हास्य व्यंग्य

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सेवा वंचित
— डॉ नरेंद्र कोहली  
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रामलुभाया का लटका हुआ चेहरा देख कर मैंने पूछा, ''क्या हुआ रामलुभाया?''
''कुछ नहीं! बस कुछ मूर्खों के कारण मुझे देश की सेवा करने से वंचित कर दिया गया है।''
मैं उसकी बात समझने में सर्वथा असमर्थ था। भला देश की सेवा से कोई किसी को कैसे वंचित कर सकता है। भगत सिंह को अँग्रेज़ भी नहीं रोक पाए थे। तो यह...मैं जब चाहूँ, अपने क्या किसी पराए देश की भी सेवा कर सकता हूँ। कोई मुझे रोक कैसे सकता है।''
''कौन सी सेवा करना चाहते थे तुम रामलुभाया?'' मैंने पूछ लिया।

मैं जानता था कि मेरे लिए ज्ञान का एक नया अध्याय खुलने वाला है। मैं उन सेवाओं के विषय में जानने वाला हूँ, जिनके विषय में मुझे अब तक कुछ भी ज्ञात नहीं था।
''मैं भूखे पेट को रोटी, बेघरों को घर, नंगों को कपड़ा देना चाहता हूँ।'' उसने बताया, ''दलितों, पिछडों और अल्प संख्यकों का उत्थान करना चाहता हूँ। महिलाओं को पुरुषों के बराबर ले आना चाहता हूँ। और भी जो कुछ आवश्यक होगा, वह सब भी करना चाहता हूँ।''

मुझे यह समझ नहीं आया कि वह बहुसंख्यकों की सेवा क्यों नहीं करना चाहता। थोड़े से लोगों की ही सेवा क्यों करना चाहता है। दुर्बलों को बल देना और अन्याय के स्थान पर न्याय करवाना मेरी समझ में आता था, किंतु जाति या धर्म के आधार पर सेवा का क्या अर्थ था। पर मैंने उससे यह सब नहीं पूछा।
''तो करो सेवा! कोई तुम्हें रोक रहा है क्या?'' मैंने कहा, ''तुम्हारे मन में इतनी ही सेवा की भावना है, तो किसी अस्पताल में अथवा सरकारी कार्यालय में ही जा कर बैठ जाओ। लोगों को ठीक जानकारी देने का ही काम संभाल लो। जिस मुहल्ले में गंदगी है, वहाँ के लोगों को सफ़ाई करना सिखाओ। यह भी तो सेवा है। कौन रोकता है तुम्हें?''
वह मुँह टेढ़ा कर हँसा, ''यह सेवा नहीं मूर्खता है। सेवा तो वह होती है, जो आधिकारिक रूप से की जाए। जिससे मुझे वंचित कर दिया गया है।''

अब मैं कुछ-कुछ समझ रहा था। वह शायद सेवा का अर्थ नौकरी समझता था। उसे भी तो सरकारी सेवा ही कहते हैं। गवर्नमेंट सर्विस। कहते तो उसे सेवा ही है किंतु उसमें वेतन मिलता है। मैं जो कुछ सुझा रहा था, उसमें वेतन नहीं मिलता था। पर किसी भी वेतन में वह सारे भूखे पेटों को रोटी, बेघरों को मकान और नंगों को कपड़ा कैसे दे सकता था? और वह तो अगड़े, पिछड़े और बिगड़े - सबकी उन्नति करने वाला था। यह गुत्थी तो मेरे बस की नहीं थी। लोग वेतन से अपना घर चला लें, वही बहुत होता है, सारे देश का उत्थान।
''तुम अपने वेतन से यह सब करना चाहते हो?'' मैंने पूछ लिया।
''मैं पागल हूँ क्या?'' उसने घूर कर मुझे देखा।
''तो फिर बताते क्यों नहीं कि तुम्हारी देशसेवा के मार्ग में क्या बाधा है?''
''अरे बताने को क्या है।'' वह झपट कर बोला, ''कम्यूनल फोर्सेस ने मेरे वोट छीन लिए। मुझे चुनाव में हरा दिया। तो अब मैं देश की सेवा कैसे कर पाऊँगा।''

तो यह बात थी। वह चुनाव में हार गया था। सत्ता छिन गई थी और वह उसे सेवा छिन गई कह रहा था। सत्ता पाए बिना वह सेवा नहीं कर सकता और सत्ता पा कर वह शासन करने लगता है - अन्यायी, क्रूर और स्वार्थी शासन। वह उसी को सेवा कहता है। बेचारे से वह अवसर छिन गया है।
''पर वह क्यों आवश्यक है?'' मैंने डरते-डरते पूछ ही लिया।
''अरे सरकारी ख़ज़ाना हमारे अधिकार में होगा तो न हम अपने संबंधियों को धनवान बनाएँगे। यदि ख़ज़ाना ही कम्यूनल फोर्सेस के पास होगा।''
''तुम उन्हें कम्यूनल क्यों कहते है रामलुभाया!'' मैंने पूछा, ''वे चुनाव जीत कर आए हैं। वे इस देश के प्रतिनिधि हैं। बहुमत उनके साथ है।''
''सारा देश ही कम्यूनल है।'' वह दाँत पीस कर बोला।
''जब सारा देश ही कम्यूनल है तो तुम उनके प्रतिनिधि क्यों होना चाहते हो?''
''प्रतिनिधि कौन होना चाहता है। हम तो शासक होना चाहते हैं। अपने नंगे भूखे रिश्तेदारों का दुख दूर करना चाहते हैं। अपने परिवार का संकट टालना चाहते हैं। दस गोही तो आदमी हैं, हमारे परिवार में। इतने बड़े देश में वे अल्पसंख्यक ही तो है हमारा परिवार। हमको हरा दिया तो अब हमारे परिवार की सेवा तुम्हारा बाप करेगा क्या?''
मैं रामलुभाया की पीड़ा समझ रहा था।

९ जनवरी २००७