हास्य व्यंग्य

नया साल ऐसे मना
--डा. रामनारायण सिंह मधुर


जिस धूमधाम एवं महोत्सव के रूप में अपने इंडिया, जिसे कई लोग कभी-कभार भारत कहने का खतरा मोल ले लेते हैं, के नववर्ष में प्रवेश की अपार खुशी व्यक्त की गई, उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ और मुझे लगने लगा कि अब अपने महान देश को यूरोप या पश्चिमी देशों का बृहद संस्करण बनने में रंचमात्र भी कठिनाई नहीं। वैसे अँग्रेज़ी और अँग्रेज़ियत के कारण पहले से ही यह ब्रिटेन का उपनिवेश लगता था। जो कुछ भ्रम था, उसे इस नववर्ष उत्सव ने तोड़ दिया।

कहीं बोतलें खुली थीं और शराब पानी की तरह ढाली जा रही थीं, कहीं बृहद डिस्को डांस का आयोजन था तो कहीं-कहीं कैबरे को खुले रूप में खुली आंखों से देखा जा सकता था। हर कहीं पॉप-संगीत का पाप सिर चढकर बोल रहा था। नृत्य-संगीत, शोर-शराबा, बम-पटाखे के कारण भूचाल-सा आ गया था। विद्युत-छटा भी अवर्णनीय थी। वैसे तो अपने देश-प्रदेश में बिजली का सुदर्शन सस्ते गल्ले की राशन-दुकानों के समान कभी ही कभी क्षणिक रूप में होता है, पर उस दिन न जाने कैसे बिजली का उत्पादन बढ गया था।

अंधेरे कमरे में मच्छर मारने से उत्सव की झांकी देखना बेहतर समझा। मैं बाहर निकला। मेरे जैसे अज्ञात-अज्ञानी को भला कौन आमंत्रित करता। खुद ही जगह-जगह भ्रमण करने लगा। एक झांकी मुझे सर्वाधिक मनोहर लगी, उसमें कुछ किशोर-किशोरियां नाम मात्र के कपडों में एक-दूसरे से चिपकने के प्रयास में उछल कूद नामक नृत्य कर रहे थे। बाहर कडाके की ठंड थी, पर वहां मंच के साथ-साथ दर्शक भी गरम थे। शायद बाद में इतने-से कपडे की भी जरूरत नहीं रहेगी। एक तम्बू में दर्शकों की भारी भीड थी, अच्छा नजारा था। बडे-से मंच पर आर्केस्ट्रा बज रहा था और एक सुंदर-सी छोकरी नाच और गा रही थी-
नथुनिये पे गोली मारे सैंया हमार हो।
कुछ देर बाद दो मदोन्मत्त युवक मंच पर नथुनी पर गोली मारने के अंदाज में फायरिंग करने लगे। भगदड मच गई। मैं भी दुम दबाकर भागा और ऐसा भागा कि अपने कमरे में रखी खाट पर जाकर गिर पडा। सारी रात बम फूटने की तीखी आवाजें आती रहीं। लगता था आतंकवादियों ने धावा बोल दिया है।
नींद तो क्या खाक आती। सोचने लगा-आने वाले दिनों में चमत्कारिक घटनाएं होंगी, जिससे अपने देश का भविष्य उ”वल हो उठेगा। इस गरीब देश में जब लाखों-करोडों नंगे-भूखे, निराश्रित, अशिक्षित, बेकारी से त्रस्त हैं, तब लाखों रुपये फूंककर इस प्रकार के उत्सवों की सार्थकता सिद्ध हो सकेगी?

मन उत्सुक है। कौन-से होंगे चमत्कार, कैसे होंगे? अगले वर्ष में क्या कुत्तों की दुम सीधी हो जायेगी। वे भौंकना और काटना बंद कर देंगे। बदबू मारती छछूंदर चमेली का तेल लगाकर चलेगी। शूकर गंदगी से निकल लक्जरी सोप से नहा स्मार्ट नजर आएंगे। भैंस पूंछ उठाकर गोबर करना बंद कर देगी। ग्वाले पानी में दूध मिलाने के बजाय दूध में पानी मिलाएंगे। राशन और रुपयों की बारिश होगी, जिससे सब बदहाल खुशहाल हो जायेंगे। ओलम्पिक खेलों में भारतीयों को स्वर्णपदक मिलने लगेंगे।

राजनीति का स्तर सुधर जाएगा। कमीशनखोरी, रिश्वतकांड, घोटाले नहीं होंगे। आतंकवादी शांति और अहिंसा के पुजारी हो जाएंगे। लूट-पाट, चोरी-डकैती, बम-विस्फोट, खून-खराबे बंद हो जायेंगे। प्रति सुबह पति अपनी पत्नियों को देवी की तरह पूजा करने लगेंगे। दोषी दंडयुक्त और निर्दोषी दंडमुक्त होंगे। पुलिस सौम्य और सुसंस्कृत हो जाएगी। प्रजातंत्र में प्रतिभा भी सम्मानित होगी। पाश्चात्य अपसंस्कृति के बदले क्या भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति पर हमें गर्व होगा। अंग्रेजी का स्थान हिंदी ले लेगी। हम सचमुच गुलाम मानसिकता को अलविदा कर देंगे। सोचते-सोचते सुबह हो गई।
पर आश्चर्य, दूसरे दिन कुछ भी नहीं बदला था। ग्वाले की भैंस पूंछ उठाकर रोजाना की तरह गोबर गीला कर रही थी। ग्वाला रोजाना की तरह ही बाल्टी में पानी भरकर दुग्ध-दोहन-क्रिया में तत्पर था। शिकार सिंह अपने शिकारी कुत्ते की जंजीर पकडे घूम रहे थे। वह गुर्रा भी रहा था और किसी को देख भूंककर झपटने की तैयारी कर रहा था। परम्परागत रूप में उसकी पूंछ टेढी थी। नल पर पानी भरने के महाभारत में गंगा, गोदावरी शब्दों के दायरे से बाहर निकल मल्लयुद्ध की तैयारी कर रही थीं। आकाश को चादर और धरती को बिस्तर माने रमुआ शराब की मस्ती में सडक को दंडवत करने में दत्तचित्त था। सघन कुहरे के पर्दे को भेद पूर्व के दरवाजे से सूर्यदेव बाहर आने की असफल चेष्टा कर रहे थे। बिजली की अम्मा रोजाना की तरह बर्तन मांज रही थी। एक भी चमत्कार नहीं दिखा।


कमीज के आस्तीन से बहती नाक पोंछते हमेशा की तरह हाकर अखबार को गेंद के समान बरामदे में फेंक गया। सोचा, खबरों में ही कुछ नवीनता मिल जाये। आखिर हम नववर्ष में जा रहे हैं। उधर जाना कोई हंसी-मजाक है क्या? पहली खबर से ही दिल दहल गया। कश्मीर में आतंकवादियों के पराक्रम से अनेक व्यक्तियों ने इस नश्वर जगत में रहने से साफ इंकार कर दिया था। सुरक्षा बल के कुछ जवानों ने भी हमारी सुरक्षा से मुंह मोड लिया था। एक रेलवे स्टेशन पर खडी एक सवारी गाडी में बम-विस्फोट हो गया। रेलवे-प्रशासन खुश था कि कोई मरा नहीं।


अपने ऊपर लगाए गए आरोपों के उत्तर में मंत्री जी का बयान छपा था कि उन्होंने जो कुछ किया, प्रजा की भलाई के लिए किया। एक बडे अधिकारी के फार्महाऊस में छापा मारने पर करोडों की संपत्ति मिली, जिसे निहायत ईमानदारी से की गई सेवाओं के बदले में उन्होंने प्राप्त किया था। बहुत-सी चटपटी मसालेदार राजनीतिक, सामाजिक, फिल्मी खबरें प्रकाशित थीं, दुर्घटनाओं, हत्याओं, प्रेम-प्रपंचों, छिनैती, डकैती, चोरी-सीनाजोरी, बहू-बेटियों को मारने, जलाने की अनेक खबरें। एक चाचा ने अपने सगे भतीजे के प्रति कर्तव्य एवं प्यार के वशीभूत सता-सताकर मार डालने की योजना बना रखी थी, क्योंकि वह उनके बडे भाई की एकमात्र निशानी था और उसके नाम पचास लाख की जायदाद थी।


उसके बाद भी कई दिनों तक की कोशिश के बाद भी नववर्ष में जाने का कोई उत्साहवर्धक समाचार नहीं मिला। मित्र ने कहा-जैसे गत, वैसे आगत।

२२ दिसंबर २००८