हास्य व्यंग्य

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ग्लोबल वार्मिंग से त्रस्त कैलाशपति
शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
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ग्रीष्म ऋ़तु प्रारंभ होते ही कैलाश पर्वत पर ध्यानमग्न भगवान शंकर की समाधि अचानक खुली, तब गर्मी से व्याकुल प्रतीक्षारत पार्वती जी ने शिव जी से कहा, ''हे भोले नाथ! आप तो सर्वज्ञ हैं, सब के मन की बात जानते हैं। फिर भी शिकायत करना पत्नी का अधिकार और उसे ध्यानपूर्वक सुनना पति की विवशता है। अत: हे त्रिपुरारि! मेरे प्रश्नों को ध्यान से सुनिए और उनका समाधान भी कीजिए।''

''सबसे पहले तो यह बताइए कि अचानक हिमालय का बर्फ़ कहाँ चला गया? और हमेशा ठंडे रहने वाले इस स्थान पर गर्मी कहाँ से आ गई? और इस भीषण गर्मी से बचने के लिए हम लोग क्या करें? कहाँ जाएँ? क्यों कि आप एक तो वस्त्र बहुत कम ही पहनते हैं और दूसरे समाधि में बैठ जाते हैं। तीसरे जटाओं में गंगा और मस्तक पर शीतल चंद्रमा धारण किए हैं इसलिए आपको तो गर्मी लगती नहीं है। किंतु मैं इस गर्मी में कैसे समय व्यतीत करती हूँ मैं ही जानती हूँ।''

शिव जी ने पार्वती की शिकायत के गंभीरता को समझते हुए हमेशा की तरह शांतिपूर्वक मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, ''हे प्रिय गिरिजे! मैं समझता हूँ कि तुम हिमालय की पुत्री होने के कारण शीतल प्रकृति की हो। तुम्हें ज़रा-सी भी गर्मी असह्य होती है इसीलिए तो मैंने तुम्हारे पितृगृह में ही रहने का फैसला किया था। श्वसुराल में रहना कितना अपमान जनक होता है? यह जानते हुए भी तुम्हारी सुविधा को ध्यान में रखते हुए मैंने घर जँमाई बनकर यहाँ रहना स्वीकार किया। मुझे क्या पता था कि हिमालय में भी गर्मी हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी?''

''मनुष्य नामक प्राणी के अप्राकृतिक कार्यों की वजह से यह दिन भी देखना पड़ेगा? मनुष्य के कारण? यह मनुष्य कहाँ से आ गया हिमालय में?'' पार्वती ने पूरक प्रश्न किया।

''हाँ देवि! यह विषम परिस्थिति मनुष्य के अविवेक पूर्ण क्रियाओं से ही उत्पन्न हुई है। उसने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, कल-कारखानों के निर्माण और आधुनिक वाहनों के प्रयोग से प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है। ग्रीन हाउस प्रभाव से ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन रक्षा कवच टूट जाने के फलस्वरुप हिमालय का बर्फ़ पिघल गया है और यहाँ भी गर्मी उत्पन्न हो रही है।'' शिव जी ने गर्मी का वैज्ञानिक विश्लेषण किया।

''मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है, ये ग्लोबल-म्लोबल वार्मिंग क्या होता है? ज़रा आप विस्तार से बताइए। यह तो पहले मैंने कभी सुना ही नहीं है।'' पार्वती जी ने अपनी अज्ञानता पर आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा।
शिव जी ने हिमालय से पिघलकर बहते हुए बर्फ़ को देखकर चिंता प्रकट करते हुए पार्वती से कहा, ''हे पार्वती तुम अभी इस समस्या से परिचित नहीं हो और न ही इसके भयावह परिणाम को जानती हो। इसलिए सावधान होकर सुनो, समझो और इस भूलोक को महाप्रलय से बचाने का प्रयत्न करो।''

ब्रम्हा जी ने संपूर्ण सृष्टि का निर्माण करके मनुष्य नामक प्राणी को बुद्धि देकर जो भूल की है यह उसी का परिणाम है। उसने सृष्टि की सारी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करके रख दिया है। वह सृष्टि का संचालन अपने हाथों में लेना चाहता है। उसने पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँचों महाभूतों का दोहन करके नवीन-नवीन अप्राकृतिक वस्तुओं का निर्माण करके एक ओर जहाँ इन महाभूतों को प्रदूषित किया है, वहीं पूरी प्रकृति की सुंदर व्यवस्था को विकृत कर दिया है। अन्य सब जीव-जंतु तो प्रकृति की व्यवस्था के अंतर्गत रहते हैं पर मनुष्य नई-नई व्यवस्था बनाने में सारी व्यवस्था चौपट कर देता है।

ब्रम्हा जी ने इतने वृक्षों की सृष्टि की थी जो मनुष्यों द्वारा उत्सर्जित 'कार्बनडाई आक्साइड'  नामक गैस को गृहण कर समस्त प्राणियों के जीवन के लिए अत्यावश्यक प्राणवायु अर्थात 'आक्सीजन'  नामक गैस के रूप में बदल सकें। जिससे सृष्टि की संपूर्ण व्यवस्था सुचारु रूप से चलती थी। किंतु मनुष्य ने अपनी जनसंख्या में जितनी भारी वृद्धि की उतनी ही वृक्षों को काट-काट कर उनकी संख्या कम कर दी। फलस्वरूप पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा और फिर कुछ कसर रही तो कार्बनडाई आक्साइड उत्सर्जित करने वाले अनेक वाहन और कारखाने तैयार कर लिए। बिजली उत्पादन और अनेक उद्योगों के द्वारा मीथेन नाइट्रस आक्साइड क्लोरो-लोरो कार्बन जैसी ग्रीन हाउस गैसों को बड़ी मात्रा में उत्सर्जित करके विश्व के तापमान में अत्यधिक वृद्धि कर डाली। उसी का परिणाम है कि हिमालय का बर्फ़ पिघलता जा रहा है और समुद्र का जल स्तर निरंतर बढता जा रहा है। यदि इस ग्लोबल वार्मिंग को नहीं रोका गया तो प्रलय अब दूर नहीं है। शिव जी ने चिंतित मुद्रा में पार्वती को समझाया। लेकिन यह तो मनुष्य का आत्महत्या का प्रयास दिखाई देता है? और आप उसे बुद्धिमान कह रहे है? पार्वती जी ने मनुष्य की बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए पूछा। हाँ देवि! यह मनुष्य वही कर रहा है जो कभी रावण ने किया था। वह रावण को हर साल जलाता है पर काम पूरे उसी के कर रहा है।'' शिव जी ने मनुष्य पर क्रोध प्रकट करते हुए कहा।

''हे प्रभो! आप तो आशुतोष हैं कृपा करके इस ग्लोबल वार्मिंग से बचने का कुछ उपाय बताइए जिससे यह दुनिया बच सके और पृथ्वी के सभी प्राणी सुखपूर्वक रह सकें। पार्वती जी ने प्रार्थना की। शिव जी ने नेत्र बंद करके उपाय बताते हुए कहा, ''हे प्रिये! यदि प्रत्येक मनुष्य प्रतिवर्ष नए-नए वृक्ष लगाए और परंपरागत उर्जा के स्थान पर अक्षय उर्जा का उपयोग करे। डीज़ल-पेट्रोल से चलने वाले वाहनों को छोड़कर पैदल या सायकल से चले तो सर्वनाश ये बचा जा सकता है।

उद्योगों की स्थापना से पहले ही उससे निकलने वाले हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को नदियों में मिलने से रोका जाए। पर्यावरण संरक्षण को सर्वाधिक महत्व दिया जाए तो मनुष्य को अभी अवसर है। सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहाता।'' शिव जी के द्वारा अतिमहत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर संतुष्ट हुई पार्वती ने आशा व्यक्त की कि अवश्य ही मनुष्य को सद्बुद्धि प्राप्त होगी।

१६ मार्च २००७