पुकार सुनाई नहीं पड़ती, वह हाथ न होते हुए भी नाना प्रकार के कर्म करती है।

सरकार खाती क्या है

वह खाती क्या है? इस का वर्णन इस प्रकार किया गया है -
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।।
अर्थात सरकार बिना मुँह के समस्त पदार्थों को खाती है। सारे रसों का उपभोग करती है। न खाने योग्य वस्तुएँ भी खा जाती है। किंतु मुख न होने से खाना सिद्ध नहीं किया जा सकता है।

इसलिए हे विपन्न बुद्धि! तुम सरकार की तलाश करना बंद करके अपनी आत्मा में झाँको। सरकार तुम्हें अंदर दिखाई देगी। इस संबंध में महात्मा कबीर दास जी ने कहा है -
तेरा साई तुज्झ में ज्यों पुहुपन में बास।
कस्तूरी का मृग ज्यों फिर फिर ढँढ़े घास।।
इसलिए तुम बाहर न भटक कर अपने अंदर देखो। तुम्हें सरकार अपने आप में दिखेगी। इतना कहकर भोलेनाथ आँखें बंदकर ध्यानस्थ हो गए। लेकिन विपन्न बुद्धि के मन में उठता हुआ तूफ़ान इसे सुनकर शांत हो गया।

इस प्रकार 'भोलेनाथ की सरकार व्याख्या' नामक यह पुराण सरकार से सताया गया जो प्राणी शिवरात्रि के दिन १०८ बार पढ़ता है, वह सरकार संबंधी समस्त कष्टों से मुक्त होकर मन की शांति प्राप्त करता है।
 

१६ फरवरी २००७