हास्य व्यंग्य

पुस्तक मेले में लोकार्पण
--मनोहर पुरी


''मैं अभी विकास मार्ग पर फँसा हूँ, सच कहूँ तो एक गड्ढ़े में धँसा हूँ। लगता है इस मार्ग का अभी बाकी है विकास होना, टूटा फूटा हुआ है इसका हर एक कोना।'' फ़ोन के दूसरी ओर से किसी ने चिल्ला कर कहा। मेरे मित्र के नाजुक कान ने उस ध्वनि प्रदूषण को चुपचाप सहा।
उधर से आवाज़ आनी बंद हुई तो मित्रवर बोले, ''यहाँ पर सब तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम तुम्हारी याद में आहें भर रहे हैं। पुस्तक के लोकार्पण का समय साढ़े तीन बजे था। मुख्य अतिथि भी आ पहुँचें हैं, पुस्तक मेले में पुस्तकों के लोकार्पण के अपने अलग-अलग लोचे हैं। तुम्हारे ही आने का इंतज़ार है, बाकी तो बैनर, पुस्तक, मिठाई और चाय सब तैयार है। मुख्य अतिथि कुछ समय से पहले ही आ गए हैं। क्योंकि उन्हें और तीन चार पुस्तकों का लोकार्पण करना है। बिना पढ़े ही पुस्तकों की विषय वस्तु पर भाषण भी करना है। उन्हें प्रतीक्षा करवाना मुझे भा नहीं रहा, तू कैसा दोस्त है समय पर आ नहीं रहा।''

''मिलने पर बताऊँगा, अपनी आप बीती सुनाऊँगा। इस समय तो किसी तरह स्कूटर सहित बाहर निकलना ज़रूरी है, मरहम पट्टी करवाना भी मजबूरी है। मैं विकास मार्ग पर हुए विकास का शिकार हुआ हूँ, बिन बुलाई बीमारी से बीमार हुआ हूँ। सड़क पर इतने गड्ढे हैं कि वह देती ही नहीं दिखाई, जैसे पुस्तक मेले में भी मनचाही पुस्तक कहीं मिलती नहीं भाई।''
मित्र ने कहा, ''बेकार की बातें मत करो, और चाहो तो विकास के और भी गहरे गड्ढे में गिरो। हम अपना कार्यक्रम आगे बढ़ाते हैं, तुम आओ न आओ हम पुस्तक का लोकार्पण करवाते हैं।''
मित्रवर ने फ़ोन बंद करके पीछे देखा। भीड़ थोड़ी थोड़ी बढ़ने लगी थी। कीमतों सरीखी उसकी ग्राफ ऊपर चढ़ने लगी थी। मित्र थोड़े से निराश थे, फ़ोन पर हुई बातचीत से हताश थे।
मैंने ढाढ़स बँधाने के अंदाज़ में उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा, ''इन दिनों थोक के भाव में लोकार्पण हो रहा है। बड़े बड़े ग्रंथों का इस पुस्तकों की गंगा में तर्पण हो रहा है। भाई आखिर एशिया का सबसे बड़ा पुस्तक मेला है। इसमें प्रकाशकों और साहित्यकारों का रेलम पेला है। बहुत से नामी गिरामी साहित्यकार तो सुबह-सुबह ही मेले में आ कर जम जाते हैं। कौन जाने किस प्रकाशक को आवश्यकता पड़ जाए और वह अपनी किसी लोकार्पित पुस्तक का पुन: विमोचन करवाए। कोई आने वाला नेता अथवा साहित्यकार किसी कारण से लोकार्पण के लिए अपने वायदे से मुकर जाए। उनकी सेवाएँ निशुल्क उपलब्ध हो सकें, साहित्य के प्रति वह अपने दायित्व का भार ढो सकें। संकट की घड़ी में ऐसे तारनहार ही तो पुस्तक व्यवसाय की नाक बचाते हैं। बड़े साहित्यकार होने के नाते अपना फर्ज़ ही तो निभाते हैं। तुम चिंता मत करो। यदि तुम्हारे मित्र नहीं आ पा रहे तो मैं अपने बुलाता हूँ, यों ही इधर उधर बेकार में सूची पत्र बटोर रहे होंगे उन्हें खरी खोटी सुनाता हूँ।''
''बहुत से साहित्य प्रेमी भी दे रहे हैं आस पास दिखाई, उन्हें भी बुला कर खिलाई जा सकती है मिठाई। बाद में पुस्तक के पक्ष में वातावरण ही बनाएँगें, हम भी वहाँ उपस्थित थे यह बात घर जा कर अपनी पत्नी और पड़ोसियों को सुनाएँगे।'' भाई लेखक और साहित्यकार मेले में मेले की रौनक देखने ही तो आते हैं, मुफ़्त में किताबें बटोरने के लिए भी तो जाने जाते हैं, न चाहने पर भी अपने संस्मरण श्रोताओं को सुनाते हैं।'' भीड़ में से किसी दिल जले लेखक ने फब्ती कसी।

मित्रवर यह कटु सत्य सुन कर चौंके और बोले, ''यह हमारा बुजूर्गों के साथ कैसा व्यवहार है। मैं कहता हूँ कि यह अति तुच्छ विचार हैं। वे मेले की रौनक देखने नहीं बढ़ाने के लिए आते हैं, हर एक के किसी न किसी प्रकाशक के साथ बकाया वाले खाते हैं। जहाँ तक पुस्तकों की बात है, तो यह भी उन्हीं की सौग़ात है। पुस्तकों का भौतिक बोझ वे कहाँ उठा पाते हैं, उन्हें तो स्वयं उठा कर प्रकाशक ही उनके यहाँ पहुँचाते हैं।''
मित्रवर ने अपने को व्यस्त दिखाने के लिए एक बार फिर फ़ोन की घंटी बजाई। उधर से उत्तर आया, ''अब क्या हुआ भाई। बताया न कि मैं विकास मार्ग पर अटका हुआ हूँ, गड्ढों की भूल भुलैया में भटका हुआ हूँ। केवल दो किलोमीटर हूँ तुम से दूर, फिर भी पहुँच पाने में हूँ मजबूर। हाँ कोशिश करूँगा ज़रूर। न पहुँच पाऊँ तो माफ़ कर देना हजूर।''
''क्या केवल दो ही किलोमीटर की दूरी पर हो फिर भी नखरे दिखा रहे हो, विकास मार्ग पर हो इसलिए इतरा रहे हो। पाँच मिनट में पहुँच जाओगे, यदि स्कूटर को ब्लू लाइन जैसा चलाओगे।''
मित्र महोदय ने अपनी पुस्तक पर चढ़े रेशमी वस्त्र को कस कर बाँधते हुए उपस्थित दर्शकों-कम-श्रोताओं से कहा, ''अच्छे साहित्यकार हैं, पर इन दिनों हिंदी साहित्य की तरह से बीमार हैं। हमारे घनिष्ठ मित्र हैं पाँच मिनट प्रतीक्षा करने में क्या हर्ज है, लेट लतीफों के प्रति हमारा भी तो कुछ फर्ज़ है। हमारे असाहित्यिक नेता हर साहित्यिक कार्यक्रम में विलंब से आते हैं, हम फिर भी उनकी राह में पलक पाँवड़े बिछाते हैं।''
इतना कह कर मित्रवर ने प्रकाशक की ओर देखा, उसके होंठों के मध्य खींची हुई थी खामोशी की भूमध्य रेखा। ऐसी स्थिति में बेचारे प्रकाशक को क्या बोलना था। उसे तो वक्त की नज़ाकत को ही तौलना था। वह सदन के उस स्पीकर की भाँति चुपचाप वहाँ का देख रहे थे नज़ारा, जिसे किसी भी दल का मिलता नहीं सहारा।''

तभी मुख्य अतिथि महोदय ने अपने माथे पर त्यौरियाँ चढ़ाते हुए कहा, ''ऐसे क्या साहित्यकार होगें और आपके मित्र हैं तो होगें। समय पर आते तो हमारे साहित्यिक रंग भी देख पाते। अभी मुझे चार जगह और लोकार्पण का यह कर्मकांड निपटाना है, उसके बाद किसी पाँचवे जजमान की कांफ्रेस में भी जाना है। यहाँ देर हुई तो समझो बोहनी ही खराब हो जाएगी। सभी जगह यह अपना अपशगुन ही दिखाएगी।''
मुख्य अतिथि का मन रखने के लिए मित्र जेल की पगली घंटी सरीखी मोबाइल की घंटी बजाने लगे। चाय पानी देने वालों को नाहक ही कुछ समझाने लगे। जेल में पगली घंटी तभी बजती है जब कोई आपात काल होता है, अन्यथा तो जेल का प्रशासन हरदम मुर्दे की तरह से सोता है। मित्र के माथे पर सरदियों में भी पसीने की बूँदें देख कर मैंने सांत्वना देने की गर्ज से पूछा, ''आखिर आप परेशान क्यों हैं, लोकार्पण तो प्रसन्नता का अवसर होता पर आप हैरान क्यों हैं।''
मित्र बोले, वह कमबख्त कनछेदी समय पर नहीं आ रहा है। विकास मार्ग पर शायद उसका स्कूटर नखरे दिखा रहा है।''
मैंने ज़ोरदार ठहाका लगाया और मित्रवर को समझाया। वह विकास मार्ग पर नहीं है बल्कि विकास के मार्ग पर है। जब तक उसका विकास नहीं हो जाता वह यहाँ आएगा नहीं, और तुम्हें अपने विकास की गति बतलाएगा नहीं। तुम जानते हो आजकल विकास के नए-नए मार्ग खोजे जा रहे हैं। पहले दो चार सरकारी विभागों में ही व्यक्ति को विकास करने के अवसर मिलते थे अब तो चारों ओर विकास की लूट है, लूटने वालों को हर तरह से पूरी छूट है। जानते हो कनछेदी सर्वशिक्षा अभियान में काम कर रहा है, जहाँ बजट के बोझ तले पूरा अभियान ही मर रहा है। कोई नहीं जानता कि इतना धन कहाँ जाएगा, आखिर अधिकारियों की छोटी-छोटी जेबों में कितना समाएगा। गाँव-गाँव में लायब्रेरी खोलने का प्रावधान है, उसके लिए कहाँ उपलब्ध आवश्यक सामान है। कनछेदी अवश्य ही ग्रामीण विकास कर रहा होगा, अपनी पत्नी के नाम पर लिखवाई गई किताबों के फार्म भर रहा होगा।''
''तुम पुस्तकों के पीछे क्यों पड़ गए हो ग्रामीण रोजगार योजना में भी तो बहुत धन है, उसमें विकास का अवसर कहाँ कम है। बाढ़ और अकाल तो कामधेनू गाय हैं उन्हें जो चाहे दोह ले, रक्षा विभाग के गुप्त दस्तावेज़ हैं जो चाहे टोह ले।'' मित्र ने कहा।
''मतलब यह है कि अपना होना चाहिए विकास, चाहे गड्ढे में गिरे देश का विश्वास। लगता है कि कनछेदी कुछ ऐसे ही विकास कर रहा है और अर्थतंत्र की सीढ़ियों पर तेज़ी से चढ़ रहा है। जानते हो साहित्य से इतना विकास नहीं होता, साहित्यकार तो जीवन भर कर्ज़ों का बोझ ही है ढोता।''
तभी प्रकाशक महोदय ने कहा, ''अच्छा हो हम इस विवाद को यहीं दें विराम, और पुस्तक के लोकार्पण की रस्म अदायगी शुरू करें श्रीमान। थोड़ी ही देर में दूसरी टोली आएगी जो अगली पुस्तक का लोकार्पण कर जाएगी। इस समय वह दल साथ वाले भवन में किसी काव्य कृति के लोकार्पण का कार्यक्रम संपन्न कर रहा है, जल्दी ही वहाँ से फ्री हो जाएगा और सीधा इसी स्टाल पर आएगा। इस बीच हमें बैनर इत्यादि भी बदलना है और नए सिरे से स्टाल को सजाना है, अगली किताब पाक कला पर है इसलिए कुछ गैस आदि पर पकाना है। हमारे मुख्य अथिति भी व्यंग्य के इतिहास का विमोचन करके दूसरे स्थानों पर जाएँगे और वहाँ वास्तु कला और रसायन विज्ञान के ग्रंथों पर अपने विचार सुनाएँगे।''
मैंने कहा, ''मैं जानता हूँ कुछ बड़े प्रकाशकों के बड़े स्टालों पर पारियों में हो रहा है लोकार्पण का काम, वहाँ पर बहुत से विमोचनकर्त्ता सुबह से अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए कर रहे हैं आराम। इसलिए जितनी जल्दी हो इस काम को निपटाया जाए ताकि आगे आने वालों के लिए खाली स्थान जुटाया जाए।''

लेखक ने लंबी साँस भरते हुए एक बार फिर कनछेदी का किया गुणगान, और बेहोश होने से पहले उसके मुख से इतना ही निकला वह पुस्तक की सौ प्रतियाँ खरीदने वाला था भगवान।

२४ मार्च २००८